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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 102 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 102/ मन्त्र 2
    ऋषिः - कुत्स आङ्गिरसः देवता - इन्द्र: छन्दः - स्वराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अ॒स्य श्रवो॑ न॒द्य॑: स॒प्त बि॑भ्रति॒ द्यावा॒क्षामा॑ पृथि॒वी द॑र्श॒तं वपु॑:। अ॒स्मे सू॑र्याचन्द्र॒मसा॑भि॒चक्षे॑ श्र॒द्धे कमि॑न्द्र चरतो वितर्तु॒रम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्य । श्रवः॑ । न॒द्यः॑ । स॒प्त । बि॒भ्र॒ति॒ । द्यावा॒क्षामा॑ । पृ॒थि॒वी । द॒र्श॒तम् । वपुः॑ । अ॒स्मे इति॑ । सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसा॑ । अ॒भि॒ऽचक्षे॑ । श्र॒द्धे । कम् । इ॒न्द्र॒ । च॒र॒तः॒ । वि॒ऽत॒र्तु॒रम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्य श्रवो नद्य: सप्त बिभ्रति द्यावाक्षामा पृथिवी दर्शतं वपु:। अस्मे सूर्याचन्द्रमसाभिचक्षे श्रद्धे कमिन्द्र चरतो वितर्तुरम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्य। श्रवः। नद्यः। सप्त। बिभ्रति। द्यावाक्षामा। पृथिवी। दर्शतम्। वपुः। अस्मे इति। सूर्याचन्द्रमसा। अभिऽचक्षे। श्रद्धे। कम्। इन्द्र। चरतः। विऽतर्तुरम् ॥ १.१०२.२

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 102; मन्त्र » 2
    अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 14; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथेश्वराध्यापककर्मणा किं जायत इत्युपदिश्यते ।

    अन्वयः

    हे इन्द्रास्य तव श्रवः सप्तनद्यो दर्शतं वितर्त्तुर कं वपुर्बिभ्रति द्यावाक्षामा पृथिवी सूर्य्याचन्द्रमसा च बिभ्रत्येते सर्व अस्मे अभिचक्ष श्रद्धे चरन्ति चरतः चरन्ति चरतो वा ॥ २ ॥

    पदार्थः

    (अस्य) अखिलविद्यस्य जगदीश्वरस्य सर्वविद्याध्यापकस्य वा (श्रवः) सामर्थ्यमन्नं वा (नद्यः) सरितः (सप्त) सप्तविधाः स्वादोदकाः (बिभ्रति) धरन्ति पोषयन्ति वा (द्यावाक्षामा) प्रकाशभूमी। अत्र दिवो द्यावा। अ० ६। ३। २९। अनेन दिव् शब्दस्य द्यावादेशः। (पृथिवी) अन्तरिक्षम् (दर्शतम्) द्रष्टव्यम् (वपुः) शरीरम् (अस्मे) अस्माकम् (सूर्याचन्द्रमसा) सूर्यचन्द्रादिलोकसमूहो (अभिचक्षे) आभिमुख्येन दर्शनाय (श्रद्धे) श्रद्धारणाय (कम्) सुखकारकम् (इन्द्र) विद्यैश्वर्यप्रद (चरतः) प्राप्नुतः। (वितर्तुरम्) अतिशयेन विविधप्लवे तरणार्थम्। अत्र यङ्लुङन्तात्तॄधातोरच् प्रत्ययो बहुलं छन्दसीत्युत्वम् ॥ २ ॥

    भावार्थः

    अत्र श्लेषालङ्कारः। परमेश्वरस्य सर्जनेन पृथिव्यादयो लोकास्तत्रस्थाः पदार्थाश्च स्वं स्वं रूपं धृत्वा सर्वेषां प्राणिनां दर्शनाय श्रद्धायै च भूत्वा सुखं संपाद्य गमनागमनादिव्यवहारहेतवो भवन्ति। नहि कथंचिद् विद्यया विनैतेभ्यः सुखानि संजायन्ते तस्मादीश्वरस्योपासनेन विदुषां सङ्गेन च लोकविद्याः प्राप्य सर्वैः सदा सुखयितव्यम् ॥ २ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब ईश्वर और अध्यापक के काम से क्या होता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य के देनेवाले ! (अस्य) निःशेष विद्यायुक्त जगदीश्वर का वा समस्त विद्या पढ़ानेहारे आप लोगों का (श्रवः) सामर्थ्य वा अन्न और (सप्त) सात प्रकार की स्वादयुक्त जलवाली (नद्यः) नदी (दर्शतम्) देखने और (वितर्त्तुरम्) अनेक प्रकार के नौका आदि पदार्थों से तरने योग्य महानद में तरने के अर्थ (कम्) सुख करनेहारे (वपुः) रूप को (बिभ्रति) धारण करती वा पोषण कराती तथा (द्यावाक्षामा) प्रकाश और भूमि मिलकर वा (पृथिवी) अन्तरिक्ष (सूर्याचन्द्रमसा) सूर्य और चन्द्रमा आदि लोक धरते पुष्ट कराते हैं, ये सब (अस्मे) हम लोगों के (अभिचक्षे) सुख के सम्मुख देखने (श्रद्धे) और श्रद्धा कराने के लिये प्रकाश और भूमि वा सूर्य-चन्द्रमा दो-दो (चरतः) प्राप्त होते तथा अन्तरिक्ष प्राप्त होता और भी उक्त पदार्थ प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर की रचना से पृथिवी आदि लोक और उनमें रहनेवाले पदार्थ अपने-अपने रूप को धारण करके सब प्राणियों के देखने और श्रद्धा के लिये हो और सुख को उत्पन्न कर चालचलन के निमित्त होते हैं परन्तु किसी प्रकार विद्या के विना इन सांसारिक पदार्थों से सुख नहीं होता, इससे सबको चाहिये कि ईश्वर की उपासना और विद्वानों के सङ्ग से लोकसम्बन्धी विद्या को पाकर सदा सुखी होवें ॥ २ ॥

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    विषय

    सर्वत्र प्रभुयश - दर्शन

    पदार्थ

    १. (सप्त) = सर्पणशील - बहनेवाली , निरन्तर प्रवाहों में चलनेवाली (नद्यः) = नदियाँ (अस्य श्रवः) = इस प्रभु के यश को (बिभ्रति) = धारण करती हैं । गङ्गादि महान् नदियों की निरन्तर बहती हुई जलधाराएँ प्रभु की महिमा का किस विचारशील पुरुष को स्मरण नहीं कराती ? 

    २. (द्यावाक्षामा) = द्युलोक व पृथिवीलोक , (पृथिवी) = अन्तरिक्षलोक तथा (दर्शतं वपुः) = दर्शनीय रचनावाला यह प्राणिशरीर - ये सबके सब उस प्रभु के यश को धारण करते हैं । इनमें सर्वत्र उस रचयिता की रचना का कौशल दिखता है । शरीर में तो एक - एक अङ्ग कुतूहल पैदा करनेवाला है । 

    ३. (सूर्याचन्द्रमसा) = ये सूर्य और चन्द्रमा (इन्द्र) = हे परमात्मन् ! (अस्मे) = हमारे लिए (अभिचक्षे) = वस्तुओं के प्रकाशन के लिए तथा (श्रद्धे) = आपके प्रति श्रद्धा के लिए (वितर्तुरम्) = [तुर्वी हिंसायाम्] सब बुराइयों का संहार करते हुए और (कम्) = सुखवृद्धि करते हुए (चरतः) = गति करते हैं । सूर्य और चन्द्रमा को देखकर इनका वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए किस व्यक्ति के हृदय में प्रभु के प्रति श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती? सूर्य - चन्द्रमा प्रभु की अद्भुत विभूतियाँ हैं । 
     

    भावार्थ

    भावार्थ - नदियाँ , द्युलोक , पृथिवीलोक , अन्तरिक्षलोक , प्राणिशरीर , सूर्य और चन्द्रमा सभी प्रभु के यश का गायन कर रहे हैं । 
     

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    विषय

    पक्षान्तर में राजा और सेना पति का वर्णन ।

    भावार्थ

    ( अस्य ) इस परमेश्वर के ( श्रवः ) महान् सामर्थ्य को ( सप्त नद्यः ) बहने वाली नदिये और ( द्यावाक्षामा ) सूर्य और पृथिवी और ( पृथिवी ) अन्तरिक्ष सब ( वपुः ) अपने स्वरूप में ( बिभ्रति ) धारण कर रहे हैं । हे ( इन्द्र ) परमेश्वर ! ( अस्मे अभिचक्षे ) हमें दिखाने और आँखों से ज्ञान कराने और ( श्रद्धे ) सत्य ज्ञान को धारण कराने के लिये ( सूर्याचन्द्रमसा ) सूर्य और चन्द्रमा दोनों प्रकाशमान होकर (वितर्तुरम्) नाना प्रकार से आते जाते हुए ( चरतः ) गति करते हैं । ( २ ) राजा के पक्ष में—तेरे ही यश और ऐश्वर्य को ( सप्तनद्यः ) सर्पणशील समृद्ध प्रजाएं या नदियों के समान धारण करती हैं । पृथिवी आकाश और अन्तरिक्ष तीनों तेरे गुणों को अपने में धारण करते हैं । सूर्य चन्द्र और शान्ति के देने वाले पुरुष सत्य ज्ञान देने और विश्वास योग्य पदार्थों को उपदेश देने के लिये विचरण करें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कुत्स ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः- १ जगती । ३, ५—८ । निचृज्जगती २, ४, ९ स्वराट् त्रिष्टुप् । १०, ११ निचृत् त्रिष्टुप् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. परमेश्वरनिर्मित पृथ्वी इत्यादी गोल व त्यात राहणारे पदार्थ आपापल्या रूपांना धारण करून सर्व प्राण्यांच्या दर्शनासाठी व श्रद्धेसाठी असून, सुख-दुःख उत्पन्न करून गमनागमन व्यवहारासाठी असतात; परंतु कोणत्याही प्रकारे विद्येशिवाय या सांसारिक पदार्थांनी सुख मिळत नाही. यामुळे सर्वांनी ईश्वराची उपासना व विद्वानांच्या संगतीने गोलांसंबंधी विद्या प्राप्त करून सदैव सुखी व्हावे. ॥ २ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    The power and fame of this Indra, the seven rivers hold in their flow and reveal. Heaven and earth and the skies manifest his majestic form. The sun and the moon shine and move so that we may realise his glory, have faith, feel the joy of life and finally cross through the ocean of existence.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What is the effect of the work of God and a noble teacher is taught in the 2nd Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O Lord of the world, the flowing rivers display Thy Glory; heaven, earth, and the sun and moon, all manifest Thy charming Power which is like Thy Body so to speak and which gives us happiness so that we may see and have faith in Thee-in their wonderful Almighty Creator.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (श्रव:) सामर्थ्यम = Power (अभिचक्षे) आभिमुख्येन दर्शनाय = To see (कम्) सुखकारकम् = Causing happiness.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    It is by the creative Power of God that the earth, sky and other worlds and objects have their visible form for giving happiness to all creatures and creating faith in God “their Creator. They cause all movement of going and coming. None can attain happiness from them without knowledge. Therefore one should acquire the knowledge of all objects of the world by having communion with God and the association with the wise.

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