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अथर्ववेद > काण्ड 20 > सूक्त 49

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  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 49/ मन्त्र 1
    सूक्त - खिलः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-४९

    यच्छ॒क्रा वाच॒मारु॑हन्न॒न्तरि॑क्षं सिषासथः। सं दे॒वा अ॑मद॒न्वृषा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । श॒क्रा: । वाच॒म् । आरु॑हन् । अ॒न्तरि॑क्षम् । सिषासथ: ॥ सम् । दे॒वा: । अ॑म॒दन् । वृषा॑ ॥४९.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यच्छक्रा वाचमारुहन्नन्तरिक्षं सिषासथः। सं देवा अमदन्वृषा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । शक्रा: । वाचम् । आरुहन् । अन्तरिक्षम् । सिषासथ: ॥ सम् । देवा: । अमदन् । वृषा ॥४९.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 49; मन्त्र » 1

    भाषार्थ -
    (यत्) जब (शक्राः) शक्ति-सम्पन्न (देवाः) उपासक देव, (सम्) परस्पर मिलकर, (अमदन्) परमेश्वर की स्तुतियाँ करते हैं, तब ये भक्ति के आवेश में, (वाचम्) सामगान के स्वरों का (आरुहन्) आरोहण करते हैं, अर्थात् उच्च स्वरों में सामगान गाते हैं। तब हे उपासक नरवर्ग! और नारीवर्ग! तुम दोनों (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष में (सिषासथः) अपने स्वरें पहुँचा देते हो, अर्थात् अन्तरिक्ष को अपने स्वरों से गुञ्जा देते हो। तदनन्तर (वृषा) आनन्दरसवर्षी परमेश्वर तुम पर आनन्दरस की वर्षा करता है।

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