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अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 76/ मन्त्र 1
सूक्त - कबन्ध
देवता - सान्तपनाग्निः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - आयुष्य सूक्त
य ए॑नं परि॒षीद॑न्ति समा॒दध॑ति॒ चक्ष॑से। सं॒प्रेद्धो॑ अ॒ग्निर्जि॒ह्वाभि॒रुदे॑तु॒ हृद॑या॒दधि॑ ॥
स्वर सहित पद पाठये । ए॒न॒म् । प॒रि॒ऽसीद॑न्ति । स॒म्ऽआ॒दध॑ति । चक्ष॑से । स॒म्ऽप्रेध्द॑: । अ॒ग्नि: । जि॒ह्वाभि॑: । उत् । ए॒तु॒ । हृद॑यात् । अधि॑ ॥७६.१॥
स्वर रहित मन्त्र
य एनं परिषीदन्ति समादधति चक्षसे। संप्रेद्धो अग्निर्जिह्वाभिरुदेतु हृदयादधि ॥
स्वर रहित पद पाठये । एनम् । परिऽसीदन्ति । सम्ऽआदधति । चक्षसे । सम्ऽप्रेध्द: । अग्नि: । जिह्वाभि: । उत् । एतु । हृदयात् । अधि ॥७६.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 76; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(ये) जो (एनम्) इस [क्षत्रिय मन्त्र ३, ४] के (परिषोदन्ति) चारों ओर बैठते हैं, और (चक्षसे) [अग्नि के] दर्शन के लिये (समादधति) समाहितचित्त होते हैं, उनकी (जिह्वाभि:) जिह्वाओं अर्थात् वाक्यों या भाषणों द्वारा (संप्रेद्धः) सम्यक् प्रदीप्त हुई (अग्निः) क्षात्राग्ति (हृदयात् अधि) क्षत्रिय के हृदय से (उदेतु) उद्गत हो, उठे।
टिप्पणी -
[सूक्त के चारों मन्त्रों के वर्णन कविता में हैं और छायावादानुरूप हैं। जिह्वाभिः= जिह्वा वाङ्नाम (निघं० १।११)। शत्रुओं द्वारा किये गये आक्रमण को सह्य न जानते हुए, क्षत्रिय के हृदय से जो क्षात्राग्नि उद्गत होती है उसके दर्शन के लिये क्षत्रिय के चारों ओर बैठे सैनिकों के उत्साह जनक भाषणों द्वारा यह क्षात्राग्नि सम्यक प्रदीप्त होकर क्षत्रिय के हृदय से उठती है और प्रजाजन इस अग्नि का दर्शन ध्यानपूर्वक करते हैं।]