ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 115/ मन्त्र 3
ऋषिः - कुत्स आङ्गिरसः
देवता - सूर्यः
छन्दः - विराट्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
भ॒द्रा अश्वा॑ ह॒रित॒: सूर्य॑स्य चि॒त्रा एत॑ग्वा अनु॒माद्या॑सः। न॒म॒स्यन्तो॑ दि॒व आ पृ॒ष्ठम॑स्थु॒: परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी य॑न्ति स॒द्यः ॥
स्वर सहित पद पाठभ॒द्राः । अश्वाः॑ । ह॒रितः॑ । सूर्य॑स्य । चि॒त्राः । एत॑ऽग्वाः । अ॒नु॒ऽमाद्या॑सः । न॒म॒स्यन्तः॑ । दि॒वः । आ । पृ॒ष्ठम् । अ॒स्थुः॒ । परि॑ । द्यावा॑पृथि॒वी । य॒न्ति॒ । स॒द्यः ॥
स्वर रहित मन्त्र
भद्रा अश्वा हरित: सूर्यस्य चित्रा एतग्वा अनुमाद्यासः। नमस्यन्तो दिव आ पृष्ठमस्थु: परि द्यावापृथिवी यन्ति सद्यः ॥
स्वर रहित पद पाठभद्राः। अश्वाः। हरितः। सूर्यस्य। चित्राः। एतऽग्वाः। अनुऽमाद्यासः। नमस्यन्तः। दिवः। आ। पृष्ठम्। अस्थुः। परि। द्यावापृथिवी। यन्ति। सद्यः ॥ १.११५.३
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 115; मन्त्र » 3
अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 7; मन्त्र » 3
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अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 7; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः सूर्य्यकृत्यमाह ।
अन्वयः
भद्रा अनुमाद्यासो नमस्यन्तो विद्वांसो जना ये सूर्यस्य चित्रा एतग्वा अश्वाः किरणा हरितो द्यावापृथिवी सद्यः परि यन्ति दिवः पृष्ठमास्थुः समन्तात् तिष्ठन्ति। तान् विद्ययोपकुर्वन्तु ॥ ३ ॥
पदार्थः
(भद्राः) कल्याणहेतवः (अश्वाः) महान्तो व्यापनशीलाः किरणाः (हरितः) दिशः। हरित इति दिङ्नाम। निघं० १। ६। (सूर्य्यस्य) सवितृलोकस्य (चित्राः) अद्भुता अनेकवर्णाः (एतग्वाः) एतान् प्रत्यक्षान् पदार्थान् गच्छन्तीति (अनुमाद्यासः) अनुमोदकारकगुणेन प्रशंसनीयाः (नमस्यन्तः) सत्कुर्वन्तः (दिवः) प्रकाश्यस्य पदार्थस्य (आ) पृष्ठम् पश्चाद् भागम् (अस्थुः) तिष्ठन्ति (परि) सर्वतः (द्यावापृथिवी) आकाशभूमी (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (सद्यः) शीघ्रम् ॥ ३ ॥
भावार्थः
मनुष्याणां योग्यमस्ति श्रेष्ठानध्यापकानाप्तान् प्राप्य नमस्कृत्य गणितादिक्रियाकौशलतां परिगृह्य सूर्यसम्बन्धिव्यवहारानुष्ठानेन कार्यसिद्धिं कुर्युः ॥ ३ ॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर सूर्य्य के काम का अगले मन्त्र में वर्णन किया है ।
पदार्थ
(भद्राः) सुख के करानेहारे (अनुमाद्यासः) आनन्द करने के गुण से प्रशंसा के योग्य (नमस्यन्तः) सत्कार करते हुए विद्वान् जन जो (सूर्य्यस्य) सूर्य्यलोक की (चित्राः) चित्र विचित्र (एतग्वाः) इन प्रत्यक्ष पदार्थों को प्राप्त होती हुई (अश्वाः) बहुत व्याप्त होनेवाली किरणें (हरितः) दिशा और (द्यावापृथिवी) आकाश-भूमि को (सद्यः) शीघ्र (परि, यन्ति) सब ओर से प्राप्त होतीं (दिवः) तथा प्रकाशित करने योग्य पदार्थ के (पृष्ठम्) पिछले भाग पर (आ, अस्थुः) अच्छे प्रकार ठहरती हैं, उनको विद्या से उपकार में लाएँ ॥ ३ ॥
भावार्थ
मनुष्यों को योग्य है कि श्रेष्ठ पढ़ानेवाले शास्त्रवेत्ता विद्वानों को प्राप्त हो, उनका सत्कार कर, उनसे विद्या पढ़, गणित आदि क्रियाओं की चतुराई को ग्रहण कर, सूर्यसम्बन्धी व्यवहारों का अनुष्ठान कर कार्यसिद्धि करें ॥ ३ ॥
विषय
सूर्य के अश्व
पदार्थ
१. सूर्य की किरणें ही सूर्य के अश्व कहलाते हैं । ये (सूर्यस्य) = सूर्य की (अश्वाः) = सर्वत्र व्याप्त हो जानेवाली किरणें [आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम्] (भद्राः) = कल्याण करनेवाली हैं , (हरिताः) = ये रोगों का हरण करनेवाली हैं , (चित्राः) = अद्भुत हैं , अथवा चेतना को प्राप्त करानेवाली हैं । (एतग्वाः) = [एतं गच्छन्ति] गन्तव्य मार्ग पर चलानेवाली हैं , (अनुमाद्यासः) = अनुकूलता से हर्ष प्राप्त करानेवाली हैं । २. इन सूर्य - किरणों को (नमस्यन्तः) = पूजित करते हुए पुरुष - इनके उदय होने पर यज्ञ - यागादि में प्रवृत्त होनेवाले पुरुष (दिवः पृष्ठम्) = द्युलोक के पृष्ठ पर (आतस्थुः) = सर्वथा स्थित होते हैं “दिवो नाकस्य पृष्ठात्” - इन वेदशब्दों के अनुसार द्युलोक स्वर्गलोक का पृष्ठ [floor] है , अतः यज्ञादि के द्वारा सूर्य - पूजन करनेवाले लोग स्वर्ग में स्थित होते हैं , अर्थात् सूर्योदय के समय यज्ञादि उत्तम कर्म करनेवाले लोग अपने घरों को स्वर्ग बनाने में समर्थ होते हैं । ३. ये सूर्य के किरणरूप अश्व (सद्यः) = शीघ्र ही (द्यावापृथिवी) = द्युलोक व पृथिवीलोक में (परियन्ति) = चारों ओर जानेवाले होते हैं । सर्वत्र इनका प्रकाश फैल जाता है ।
भावार्थ
भावार्थ - सूर्य - किरणें कल्याण करनेवाली , नीरोगता देनेवाली व हर्ष की कारणभूत हैं । इनका यज्ञादि के द्वारा स्वागत हमें स्वर्ग - सुख विशेष में स्थित करता है ।
विषय
परमेश्वर की स्तुति, विद्वान् तेजस्वी पुरुष के कर्तव्य ।
भावार्थ
जिस प्रकार ( सूर्यस्य ) सूर्य के ( हरितः ) नील या श्याम वर्ण के ( अश्वाः ) किरणें ( भद्राः ) विशेष ज्वरादि, नाशक होने से प्राणियों को सुखकारक होते हैं और ( चित्राः ) चित्र विचित्र वर्ण वाले ( एतग्वाः ) शबल वर्ण अर्थात् रक्त नील पीतादि वर्ण के मिश्रित किरण भी ( अनुमाद्यासः ) उक्त नील वर्ण के किरणों के अनुसार ही प्राणियों को अधिक हर्षोत्पादक होते हैं। वे ( नमस्यन्तः ) नीचे झुकते हुए ( दिवः ) पृथिवी के और आकाश के ( पृष्ठम् आ अस्थुः ) पृष्ठ पर सब तरफ पड़ते हैं वे ही ( द्यावा पृथिवी ) आकाश और पृथ्वी सर्वत्र ( सद्यः यन्ति ) शीघ्र ही फैल जाते हैं। उसी प्रकार (सूर्यस्य ) सूर्य के समान तेजस्वी राजा के ( अश्वाः ) वेगवान् अश्वारोही जन और तेजस्वी आचार्य के ( अश्वाः ) विद्याओं में वेग से आगे बढ़ने वाले विद्यार्थी जन ( भद्राः ) कल्याणकारी, सुखजनक, सुसभ्य और ( हरितः ) नील वस्त्र को धारण करने वाले या मृगचर्म से, श्याम वर्ण या पीत वर्ण सब (चित्राः) आश्चर्य जनक, ( एतग्वाः ) अपने गमन करने योग्य नियत मार्ग पर जाने वाले होकर ( अनुमाद्यासः ) सभी द्वारा अनुमोदन या अभिनन्दन करने योग्य हों। वे ( नमस्यन्तः ) बड़ों को नमस्कार आदर सत्कार करते हुए (दिवः) ज्ञान और तेज के ( पृष्ठम् ) उच्च पद तक ( आ अस्थुः ) प्राप्त होते हैं । ( सद्यः ) शीघ्र ही ( द्यावापृथिवी ) सूर्य और पृथ्वी के समान दम्पति होकर गृहस्थ आश्रम को ( परियन्ति ) प्राप्त होते हैं । अथवा, वे राज-प्रजा वर्ग को व्याप लेते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कुत्स ऋषिः॥ सूर्यो देवता॥ छन्दः- १, २, ६ निचृत् त्रिष्टुप्। ३ विराट् त्रिष्टुप्। ४, ५ त्रिष्टुप्॥ षडृचं सूक्तम्॥
मन्त्रार्थ
(सूर्यस्य भद्राः-अश्वाः-हरितः) सूर्य के भद्र-संसार हितसाधक घोडे हरणशील-दोषों रोगों का हरण-अपहरण नाश करने वाले और गुणों लाभों का हरण-आहरण करने- लाने चाले किरणें हैं "हरितः-हरणानादित्यरश्मीन्" [ निरु० ४।१०] (चित्राः-एतग्वाः अनुमाद्यासः) वे भिन्न भिन्न रङ्ग वाले इस समस्त जगत् को प्राप्त होने वाले अनुमोदन करने वाले और अनुमोदनीय- प्रशंसनीय हैं (नमस्यन्तः-दिवः-पृष्ठम्-आ-अस्थुः) नमते हुए द्युलोक आकाश के ऊपर वर्तमान रहते हैं, परन्तु (द्यावापृथिवी सद्यः परियन्ति ) द्यावापृथिवीमय द्युलोक से पृथिवीलोक तक के समस्त जगत् को तुरन्त सब ओर पहुँच जाते हैं । सूर्य वह है जिसके किरण, दोष हरने गुण लाने वाले भिन्न भिन्न रङ्ग वाले अनेक रङ्ग वाले ऊपर से नीचे सारे संसार या पिण्डमात्र पर तुरन्त पहुंच जाते हैं ॥३॥
टिप्पणी
(सूर्यस्य भद्राः-अश्वाः-हरितः) जगत् में सूर्यरूप परमात्मा के कल्याण प्रसारक व्यापने वाले अज्ञान हरण करने वाले वेद एवं वेदप्रकाशक- वेदप्रचारक हैं (चित्राः-एतग्वाः-अनुसाद्यासः) अद्भुत ज्ञानशक्ति वाले इस समस्त जगत् को अपने ज्ञानस्वरूप से प्राप्त होने वाले सुखदायक और अनुमोदनीय हैं (नमस्यन्तः-दिवः पृष्ठम्-अस्थुः) ज्ञान प्रदानार्थ नमते हुए ज्ञान के पृष्ठ महान् आचार्य उस परमात्मा में आस्था रखते हैं (सद्यः-द्यावापृथिवी परियन्ति) वेद आरम्भ-सृष्टि से उत्पन्न पिता माता-पुरुष स्त्री वर्ग में तत्काल फैल जाते हैं ॥३॥
विशेष
ऋषिः– कुत्स आङ्गिरसः (स्तोमों लोकस्तरों का ज्ञान कर्ता अग्नि-तत्त्ववेत्ता) देवता- सूर्यः!
मराठी (1)
भावार्थ
माणसांनी श्रेष्ठ विद्या शिकविणाऱ्या शास्त्रवेत्त्या विद्वानांचा सत्कार करून त्यांच्याकडून विद्या शिकावी. गणित इत्यादी क्रिया चतुराईने ग्रहण कराव्यात. सूर्यासंबंधी व्यवहारांचे अनुष्ठान करून कार्यसिद्धी करावी. ॥ ३ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
The blissful rays of the sun, reddish, various and wondrous, exhilarating, invigorating overspread the expanse of heaven and constantly go over the regions of space across the sky and the earth.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The functions of the sun are told in the third Mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
Auspicious (benevolent) and admirable learned humble persons should know and utilize properly the swift and wonderful rays of the sun which go to (penetrate into) various objects and quickly circumambulate earth and heaven.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(अश्वा :) महान्तो व्यापनीला: किरणा: = Great and pervading rays. (हरितः) दिश: । हरित इति दिङ्नाम (निघ० १.६ ) = Directions. (एतग्वा:) एतान् प्रत्यक्षान् गच्छन्तीति एतग्वा: = Going to and penetrating into the visible objects.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
It is the duty of men to approach good and absolutely truthful persons, bow down before them, and receive from them the knowledge and practical application of mathematics and other subjects and accomplish their works with the help of dealings done in the light of the sun.
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