अथर्ववेद - काण्ड 4/ सूक्त 30/ मन्त्र 2
सूक्त - अथर्वा
देवता - सर्वरूपा सर्वात्मिका सर्वदेवमयी वाक्
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - राष्ट्रदेवी सुक्त
अ॒हं राष्ट्री॑ सं॒गम॑नी॒ वसू॑नां चिकि॒तुषी॑ प्रथ॒मा य॒ज्ञिया॑नाम्। तां मा॑ दे॒वा व्य॑दधुः पुरु॒त्रा भूरि॑स्थात्रां॒ भूर्या॑वे॒शय॑न्तः ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒हम् । राष्ट्री॑ । स॒म्ऽगम॑नी । वसू॑नाम् । चि॒कि॒तुषी॑ । प्र॒थ॒मा । य॒ज्ञिया॑नाम् । ताम् । मा॒ । दे॒वा: । वि । अ॒द॒धु॒: । पु॒रु॒ऽत्रा । भूरि॑ऽस्थात्राम् । भूरि॑ । आ॒ऽवे॒शय॑न्त: ॥३०.२॥
स्वर रहित मन्त्र
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्। तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तः ॥
स्वर रहित पद पाठअहम् । राष्ट्री । सम्ऽगमनी । वसूनाम् । चिकितुषी । प्रथमा । यज्ञियानाम् । ताम् । मा । देवा: । वि । अदधु: । पुरुऽत्रा । भूरिऽस्थात्राम् । भूरि । आऽवेशयन्त: ॥३०.२॥
अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 30; मन्त्र » 2
भाषार्थ -
(अहम्) मैं (राष्ट्री) ब्रह्माण्ड-राष्ट्र की अधीश्वरी हूँ, (वसूनाम्, संगमनी) सम्पत्तियों का मुझ में संगम है [मैं सम्पत्तियों की स्वामिनी हूँ], (चिकितुषी) सम्यक्-ज्ञानवाली हूँ (प्रथमा यज्ञियानाम्) यजनीयों में मुख्य यजनीया हूँ; (भूरिस्थात्राम्) बहुरूपों में स्थित हुई तथा उनका त्राण करने वालो (ताम्, मा) उस मुझको;-(भूरि आवेशयन्तः) निज बहुरूपों में प्रविष्ट करते हुए (देवाः) सूर्य-चन्द्र-अग्नि-वायु आदि देवों ने, (पुरुत्रा) विविध रूपों में (व्यदधुः) विविध प्रकार से-धारण किया हुआ है।
टिप्पणी -
[पारमेश्वरी माता सूर्यादि में, सूर्यादि विविध नामों से प्रविष्ट है, सूर्य में सूर्य नाम से, चन्द्र में चन्द्र नाम से, अग्नि में अग्नि नाम से प्रविष्ट है। कहा भी है "अग्नावग्निश्चरति प्रविष्टः" (अथर्व० ४।३९।९), अर्थात् परमेश्वर अग्नि में अग्नि नाम से प्रविष्ट है। इस प्रकार जो दैवत नाम हैं, वे सब, अध्यात्म में, परमेश्वर के भी नाम हैं। यथा "तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः। तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ताऽआपः स प्रजापति:" (यजु ३२।१)।]