ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 102/ मन्त्र 7
उत्ते॑ श॒तान्म॑घव॒न्नुच्च॒ भूय॑स॒ उत्स॒हस्रा॑द्रिरिचे कृ॒ष्टिषु॒ श्रव॑:। अ॒मा॒त्रं त्वा॑ धि॒षणा॑ तित्विषे म॒ह्यधा॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे पुरंदर ॥
स्वर सहित पद पाठउत् । ते॒ । श॒तात् । म॒घ॒ऽव॒न् । उत् । च॒ भूय॑सः । उत् । स॒हस्रा॑त् । रि॒रि॒चे॒ । कृ॒ष्टिषु॑ । श्रवः॑ । अ॒मा॒त्रम् । त्वा॒ । धि॒षणा॑ । ति॒त्वि॒षे॒ । म॒ही । अध॑ । वृ॒त्राणि॑ । जि॒घ्न॒से॒ । पु॒र॒म्ऽद॒र॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
उत्ते शतान्मघवन्नुच्च भूयस उत्सहस्राद्रिरिचे कृष्टिषु श्रव:। अमात्रं त्वा धिषणा तित्विषे मह्यधा वृत्राणि जिघ्नसे पुरंदर ॥
स्वर रहित पद पाठउत्। ते। शतात्। मघऽवन्। उत्। च भूयसः। उत्। सहस्रात्। रिरिचे। कृष्टिषु। श्रवः। अमात्रम्। त्वा। धिषणा। तित्विषे। मही। अध। वृत्राणि। जिघ्नसे। पुरम्ऽदर ॥ १.१०२.७
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 102; मन्त्र » 7
अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 15; मन्त्र » 2
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अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 15; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः स कीदृशः किं करोतीत्युपदिश्यते ।
अन्वयः
हे मघवन्निन्द्र ते कृष्टिषु श्रवः शतादुद्रिरिचे सहस्रादुद्रिरिचे भूयसश्चोद्रिरिचेऽधाऽमात्रं त्वा मही धिषणा तित्विषे। हे पुरन्दर वृत्राणि सूर्य्यइव त्वं शत्रून् जिघ्नसे ॥ ७ ॥
पदार्थः
(उत्) उत्कृष्टे (ते) तव (शतात्) असंख्यात् (मघवन्) असंख्यातैश्वर्य्य (उत्) (च) (भूयसः) अधिकात् (उत्) (सहस्रात्) असंख्येयात् (रिरिचे) अतिरिच्यते (कृष्टिषु) मनुष्येषु (श्रवः) कीर्तनं श्रवणं धनं वा (अमात्रम्) अपरिमितम् (त्वा) त्वाम् (धिषणा) विद्यासुशिक्षिता वाक् प्रज्ञा वा (तित्विषे) त्वेषति प्रदीप्यते (मही) महागुणविशिष्टा (अध) आनन्तर्ये। निपातस्य चेति दीर्घः। (वृत्राणि) यथा मेघावयवान्सूर्य्यस्तथा शत्रून् (जिघ्नसे) हन्याः। अत्र हन धातोर्लेटि शपः स्थाने श्लुः। व्यत्ययेनात्मनेपदं च। (पुरन्दर) यः शत्रूणां पुरो दृणाति तत्सम्बुद्धौ ॥ ७ ॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यथा सूर्योऽन्धकारमेघादिकं हत्वाऽपरिमितं स्वकीयं तेजः प्रकाश्य सर्वेषु तेजस्विष्वधिको वर्त्तते तथाभूतं विद्वांसं सभापतिं मत्वा शत्रवः पराजेयाः ॥ ७ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर वह कैसा और क्या करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे (मघवन्) असंख्यात ऐश्वर्य्य से युक्त सेनापति ! (ते) आपका (कृष्टिषु) मनुष्यों में (श्रवः) कीर्त्तन, श्रवण वा धन (शतात्) सैकड़ों से (उत्) ऊपर (रिरिचे) निकल गया (सहस्रात्) हजारों से (उत्) ऊपर (च) और (भूयसः) अधिक से भी (उत्) ऊपर अर्थात् अधिक निकल गया। (अध) इसके अनन्तर (अमात्रम्) परिमाणरहित (त्वा) आपकी (मही) महागुणयुक्त (धिषणा) विद्या और अच्छी शिक्षा को पाये हुई वाणी वा बुद्धि (तित्विषे) प्रकाशित करती है। हे (पुरन्दर) शत्रुओं के पुरों के विदारनेवाले ! (वृत्राणि) जैसे मेघ के अङ्ग अर्थात् बद्दलों को सूर्य्य हनन करता है, वैसे आप शत्रुओं को (जिघ्नसे) मारते हो ॥ ७ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य अन्धकार और मेघ आदि का हनन करके अपरिमित अर्थात् जिसका परिमाण न हो सके, उस अपने तेज को प्रकाशित करके सब तेजवाले पदार्थों में बढ़के वर्त्तमान है, वैसे विद्वान् को सभा का अधीश मानके शत्रुओं को जीतें ॥ ७ ॥
विषय
अनन्त यश
पदार्थ
१. हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (ते) = आपका (कृष्टिषु श्रवः) = मनुष्यों में होनेवाला यश (शतात् उत रिरिचे) = सैकड़ों मनुष्यों से भी अधिक बढ़ा हुआ है , (भूयसः च उत्) = सैकड़ों मनुष्यों से भी अधिक पुरुषों से वह अधिक है । (सहस्त्रात् उत) = हजारों पुरुषों से भी वह अधिक है । उस प्रभु के यश को अनन्त पुरुषों का यश भी प्रतुलित नहीं कर सकता ।
२. (धिषणा) = [वाक्] यह वेदवाणी (अमात्रम्) = न मापने योग्य (त्वा) = आपको (तित्विषे) = दीप्त करती है - “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति” । सम्पूर्ण वेद आपका ही प्रतिपादन करते हैं । वस्तुतः इसीलिए यह वेदवाणी (मही) = पूजनीय व महत्त्वपूर्ण है ।
३. जो भी व्यक्ति इस वेदवाणी के द्वारा प्रभु का उपासन करता है , प्रभु उसके दुर्भावों का विनाश करते हैं । उसके इन शरीररूप पुरों का वे विदारण करते हैं । हे (पुरन्दर) = इन शरीररूप पुरों का विदारण करके मोक्षपद को प्राप्त करानेवाले प्रभो ! आप (अध) = उपासना करने पर (वृत्राणि) = ज्ञान पर आवरण के रूप में आ जानेवाली इन वासनाओं को जिनसे नष्ट करते हैं । वासनाओं को नष्ट करके ही तो प्रभु भक्तों को मोक्ष प्राप्त कराते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ - प्रभु का यश अनन्त है । उस अमात्र प्रभु का ही यह वेदवाणी प्रतिपादन करती है । उपासित होने पर प्रभु बन्धनों को नष्ट करते हैं ।
विषय
पक्षान्तर में राजा और सेना पति का वर्णन ।
भावार्थ
( मघवन् ) ऐश्वर्यवन् ! राजन् ! ( ते ) तेरा ( श्रवः ) ज्ञान, ऐश्वर्य, यश ( कृष्टिषु ) मनुष्यों में ( शतात् ) सौ से, ( उत् रिरिचे ) भी अधिक बढ़े । (भूयसः उत् च ) और उसमें भी अधिक संख्यावाले पुरुषों से अधिक हो । ( सहस्रात् उत् रिरिचे ) हज़ार से भी अधिक हो । ( मही ) बड़ी भारी, अति पूजनीय, उत्तम ( धिषणा ) विद्या, बुद्धि और वाणी, ( अमात्रं त्वा ) अपरिमित बलशाली तुझको ( तित्विषे ) अधिक तेजस्वी बनावे । (अध) और हे (पुरन्दर) शत्रुओं के गढ़ों को तोड़नेहारे ! तू ( वृत्राणि ) मेघों को सूर्य के समान अपने बढ़ते हुए और विपरीत आचरण करनेवाले शत्रुओं को ( जिघ्नसे) दण्डित कर । (२) परमेश्वर के पक्ष में—हे परमेश्वर ! सैकड़ों सहस्रों और उनसे भी अधिक असंख्यात लोकों और ब्रह्माण्डों से भी तेरा सामर्थ्य बढ़ कर है । अनन्त बलशाली तुझको बड़ी भारी पूजनीय ( धिषणा ) वेदवाणी प्रकाशित करती है। तू जीवों को देह बन्धनरूप दुष्टों को ज्ञान वज्र से तोड़नेहारा है । तू ( वृत्राणि ) अज्ञान आवरणों को नाश कर ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कुत्स ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः- १ जगती । ३, ५—८ । निचृज्जगती २, ४, ९ स्वराट् त्रिष्टुप् । १०, ११ निचृत् त्रिष्टुप् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. माणसांनी जसा सूर्य अंधकार व मेघ इत्यादींचे हनन करून अपरिमित अर्थात ज्याचे परिमाण असू शकत नाही त्या तेजाला प्रकाशित करून सर्व तेजस्वी पदार्थांत वर्धित होत असतो, तसे विद्वानाला सभेचा अधीश मानून शत्रूंना जिंकावे. ॥ ७ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Indra, lord of might and power, more than hundred, more than most, more than thousand exceeds your fame and power among the people. Great is your intelligence and action and noble is your voice which makes you shine immensely more than brilliant. And then you break the clouds of rain for the showers and rout the strongholds of the hoarders.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O Indra (commander of the army) possessing infinite wealth, thy glory knowledge and wealth among men exceed a hundred, exceed a thousand and even more. Great cultured speech or intellect, glorifies thee that art possessor of in-numerable attributes. It makes thee shine out. O destroyer of the cities of the foes, thou slyest thy enemies as the sun disperses the clouds.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(श्रवः) श्रवणं कीर्तनं धनं वा = Glory, knowledge or wealth. (धिषणा) विद्यासुशिक्षिता वाक् प्रज्ञा वा = Speech or intellect cultivated and refined. (वृत्राणि) यथा मेघावयवान् सूर्यस्तथा शत्रून् = Cloud like enemies.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Men should defeat their enemies by choosing a learned man who is like the sun that is most glorious and resplendent by dispelling darkness and the cloud, manifesting his splendor as the commander of the army or the President of the Assembly.
Translator's Notes
धिषणेति वाङ्नाम (निघ० १.११) वृत्र इति मेघनाम (निघ० १.१० ) तत् को वृत्रः । मेघ इति नैरुक्ताः । वृणोतेर्वा वर्ततेर्वा वर्धतेर्वा (निरुक्ते २.१६) पाप्मा वै दृत्र: ( शत० ११.१.५.७)
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