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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 26 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 26/ मन्त्र 7
    ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः देवता - अग्निः छन्दः - विराड्गायत्री स्वरः - षड्जः

    प्रि॒यो नो॑ अस्तु वि॒श्पति॒र्होता॑ म॒न्द्रो वरे॑ण्यः। प्रि॒याः स्व॒ग्नयो॑ व॒यम्॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्रि॒यः । नः॒ । अ॒स्तु॒ । वि॒श्पतिः॑ । होता॑म् । म॒न्द्रः । वरे॑ण्यः । प्रि॒याः । सु॒ऽअ॒ग्नयः॑ । व॒यम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रियो नो अस्तु विश्पतिर्होता मन्द्रो वरेण्यः। प्रियाः स्वग्नयो वयम्॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रियः। नः। अस्तु। विश्पतिः। होता। मन्द्रः। वरेण्यः। प्रियाः। सुऽअग्नयः। वयम्॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 26; मन्त्र » 7
    अष्टक » 1; अध्याय » 2; वर्ग » 21; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनरस्माभिः परस्परं कथं वर्त्तिव्यमित्युपदिश्यते॥

    अन्वयः

    हे मानवा ! यथा स्वग्नयो वयं राजप्रियाः स्मो यथा होता मन्द्रो वरेण्यो विश्पतिर्नः प्रियोऽस्ति तथाऽन्योऽपि प्रियोऽस्तु॥७॥

    पदार्थः

    (प्रियः) प्रीतिविषयः (नः) अस्माकम् (अस्तु) भवतु (विश्पतिः) विशां प्रजानां पालकः सभापती राजा। अत्र वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इति नियमात् व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयज० (अष्टा०८.२.३६) इति षत्वं न भवति (होता) यज्ञसम्पादकः (मन्द्रः) स्तोतुमर्हो धार्मिकः। अत्र स्फायितञ्चिवञ्चि० (उणा०२.१३) इति रक्प्रत्ययः। (वरेण्यः) स्वीकर्तुं योग्यः (प्रियाः) राज्ञः प्रीतिविषयाः। (स्वग्नयः) शोभनः सुखकारकोऽग्निः सम्पादितो यैस्ते (वयम्) प्रजास्था मनुष्याः॥७॥

    भावार्थः

    यथा वयं सर्वैः सह सौहार्देन वर्त्तामहेऽस्माभिः सह सर्वे वर्त्तेरंस्तथा यूयमपि वर्त्तध्वम्॥७॥

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    हिन्दी (5)

    विषय

    फिर हम लोगों को परस्पर किस प्रकार वर्त्तना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! जैसे (स्वग्नयः) जिन्होंने अग्नि को सुखकारक किया है, वे हम लोग (प्रियाः) राजा को प्रिय हैं, जैसे (होता) यज्ञ का करने-कराने (मन्द्रः) स्तुति के योग्य धर्मात्मा (वरेण्यः) स्वीकार करने योग्य विद्वान् (विश्पतिः) प्रजा का स्वामी सभाध्यक्ष (नः) हम को प्रिय है, वैसे अन्य भी मनुष्य हों॥७॥

    भावार्थ

    जैसे हम लोग सब के साथ मित्रभाव से वर्त्तते और ये सब लोग हम लोगों के साथ मित्रभाव और प्रीति से सब लोग वर्त्तते हैं, वैसे आप लोग भी होवें॥७॥

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    विषय

    फिर हम लोगों को परस्पर किस प्रकार वर्त्तना चाहिये, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    हे मानवा ! यथा स्वग्नयः वयं राजप्रियाः स्मः यथा होता मन्द्रः वरेण्यः विश्पतिः नः प्रियः अस्ति तथा अन्यः अपि प्रियः अस्तु॥७॥

    पदार्थ

    हे (मानवा)=मनुष्यो! (यथा)=जैसे,  (स्वग्नयः) शोभनः सुखकारकोऽग्निः सम्पादितो यैस्ते=जिन्होंने अग्नि को सुखकारक किया है, वे लोग, (वयम्) प्रजास्था मनुष्याः=प्रजा के हम लोग, (राजप्रियाः) राज्ञः प्रीतिविषयाः=राजा को प्रिय, (स्मः)=हैं, (यथा)=जैसे, (होता) यज्ञसम्पादकः=यज्ञ का करने-कराने वाला, (मन्द्रः) स्तोतुमर्हो धार्मिकः=स्तुति के योग्य धर्मात्मा, (वरेण्यः)=स्वीकार करने योग्य विद्वान्, (विश्पतिः) विशां प्रजानां पालकः सभापती राजा=प्रजा का स्वामी सभाध्यक्ष, (नः) अस्माकम्=हमारे, (प्रियः) प्रीतिविषयः=प्रिय विषय, (अस्ति)=है, (तथा)=वैसे ही, (अन्यः)=अन्य, (अपि)=भी, (प्रियः) प्रीतिविषयः=प्रिय  विषय, (अस्तु) भवतु=हो  ॥७॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    जैसे हम लोग सब के साथ सौहार्द  से व्यवहार करते हैं, हमारे साथ भी साथ सब वैसा ही व्यवहार करें और वैसे ही आप लोग भी व्यवहार करो॥७॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    हे (मानवा) मनुष्यो! (यथा) जैसे  (स्वग्नयः)  जिन्होंने अग्नि को सुखकारक किया है, वे (वयम्) प्रजा के हम लोग  (राजप्रियाः)  राजा को प्रिय (स्मः) हैं। (यथा) जैसे (होता) यज्ञ का करने-कराने वाला (मन्द्रः)  स्तुति के योग्य धर्मात्मा और (वरेण्यः) स्वीकार किये जाने योग्य विद्वान् (विश्पतिः) प्रजा का स्वामी सभाध्यक्ष (नः) हमको (प्रियः) प्रिय (अस्ति) हैं। (तथा) वैसे ही (अन्यः) अन्य (अपि) भी (प्रियः) प्रिय  (अस्तु) हों ॥७॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (प्रियः) प्रीतिविषयः (नः) अस्माकम् (अस्तु) भवतु (विश्पतिः) विशां प्रजानां पालकः सभापती राजा। अत्र वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इति नियमात् व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयज० (अष्टा०८.२.३६) इति षत्वं न भवति (होता) यज्ञसम्पादकः (मन्द्रः) स्तोतुमर्हो धार्मिकः। अत्र स्फायितञ्चिवञ्चि० (उणा०२.१३) इति रक्प्रत्ययः। (वरेण्यः) स्वीकर्तुं योग्यः (प्रियाः) राज्ञः प्रीतिविषयाः। (स्वग्नयः) शोभनः सुखकारकोऽग्निः सम्पादितो यैस्ते (वयम्) प्रजास्था मनुष्याः॥७॥
    विषयः- पुनरस्माभिः परस्परं कथं वर्त्तिव्यमित्युपदिश्यते॥

    अन्वयः- हे मानवा ! यथा स्वग्नयो वयं राजप्रियाः स्मो यथा होता मन्द्रो वरेण्यो विश्पतिर्नः प्रियोऽस्ति तथाऽन्योऽपि प्रियोऽस्तु॥७॥

    भावार्थः(महर्षिकृतः)- यथा वयं सर्वैः सह सौहार्देन वर्त्तामहेऽस्माभिः सह सर्वे वर्त्तेरंस्तथा यूयमपि वर्त्तध्वम्॥

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    विषय

    हमें प्रभु ही प्रिय हों

    पदार्थ

    १. संसार में दिव्यता की ओर चलने के लिए आवश्यक है कि (नः) - हमें वे प्रभु ही (प्रियः अस्तु) - प्रिय हों । हमारी रुचि प्रभु - प्राप्ति की ही हो । हम उस प्रभु को ही (विश्पतिः) - सब प्रजाओं का रक्षक जानें । 'हमारे भी रक्षक वे प्रभु ही हैं' , ऐसा समझ हम प्रभु को प्राप्त करने की ही कामनावाले हों । 

    २. वे प्रभु ही (होता) - हमें सब - कुछ देनेवाले हैं , वे ही हमारे जीवन - यज्ञ के चलानेवाले हैं ।

    ३. (मन्द्रः) - वे प्रभु स्वयं आनन्दमय हैं , हमें आनन्द देनेवाले हैं , अतः वे ही (वरेण्यः) - वरने के योग्य है । इस संसार में प्रकृति का चुनाव करके हम अपने जीवनों को आनन्दमय नहीं बना सकते । प्रकृति में स्वयं आनन्द नहीं , वह हमें क्या आनन्द प्राप्त कराएगी! आनन्द तो आनन्दमय प्रभु को पाने में ही है । 

    ४. (वयम्) - हम (स्वग्नयः) - उत्तम मातारूप दक्षिणाग्निवाले , उत्तम पितारूप गार्हपत्य अग्निवाले तथा उत्तम आचार्यरूप आहवनीय अग्निवाले बनकर (प्रियाः) - उस प्रभु के प्रिय हों । जब हम 'स्वग्नि' नहीं होते , हमें उत्तम माता , पिता और आचार्य प्राप्त नहीं होते तो हम प्रकृति की ओर झुकाववाले होकर विषयों में फंसकर अपनी शक्तियों को जीर्ण कर लेते हैं । निर्बल होकर हम प्रभु के प्रिय कैसे हो सकते हैं !

    भावार्थ

    भावार्थ - हम प्रभु को 'विश्पति , होता , मन्द्र व वरेण्य' जानें । उत्तम माता , पिता व आचार्य से सुशिक्षित होकर प्रभु के प्रिय बनें । 

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    Bhajan

    आज का वैदिक भजन 🙏 1118 
    ओ३म् प्रि॒यो नो॑ अस्तु वि॒श्पति॒र्होता॑ म॒न्द्रो वरे॑ण्यः ।
    प्रि॒याः स्व॒ग्नयो॑ व॒यम् ॥
    ऋग्वेद 1/26/7
    सामवेद 1619 

    अग्निरूप आत्मा से होवे
    शुभ दर्शन परमेश्वर का
    हर क्षण काल समय में होवे
    अन्तर्ध्यान सर्वेश्वर का
    अग्निरूप आत्मा से होवे

    धन बन्धु पुत धरा सम्पदा 
    तन सौन्दर्य विनेश्वर हैं
    उसमें अनुव्रत कभी न रहना 
    यह तो दु:ख के नश्तर हैं 
    अनुरत रहना प्रभु प्रेम में 
    पाना प्रेम जगदीश्वर का 
    अग्निरूप आत्मा से होवे

    महायज्ञ  परमेश्वर द्वारा
    देवे उन्नति ज्ञान समृद्धि 
    प्रेम किया जिसने ईश्वर से 
    पाई उसने सात्विक बुद्धि 
    प्रेम शक्ति से दीप जलाएँ  
    प्रभु का मन के भीतर का 
    अग्निरूप आत्मा से होवे

    एकमात्र हम सबका प्रभु ही 
    वरने योग्य सखा है हमारा 
    शुद्ध हृदय से रहें समर्पित 
    सदा रहे मन-चित उजियारा 
    उसे रिझायें नहीं गवाएँ 
    समय कभी भी पल भर का 
    अग्निरूप आत्मा से होवे

    भक्त रहे जो सदा प्रकाशित 
    तेजवन्त हो आत्मग्नि से 
    विस्तृत ज्ञान को आत्मसात करें 
    विनयशील निज शक्ति से 
    परोपकार से उर्ध्वगमन हो 
    मेल हो भक्त और ईश्वर का 
    अग्निरूप आत्मा से होवे

    आओ विश्व के प्रेमी लोगों! 
    निज आत्मग्नि को तुम प्रगटाओ 
    जिस सन्घर्ष से जागी है किरणें
    मन-चित्त  के आलोक जगाओ 
    भाव प्रशस्त विचार हों उत्तम 
    यही ध्येय हो जीवन का 
    अग्निरूप आत्मा से होवे
    शुभ दर्शन परमेश्वर का
    हर क्षण काल समय में होवे
    अन्तर्ध्यान सर्वेश्वर का
    अग्निरूप आत्मा से होवे

    रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
    रचना दिनाँक :-   03.06.1997   18.00pm
    राग :- मालगुंजी
    गायन समय रात्रि का दूसरा, ताल विलम्बित कहरवा 8 मात्रा
                          
    शीर्षक :- परमात्मा से प्रेम  भजन 691वां🎧
    *तर्ज :- *
    0121-721  

    विनश्वर = मिटाने वाला 
    अनुरत = आसक्त, लिप्त
    नश्तर = एक प्रकारकी नोकदारछुरी   
    ऊर्ध्वगमन = उन्नत होना, ऊंचे उठना
     

    Vyakhya

    प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :-- 👇👇

    परमात्मा से प्रेम
    हे मनुष्य भाइयों! हम अपने परमात्मा को, परम अग्नि को भूल गए हैं। हम यह भी भूल गए हैं कि हम स्वयं भी वास्तव में आत्मरूप हैं, आत्माग्नि है। इसलिए हम इस संसार की परम तुच्छ धनदौलत, माल- असबाब,पुत्र ,वधू, सुख, आराम, शरीर तथा सौंदर्य आदि विनश्वर वस्तुओं से तो इतना प्रेम करने लग गए हैं, इनमें इतने आसक्त लिप्त और अनुरक्त हो गए हैं कि हमें इस गंदी दलदल में से अब ऊपर उठना असंभव सा हो गया है, पर जो हमारा असली स्वामी, सखा और सब कुछ है, परम पवित्र प्रभु है, उसे हम दिन-रात के चौबीसों घंटों में से कुछ क्षण के लिए भी स्मरण नहीं करते। अब तो हम होश संभालें, जागें और अपने परम प्यारे अग्नि प्रभु को अपना लें। वही हम सब पर प्रजाओं का एकमात्र पति है, स्वामी है, वही हमें सब सुख का देने वाला 'मन्द्र' है, वही एकमात्र है जो कि हम सबका वरणीय और वही है जो कि अपने परम यज्ञ द्वारा हम प्रजाओं को सब -कुछ दे रहा है। अरे प्यारो! हम उसे छोड़ कर कहां प्रेम करने लगे? सच मुझमें अपनी प्रेम शक्ति का अभी तक घोर दुरुपयोग किया है। क्या प्रेम-जैसी पवित्र वस्तु हमें इन अशुचि, तुच्छ, अनित्य वस्तुओं में रखने के लिए ही दी गई थी? आओ, अब तो हम अपने प्रेम के लक्ष्य को पा लेवें और उस 'मन्द्र' 'विश्वपति'को, वरेण्य 'होता' को अपना प्यारा बना लेवें, अपना प्रेम समर्पण कर देवें।
    किन्तु इस तरह प्रेमपथ पर चल देने पर हे भाइयों! हमें भी उसे रीझाना उसे प्रसन्न करना होगा, उसके प्रेम को अपने प्रति आकर्षित करना अर्थात् था में भी उसका प्यारा बनना होगा; और उसके प्यारे तो हम तभी बन सकते हैं जब हम "स्वग्नि" बन जाएं, उत्तम प्रकार की आत्माएं बन जाएं, अतः आओ, हम सब मनुष्य अपने उस परम प्यारे के लिए अपनी आत्माओं को शुद्ध करें। उस बृहद् अग्नि के लिए अपनी अग्नियों को उत्तम प्रकार की बना लेवें। अब हमारी आत्मग्नि से विश्वप्रेम की सुन्दर किरणें ही प्रसारित होवें, हमारी बुद्धि-अग्नि मैं से सत्य की ज्योति ही निकले, हमारी चित अग्नि से पवित्र इच्छाएं वह भावनाएं ही उठे। इस प्रकार हम उत्तम अग्नि वाले हो जाएं, क्योंकि इसी प्रकार वह हमारा प्यारा हमसे प्रसन्न होगा। इसी प्रकार हमें अपने प्यारे को रीझाना है।

    🕉🧘‍♂️ ईश भक्ति भजन 
    भगवान ग्रुप द्वारा 🎧🙏
    वैदिक श्रोताओं को हार्दिक शुभ कामनाएं ❗

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    विषय

    परमेश्वर से प्रार्थना ।

    भावार्थ

    ( होता ) सुखों, ऐश्वर्यों के देने वाला (वरेण्यः) वरण करने योग्य, चुन लेने योग्य, ( मन्द्रः ) सदा स्वयं प्रसन्न, सबको प्रसन्न करने हारा, स्तुति योग्य, अति सुस्वभाव (विश्पतिः) प्रजाओं का पालक, स्वामी, राजा ( नः ) हमारा ( प्रियः अस्तु ) प्रिय, प्रीतिपात्र हो । और अग्निहोत्र या यज्ञ में श्रेष्ठ होता से जिस प्रकार हम ( सु-अग्नयः ) उत्तम यज्ञाग्नियुक्त होकर सब बन्धु-बान्धवों के प्रिय हो जाते हैं उसी प्रकार पूर्वोक्त राजा से ही ( वयम् ) हम सब प्रजाजन भी ( स्वग्नयः ) उत्तम अग्नि के समान तेजस्वी, शत्रुसंतापक, ज्ञान बलप्रद राजारूप अग्नि से युक्त होकर (प्रियाः) सबके प्रेमपात्र और परस्पर प्रीतियुक्त हों ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शुनःशेप आजीगर्त्तिर्ऋषिः ॥ अग्निर्देवता ॥ छन्दः—१-८, ९ आर्ची उष्णिक् । २-६ निचृद्गायत्री । ३ प्रतिष्ठा गायत्री । ४, १० गायत्री । ५, ७ विराड् गायत्री । दशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    (हे माणसांनो) जसे आम्ही सर्वांबरोबर मैत्रीभावाने वागतो व हे सर्व लोक आमच्याबरोबर मैत्रीभावाने वागतात तसे तुम्हीही वागा. ॥ ७ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    May the happy, charming and venerable ruler of the people, worthy of choice, be dear to us. May the venerable people who offer yajna in honour of Agni, eternal lord of cosmic yajna, and the leader of the people, be dear to us.

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    Subject of the mantra

    Then, how should we behave mutually? This subject has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (mānavā)= humans, (yathā)=as, (svagnayaḥ) =those, who have made the fire pleasant, [ve]=they, (vayam)=we people of the state, (rājapriyāḥ)=dear to the king, (smaḥ)=are, (yathā)=as, (hotā)=performer and guide of the yajan, (mandraḥ)=worthy of praise righteous, [aura]=and, (vareṇyaḥ)=the scholar to be acknowledged, (viśpatiḥ)=lord of the public as the chairman, (naḥ)=to us, (priyaḥ)=dear, (asti)=is, (tathā)=in the same way, (anyaḥ)=others, (api)=as well, (priyaḥ)=dear, (astu)=be.

    English Translation (K.K.V.)

    O humans! As those who have made the fire pleasant, we people of the state are dear to the king, as the performer and guide of the yajan and worthy of praise, righteous, the scholar to be acknowledged, and Lord of the public as chairman(God) is dear to us, in the same way others be dear as well.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    Just like we treat everyone with cordiality, everyone should treat us in the same way and in the same way you treat as well.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How should we deal with one another is taught in the seventh Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O men, as we (subjects) who perform Yajnas well and who use fire that gives us happiness for various purposes are loved by the rulers and the protector of men (the President) who performs Yajnas, is praise-worthy righteous person elected by us is dear to us, so let all others have love towards one another.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    ( विश्पतिः) विशां प्रजानां पालकः सभापती राजा । = President King who is the protector of his subjects. (मन्द्रः) स्तोतुर्मों धार्मिक: अत्र स्फायि तंचि वंचि मन्दिचन्दि-शुभिययो रक् ( उणा० २.१३) इति रक् प्रत्ययः । = Praiseworthy righteous person. (स्वग्नयः ) शोभन: सुखकारकोऽग्निः सम्पादितो यैस्ते । = Who use properly fire that gives happiness. ( मदि-स्तुति मोद मद स्वप्नकान्तिगतिषु | = Here the first meaning of स्तुति or praise has been taken) Tr.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    As we deal with all in a friendly manner and others deal with us in the same way, so you should also do.

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