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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 33 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 33/ मन्त्र 7
    ऋषिः - हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः देवता - इन्द्र: छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    त्वमे॒तान्रु॑द॒तो जक्ष॑त॒श्चायो॑धयो॒ रज॑स इन्द्र पा॒रे । अवा॑दहो दि॒व आ दस्यु॑मु॒च्चा प्र सु॑न्व॒तः स्तु॑व॒तः शंस॑मावः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्वम् । ए॒तान् । रु॒द॒तः । जक्ष॑तः । च॒ । अयो॑धयः । रज॑सः । इ॒न्द्र॒ । पा॒रे । अव॑ । अ॒द॒हः॒ । दि॒वः । आ । दस्यु॑म् । उ॒च्चा । प्र । सु॒न्व॒तः । स्तु॒व॒तः । शंस॑म् । आ॒वः॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्वमेतान्रुदतो जक्षतश्चायोधयो रजस इन्द्र पारे । अवादहो दिव आ दस्युमुच्चा प्र सुन्वतः स्तुवतः शंसमावः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्वम् । एतान् । रुदतः । जक्षतः । च । अयोधयः । रजसः । इन्द्र । पारे । अव । अदहः । दिवः । आ । दस्युम् । उच्चा । प्र । सुन्वतः । स्तुवतः । शंसम् । आवः॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 33; मन्त्र » 7
    अष्टक » 1; अध्याय » 3; वर्ग » 2; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    (त्वम्) युद्धविद्याविचक्षणः (एतान्) परपीड़ाप्रदान् शत्रून् (रुदतः) रोदनं कुर्वतः (जक्षतः) भक्षणसहने# कुर्वतः (च) समुच्चये (अयोधयः) सम्यक् योधय। अत्र लोडर्थे लङ्। (रजसः) पृथिवीलोकस्य। लोका रजांस्युच्यन्ते। निरु० ४।१४। (इन्द्र) राज्यैश्वर्ययुक्त (पारे) परभागे (अव) अर्वागर्थे (अदहः) दह (दिवः) सुशिक्षयेश्वरधर्मशिल्पयुद्धविद्यापरोपकारादिप्रकाशात् (आ) समन्तात् (दस्युम्) बलादन्यायेन परपदार्थहर्त्तारम् (उच्चा) उच्चानि सुखानि कर्माणि वा (प्र) प्रकृष्टार्थे (सुन्वतः) निष्पादयतः (स्तुवतः) गुणस्तुतिं कुर्वतः (शंसम्) शंसंति येन शास्त्रबोधेन तम् (आवः) रक्ष प्राप्नुहि वा ॥७॥ # [हसने। सं०]

    अन्वयः

    पुनरिन्द्रशब्देन शूरवीरकर्त्तव्यमुपदिश्यते।

    पदार्थः

    हे इन्द्र सेनैश्वर्ययुक्त सेनाध्यक्ष त्वमेतान् दुष्टकर्मकारिणो रुदतो रोदनं कुर्वतो शत्रून् जन्तून् वा दस्युं च स्वकीयभृत्यान् जक्षतो बहुविधभोजनादिप्रापितान् कारितहर्षाँश्चायोधयः। एतान् धर्मशत्रून् रजसः पारे कृत्वाऽवादहः। एवं दिव उच्चोत्कृष्टानि कर्माणि प्रसुन्वत आस्तुवतस्तेषां शंसं च प्रावः ॥७॥

    भावार्थः

    मनुष्यैर्युद्धार्थे विविधं कर्म कर्त्तव्यम्। प्रथमं स्वसेनास्थानां पुष्टिहर्षकरणं दुष्टानां बलोत्साहभंजनसंपादनं नित्यं कार्यम्। यथा सूर्यः स्वकिरणैः सर्वान् प्रकाश्य वृत्रान्धकारनिवारणाय प्रवर्त्तते तथा सर्वदोत्तमकर्मगुणप्रकाशनाय दुष्टकर्मदोषनिवारणाय च नित्यं प्रयत्नः कर्त्तव्य इति ॥७॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर अगले मन्त्र में इन्द्रशब्द से शूरवीर के काम का उपदेश किया है।

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) सेना के ऐश्वर्य से युक्त सेनाध्यक्ष ! (त्वम्) आप (एतान्) इन दूसरों को पीड़ा देने दुष्टकर्म करनेवाले (रुदतः) रोते हुए जीवों (च) और (दस्युम्) डाकुओं को दण्ड दीजिये तथा अपने भृत्यों को (जक्षतः) अनेक प्रकार के भोजन आदि देते हुए आनन्द करनेवाले मनुष्यों को उनके साथ (अयोधयः) अच्छे प्रकार युद्ध कराइये और इन धर्म के शत्रुओं को (रजसः) पृथिवी लोक के (पारे) परभाग में करके (अवादहः) भस्म कीजिये इसी प्रकार (दिवः) उत्तम शिक्षा से ईश्वर धर्म शिल्प युद्धविद्या और परोपकार आदि के प्रकाशन से (उच्चा) उत्तम-२ कर्म वा सुखों को (प्रसुन्वतः) सिद्ध करने तथा (आस्तुवतः) गुणस्तुति करनेवालों की (आवः) रक्षा कीजिये और उनकी (शंसम्) प्रशंसा को प्राप्त हूजिये ॥७॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को युद्ध के लिये अनेक प्रकार के कर्म करने अर्थात् पहिले अपनी सेना के मनुष्यों की पुष्टि आनन्द तथा दुष्टों का दुर्बलपन वा उत्साहभंग नित्य करना चाहिये जैसे सूर्य अपनी किरणों से सबको प्रकाशित करके मेघ के अन्धकार निवारण के लिये प्रवृत्त होता है वैसे सब काल में उत्तम कर्म वा गुणों के प्रकाश और दुष्ट कर्म दोषों की निवृत्ति के लिये नित्य यत्न करना चाहिये ॥७॥

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    विषय

    फिर इस मन्त्र में इन्द्रशब्द से शूरवीर के काम का उपदेश किया है।

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    हे इन्द्र सेनैश्वर्ययुक्त सेनाध्यक्ष त्वम् एतान् दुष्टकर्मकारिणः रुदतः (रोदनं कुर्वतः शत्रून् जन्तून् वा) दस्युं च स्वकीय भृत्यान् जक्षतः बहुविधभोजनादि प्रापितान् कारितहर्षान् च अयोधयः एतान् धर्मशत्रून् रजसः पारे कृत्वा अव अदहः एवं दिवः उच्च उत्कृष्टानि कर्माणि प्रसुन्वत आ स्तुवतः तेषां शंसं च प्रावः ॥७॥

    पदार्थ

    हे  (इन्द्र) राज्यैश्वर्ययुक्त सेनैश्वर्ययुक्त सेनाध्यक्ष इन्द्र=राज्य और सेना के ऐश्वर्य से युक्त सेनाध्यक्ष ! (त्वम्) युद्धविद्याविचक्षणः=युद्धविद्या में चतुर आप, (एतान्) परपीड़ाप्रदान् शत्रून्=इन दूसरों को पीड़ा देने वाले शत्रुओं, और (दुष्टकर्मकारिणः)=दुष्ट कर्म करने वालों को, (रुदतः) रोदनम् कुर्वतः शत्रून् जन्तून् वा=रोदन करने वाले शत्रुओं को, (दस्युम्) बलादन्यायेन परपदार्थहर्त्तारम्=बलपूर्वक पदार्थों को हरने वाले डाकुओं को दण्ड दीजिये (च) समुच्चये=और, (स्वकीय)=अपने, (भृत्यान्)=भृत्यों का, (जक्षतः) भक्षणसहने कुर्वतः=भक्षण सहन करते हुए, (बहुविधभोजनादि)=अनेक प्रकार के भोजन आदि, (प्रापितान्)=देते हुए, (कारितहर्षान्)=आनन्द करनेवाले मनुष्यों को, (च) समुच्चये=और, (अयोधयः) सम्यक् योधय=अच्छे प्रकार युद्ध कराइये। (एतान्)= इन,  (धर्मशत्रून्)=धर्म के शत्रुओं को, (रजसः) पृथिवीलोकस्य=पृथिवी लोक के, (पारे) परभागे=परभाग में, (कृत्वा)=करके, (अव) अर्वागर्थे=समीप में (अदहः)दह=भस्म कीजिये, (एवम्)=इसी प्रकार, सुशिक्षयेश्वरधर्मशिल्पयुद्धविद्यापरोपकारादिप्रकाशात्=उत्तम शिक्षा से ईश्वर धर्म शिल्प युद्धविद्या और परोपकार आदि के प्रकाशन से, (उत्कृष्टानि)=उत्कृष्ट,  (कर्माणि)=कर्मों का, (प्र) प्रकृष्टार्थे=प्रकृष्ट रूप से, (सुन्वतः) निष्पादयतः=निष्पादन करते हुए, (आ) समन्तात्=हर ओर से, (स्तुवतः)= गुणस्तुति करनेवाले,  (तेषाम्)=उनकी, (शंसम्) शंसंति येन शास्त्रबोधेन तम्=जिस शास्त्र के ज्ञान से  प्रशंसा होती है, उसको, (च) समुच्चये=और, (प्र) प्रकृष्टार्थे=प्रकृष्ट रूप  (आवः) समन्तादवति अवेत्=हर ओर से रक्षा करें ॥७॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    मनुष्यों के द्वारा युद्ध के लिये अनेक प्रकार के कर्म करने होते हैं। पहला अपना सेना में स्थान पुष्ट करते हुए प्रसन्नता करना, दुष्टों के बल और उत्साह को नित्य नष्ट करना चाहिए।  जैसे सूर्य अपनी किरणों से सबको प्रकाशित करके मेघ के अन्धकार को दूक करने के लिये प्रवृत्त होता है, वैसे सर्वदा में उत्तम कर्म और गुणों के प्रकाश के लिए, दुष्ट कर्मों के दोषों के निवारण के लिए नित्य प्रयत्न करना चाहिये ॥७॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    हे  (इन्द्र) राज्य और सेना के ऐश्वर्य से युक्त सेनाध्यक्ष ! (त्वम्) युद्धविद्या में चतुर आप (एतान्) इन दूसरों को पीड़ा देने वाले शत्रुओं और (दुष्टकर्मकारिणः) दुष्ट कर्म करने वालों को (रुदतः) रोदन करने वाले शत्रुओं को तथा (दस्युम्) बलपूर्वक पदार्थों को हरने वाले डाकुओं को दण्ड दीजिये (च) और (स्वकीय) अपने (भृत्यान्) भृत्यों का (जक्षतः) भक्षण सहन करते हुए (बहुविधभोजनादि) अनेक प्रकार के भोजन आदि (प्रापितान्) देते हुए (कारितहर्षान्) आनन्द करनेवाले मनुष्यों को (च) और (अयोधयः) अच्छे प्रकार युद्ध कराइये। (एतान्) इन (धर्मशत्रून्) धर्म के शत्रुओं को (रजसः) पृथिवी लोक के, (पारे) परभाग में (कृत्वा) करके (अव) समीप में (अदहः) भस्म कीजिये। (एवम्) इसी प्रकार, उत्तम शिक्षा से ईश्वर धर्म शिल्प युद्धविद्या और परोपकार आदि के प्रकाशन से (उत्कृष्टानि) उत्कृष्ट  (कर्माणि) कर्मों का (प्र) प्रकृष्ट रूप से (सुन्वतः) निष्पादन करते हुए (आ) हर ओर से, (स्तुवतः) गुणस्तुति करनेवाले  (तेषाम्) उनकी (शंसम्) जिस शास्त्र के ज्ञान से  प्रशंसा होती है, उसकी (च) और (प्र) प्रकृष्ट रूप से (आवः) हर ओर से रक्षा करें ॥७॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (त्वम्) युद्धविद्याविचक्षणः (एतान्) परपीड़ाप्रदान् शत्रून् (रुदतः) रोदनं कुर्वतः (जक्षतः) भक्षणसहने# कुर्वतः (च) समुच्चये (अयोधयः) सम्यक् योधय। अत्र लोडर्थे लङ्। (रजसः) पृथिवीलोकस्य। लोका रजांस्युच्यन्ते। निरु० ४।१४। (इन्द्र) राज्यैश्वर्ययुक्त (पारे) परभागे (अव) अर्वागर्थे (अदहः) दह (दिवः) सुशिक्षयेश्वरधर्मशिल्पयुद्धविद्यापरोपकारादिप्रकाशात् (आ) समन्तात् (दस्युम्) बलादन्यायेन परपदार्थहर्त्तारम् (उच्चा) उच्चानि सुखानि कर्माणि वा (प्र) प्रकृष्टार्थे (सुन्वतः) निष्पादयतः (स्तुवतः) गुणस्तुतिं कुर्वतः (शंसम्) शंसंति येन शास्त्रबोधेन तम् (आवः) रक्ष प्राप्नुहि वा ॥७॥ # [हसने। सं०]
    विषयः- पुनरिन्द्रशब्देन शूरवीरकर्त्तव्यमुपदिश्यते।

    अन्वयः- हे इन्द्र सेनैश्वर्ययुक्त सेनाध्यक्ष त्वमेतान् दुष्टकर्मकारिणो रुदतो रोदनं कुर्वतो शत्रून् जन्तून् वा दस्युं च स्वकीयभृत्यान् जक्षतो बहुविधभोजनादिप्रापितान् कारितहर्षाँश्चायोधयः। एतान् धर्मशत्रून् रजसः पारे कृत्वाऽवादहः। एवं दिव उच्चोत्कृष्टानि कर्माणि प्रसुन्वत आस्तुवतस्तेषां शंसं च प्रावः ॥७॥

    भावार्थः(महर्षिकृतः)- मनुष्यैर्युद्धार्थे विविधं कर्म कर्त्तव्यम्। प्रथमं स्वसेनास्थानां पुष्टिहर्षकरणं दुष्टानां बलोत्साहभंजनसंपादनं नित्यं कार्यम्। यथा सूर्यः स्वकिरणैः सर्वान् प्रकाश्य वृत्रान्धकारनिवारणाय प्रवर्त्तते तथा सर्वदोत्तमकर्मगुणप्रकाशनाय दुष्टकर्मदोषनिवारणाय च नित्यं प्रयत्नः कर्त्तव्य इति ॥७॥
     

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    विषय

    रोतों व हँसतों को

    पदार्थ

    १. वासनाओं का संसार ऐसा है कि इसमें फंसकर मनुष्य एक मिनट खद्र - पी व हँस रहा है [जक्ष भक्षहसनयोः] तो दूसरे ही मिनट रो रहा होता है [रुद्], अतः इन वृत्र [वासना] के अनुचरों को यहाँ प्रस्तुत मन्त्र में [रुदतः - जक्षतः] इन शब्दों से स्मरण किया गया है । हे (इन्द्र) - जितेन्द्रिय पुरुष! (त्वम्) - तू (एतान्) - इन (रुदतः जक्षतः) - रोते व हँसते, रुलाते व हँसाते काम - क्रोधादि को (अयोधयः) - युद्ध में सम्मुख करता है, और तू इन्हें (रजसः पारे) - लोकों के पार पहुँचा देता है, अथवा अन्तरिक्ष के पार फेंक देता है । सात - समुद्र पार पहुँचा देने की भाँति लोकों के पार पहुंचा देना भी यहाँ एक सुन्दर पद - विन्यास [ईडियम] है । इन्द्र के सामने ये वृत्रानुचर ठहर नहीं सकते और दूर भाग खड़े होते हैं । 
    २. हे इन्द्र ! तू (दिवः, आ) - अपने ज्ञान के प्रकाश से (दस्युम्) - विनाशक कामरूप शत्रु को (अवादहः) - दग्ध कर देता है । 
    ३. इस प्रकार काम को नष्ट करके (प्रसुन्वतः) - प्रकर्षेण सोमाभिषव करते हुए यज्ञादि करते हुए तथा (उच्चा स्तुवतः) - खूब उच्च स्वर में स्तवन करते हुए पुरुष के (शंसम्) - प्रशंसनीय जीवन को (आवः) - अपने में सुरक्षित करता है । 
     

    भावार्थ

    भावार्थ - वासनाओं में फंसकर हम एक मिनट हँस रहे होते हैं तो दूसरे मिनट रो रहे होते हैं । इनको नष्ट करके हमें यज्ञशील व स्तवन करनेवाले के प्रशस्त जीवन को अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए । 
     

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    विषय

    वीर योद्धा का शत्रु विजय, सेनापति ।

    भावार्थ

    हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् ! राज्य के स्वामिन् ! (त्वम्) तू (एतान्) इन (रुदतः) रोते हुए और (जक्षतः च) खाते पीते और नाना विनोद क्रीड़ाएं करते हुए भोगी विलासी पुरुषों को (रजसः) लोकों से (पारे) परे पृथक करके (अयोधयः) उनसे युद्ध कर। और (दस्युम्) प्रजा के नाशक दुष्ट पुरुष को (दिवः) अपने प्रखर तेज से (अव अदहः) सूर्य के समान जला दे । और (सुन्वतः) राज्याभिषेक करने वाले एवं (स्तुवतः) तेरी स्वामी रूप से गुण स्तुति करते और प्रस्ताव करनेवाले विद्वान् गण के (शंसम्) उपदेश और उत्तम ख्याति को (आवः) ध्यान में रख, उसकी रक्षा कर ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    हिरण्यस्तूप आङ्गिरस ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ शेषाः त्रिष्टुभः । १४, १५ भुरिक् पंक्तिः । पञ्चदशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी युद्धासाठी अनेक प्रकारची कार्ये करावीत. अर्थात प्रथम आपल्या सेनेतील लोकांची पुष्टी करून त्यांना आनंदी करावे. दुष्ट लोकांना निर्बल करावे व सतत त्यांचा उत्साह भंग करावा. जसा सूर्य आपल्या किरणांनी मेघांचा अंधःकार निवारण करतो तसे सदैव उत्तम कर्म करून गुणांचा प्रकाश करून दुष्ट कर्मदोषांच्या निवारणासाठी नित्य प्रयत्न करावेत. ॥ ७ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Indra, ruler and commander, fight out these ogres and those, weeping and wailing, away from the middle regions of the dominion. Throw off the wicked from the higher regions, and from higher positions. Raise those who are creators of soma, peace and joy. Protect those who appreciate and raise the honour of the world and humanity.

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    Subject of the mantra

    Then again, by the term “Indra” deeds of heroes have been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (indra)=The Chief of Army Staff with the opulence of the State and the Army, (tvam)=clever in warfare you, (etān)=these enemies tormenting others,śatruoṃ [aura]=and, (duṣṭakarmakāriṇaḥ)=doers of evil deeds, (rudataḥ)=to crying enemies, [tathā]=and, (dasyum)=punish the bandits who destroy things by force, (ca)=and, (svakīya)=their, (bhṛtyān)=of servants, (jakṣataḥ)=bearing the devouring, (bahuvidhabhojanādi)=variety of food etc. (prāpitān)=giving, (kāritaharṣān)=to people who enjoy, (ca)=and, (ayodhayaḥ)=make fight well, (etān)=to these, (dharmaśatrūn)=to enemies of righteousness, (rajasaḥ) =of the earh, (pāre)=at the end, (kṛtvā)=by doing, (ava)=nearby, (adahaḥ)=reduce to ashes, (evam)=likewise by the promulgation of the best education to God religion, craftsmanship and charity etc. (utkṛṣṭāni)=excellent, (karmāṇi)=of deeds, (pra)=apparently, (sunvataḥ)=while executing, (ā)=from all sides, (stuvataḥ)=praising qualities, (teṣām)=their,(śaṃsam)=the knowledge of scripture which is praised, to that, (ca)=and, (pra)=apparently, (āvaḥ) protect him from all sides.

    English Translation (K.K.V.)

    O chief of the army staff with the majesty of the army! Clever in warfare, you are the enemy who torments others and punishes those who do evil deeds, the enemies who cry, and the bandits who destroy things by force and while bearing the devouring of your servants, gives many types of food etc., makes the people who enjoy themselves fight in a better way. Reduces to ashes the enemies of these righteousness in the end part of the earth, burns them nearby and the knowledge of the scriptures, which praises them from all sides, while performing their excellent deeds in an apparent manner by the promulgation of charity etc. Protect him from all sides.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    Many types of actions have to be done by human beings for war. First of all, one should be happy while confirming his place in the army, the power and enthusiasm of the wicked should be destroyed every day. Just as the Sun tends to dispel the darkness of the cloud by illuminating all with its rays, in the same way one should always strive for the light of good deeds and virtues, to remove the defects of evil deeds.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    By the use of the word Indra, the duties of a hero are taught.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O Commander of the army, you should induce your servants or sub-ordinates whom you feed properly and gladden to fight with those unrighteous persons who commit sins, who unjustly take away other's property and then have to weep as a consequence. You should send these enemies of righteousness far away from the world and burn them up or consume. You should protect and preserve those persons who are engaged in doing noble deeds and who praise God.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (इन्द्र) सेनैश्वर्ययुक्त = O commander of the army, possessing wealth. ( दस्युम् ) बलात् अन्यायेन परपदार्थहर्तारम् = Robber who takes away other's property un-justly and forcibly. ( रजत: ) पृथिवीलोकस्य = Of the earth. लोका रजांस्युच्यन्ते ( निरु० ४.१४)

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Men should do various acts in connection with a war. The first is to please and feed properly the soldiers of one's own army and the second to diminish the force and zeal of the un-righteous foes. As the sun gives light to all and dispels all darkness, in the same way, a person should manifest all noble virtues and eliminate all evils and defects.

    Translator's Notes

    इन्द्र-इदि परमैश्वेर्य = Lord of wealth and Commander of an army. सेना इन्द्रस्य पत्नी ( गोपवाब्रह्मणे उ० २.९) = According to this Brahmanic passage, सेना or army is the wife of Indra. Therefore it is evident, that the word Indra stands for the Commander of an army as pointed out before. It is stated in the Aitareya Brahmana 7.16, 8.12. इन्द्रो वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठ: सहिष्ठ सत्तमः पारयिष्णुतमः (ऐतरेय ब्रा० ७.१६.८.१२ ) = It is stated in the Kaushitaki Brahmana of the Rigveda 6.14. इन्द्रो वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठ: (कौषीतकी ब्रा० ६.१४) In both these passages, Indra is said to be the mightiest and most powerful among all the devas, which also means soldiers who desire to conquer from दिबु-क्रीडाविजिगीषा Thus also it is clear that in the Vedic Literature, the word Indra is used for the Chief Commander of an army.

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