अथर्ववेद - काण्ड 16/ सूक्त 6/ मन्त्र 1
सूक्त - उषा,दुःस्वप्ननासन
देवता - प्राजापत्या अनुष्टुप्
छन्दः - यम
सूक्तम् - दुःख मोचन सूक्त
अजै॑ष्मा॒द्यास॑नामा॒द्याभू॒मना॑गसो व॒यम् ॥
स्वर सहित पद पाठअजै॑ष्म । अ॒द्य । अस॑नाम । अ॒द्य । अभू॑म । अना॑गस: । व॒यम् ॥६.१॥
स्वर रहित मन्त्र
अजैष्माद्यासनामाद्याभूमनागसो वयम् ॥
स्वर रहित पद पाठअजैष्म । अद्य । असनाम । अद्य । अभूम । अनागस: । वयम् ॥६.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 16; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(अद्य) आज (वयम्) हम ने। दुःष्वप्नों और उन के दुष्परिणामों पर (अजैष्म) विजय पाली है, (अद्य) आज (असनाम) हम सुस्दप्नों के भागी बने हैं, और (अनागसः) निष्पाप (अभूम) हो गये हैं।
टिप्पणी -
[असनाम = षण (सन) संभक्तौ। सूक्त ५ में "स्वप्न दुष्वप्न्यात् पाहि" द्वारा सुस्वप्न से अभ्यर्थना की गई है कि वह दुष्वप्न्य से हमारी रक्षा करे। सूक्त ६ में प्रथम मन्त्र द्वारा दुस्वप्न्य पर विजय पा लेने की घोषणा की गई है।