ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 45/ मन्त्र 3
ऋषिः - प्रस्कण्वः काण्वः
देवता - अग्निर्देवाः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
प्रि॒य॒मे॒ध॒वद॑त्रि॒वज्जात॑वेदो विरूप॒वत् । अ॒ङ्गि॒र॒स्वन्म॑हिव्रत॒ प्रस्क॑ण्वस्य श्रुधी॒ हव॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठप्रि॒य॒मे॒ध॒ऽवत् । अ॒त्रि॒ऽवत् । जात॑ऽवेदः । वि॒रू॒प॒ऽवत् । अ॒ङ्गि॒र॒स्वत् । म॒हि॒ऽव्र॒त॒ । प्रस्क॑ण्वस्य । श्रु॒धि॒ । हव॑म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत् । अङ्गिरस्वन्महिव्रत प्रस्कण्वस्य श्रुधी हवम् ॥
स्वर रहित पद पाठप्रियमेधवत् । अत्रिवत् । जातवेदः । विरूपवत् । अङ्गिरस्वत् । महिव्रत । प्रस्कण्वस्य । श्रुधि । हवम्॥
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 45; मन्त्र » 3
अष्टक » 1; अध्याय » 3; वर्ग » 31; मन्त्र » 3
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अष्टक » 1; अध्याय » 3; वर्ग » 31; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
(प्रियमेधवत्) प्रिया तृप्ता कमनीया प्रदीप्ता मेधा बुद्धिर्यस्य तेन तुल्यः (अत्रिवत्) न विद्यन्ते त्रयआध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकास्तापा यस्य तद्वत् (जातवेदः) यो जातेषु पदार्थेषु विद्यते सः (विरूपवत्) विविधानि रूपाणि यस्य तद्वत् (जातवेदः) यो जातेषु पदार्थेषु विद्यते सः (विरूपवत्) विविधानि रूपाणि यस्य तद्वत् (अंगिरस्वत्) योऽङ्गानां रसः प्राणस्तद्वत् (महिव्रत) महि महद्व्रतं शीलं यस्य सः (प्रस्कण्वस्य) प्रकृष्टश्चासौ कण्वो मेधावी (श्रुधी) शृणु। अत्र #व्यत्ययो द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (हवम्) ग्राह्यं देयमध्ययनाध्यापनाख्यं व्यवहारम्। यास्कमुनिरेषमिमं मंत्रं व्याख्यातवान्। प्रियमेधः प्रिया अस्य मेधा यथैतेषामृषीणामेवं प्रस्कण्वस्य शृणु ह्णनम्। प्रस्कण्वः कण्वस्य पुत्रः कण्वस्य प्रभवो यथा प्राग्रमिति। विरूपो नानारूपो महिव्रतो महाव्रत इति। निरु० ३।१७। ॥३॥ #[‘विष्करण व्यत्ययः’ इत्यर्थः। सं०]
अन्वयः
पुनः स किंकुर्यादित्युपदिश्यते।
पदार्थः
हे जातवेदो महिव्रत ! विद्वँस्त्वं प्रियमेधवदत्रिवद्विरूपवदङ्गिरस्वत्प्रकण्वस्य हवं श्रुधि ॥३॥
भावार्थः
अत्रोपमालंकारः। हे मनुष्य ! यथा सर्वस्य प्रियकारिणो जनाः कायिकवाचिकमानसदोषरहिता नानाविद्याप्रत्यक्षाः स्वप्राणवत्सर्वान् जानन्तो विद्वांसो मनुष्याणां प्रियाणि कार्य्याणि साध्नुयुस्तथा यूयमप्याचरत ॥३॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।
पदार्थ
हे (जातवेदः) उत्पन्न हुए पदार्थों को जानने हारे (महिव्रत) बड़े व्रत युक्त विद्वान् ! आप (प्रियमेधवत्) विद्याप्रिय बुद्धि वाले के तुल्य (अत्रिवत्) तीन अर्थात् शरीर अन्य प्राणी और मन आदि इन्द्रियों के दुःखों से रहित के समान (विरूपवत्) अनेक प्रकार के रूपवाले के तुल्य (अङ्गिरस्वत्) अङ्गों के रसरूप प्राणों के सदृश (प्रस्कण्वस्य) उत्तम मेधावी मनुष्य के (हवम्) देने-लेने पढ़ने-पढ़ाने योग्य व्यवहार को (श्रुधि) श्रवण किया करें ॥३॥
भावार्थ
इस मंत्र में उपमालंकार है। हे मनुष्यो ! जैसे सबके प्रिय करनेवाले विद्वान् लोग शरीर, वाणी और मन के दोषों से रहित नानाविद्याओं को प्रत्यक्ष करने और अपने प्राण के समान सबको जानते हुए विद्वान् लोग मनुष्यों के प्रिय कार्य्यों को सिद्ध करते हैं और जैसे पढ़ाये हुए बुद्धिमान् विद्यार्थी भी बहुत उत्तम-२ कार्य्यों को सिद्ध कर सकें वैसे तुम भी किया करो ॥३॥
विषय
'प्रियमेध - अत्रि - विरूप व अङ्गिरस' - 'प्रस्कण्व' जीवन का सन्मार्ग
पदार्थ
१. हे (जातवेदः) - सर्वज्ञ ! (महिव्रत) - महनीय व्रतों व कर्मोंवाले प्रभो ! आप (प्रस्कण्वस्य) - मुझ मेधावी की (हवम्) - पुकार को, प्रार्थना को (श्रुधी) - सुनिए । उसी प्रकार सुनिए (इव) - जिस प्रकार [क] (प्रियमेधवत्) - प्रियमेध की प्रार्थना को आप सुनते हैं । 'प्रिय है मेधा जिसको' उस ज्ञान की रुचिवाले, बुद्धि का सम्पादन करनेवाले व्यक्ति की प्रार्थना को प्रभु अवश्य सुनते हैं । [ख] (अत्रिवत्) - जिस प्रकार आप 'अत्रि' की प्रार्थना को सुनते हैं । 'अविद्यमानास्त्रयो यस्मिन्' - 'काम - क्रोध व लोभ' ये तीनों, गीता के शब्दों में नरक के द्वार - जिसमें नहीं हैं, उस व्यक्ति की प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है । [ग] (विरूपवत्) - जिस प्रकार आप विरूप की प्रार्थना को सुनते हैं । स्वास्थ्य, मन की निर्मलता व ज्ञान के द्वारा जिसका चेहरा चमकता है, उसकी प्रार्थना को प्रभु सुनते हैं । मैं भी विरूप बनें, जिससे मेरी प्रार्थना भी सुनी जाए । [घ] (अङ्गिरस्वत्) - अङ्गिरस की भाँति मेरी प्रार्थना को भी सुनिए । जो व्यक्ति आसमन्तात् उत्तम व्यायामादि को अपनाकर युक्ताहार - विहार से अपने शरीर के अङ्ग - प्रत्यङ्ग को रसमय बनाये रखता है, उसकी प्रार्थना को ही प्रभु सुनते हैं । स्वास्थ्य का ध्यान न करके, युक्ताहार - विहार न करते हुए हम यदि शरीर को सूखे काठ की भाँति जीर्णशक्ति कर लेते हैं तो हम प्रभु के प्रिय नहीं बन सकते । प्रभु के दिये हुए इस शरीर - मन्दिर को सुन्दर बनाये रखना आवश्यक है ।
भावार्थ
भावार्थ - हम 'प्रियमेध, अत्रि, विरूप व अङ्गिरस' बनें - इसी में हमारी प्रस्कण्वता मेधाविता व समझदारी है । हम ऐसा बनेंगे तभी प्रभु के प्रिय होंगे । प्रभु हमारी प्रार्थना को, हमारे ऐसा बनने के लिए यत्नशील होने पर ही सुनेंगे । प्रभु 'जातवेद व महिव्रत' हैं । हम भी ज्ञानी व सुव्रती बनने का ध्यान करें ।
विषय
प्रमुख विद्वान् और अग्रणी नायक सेनापति के कर्तव्य । (
भावार्थ
हे (जातवेदः) विद्वन्! ऐश्वर्यवन्! राजन्! हे (महिव्रत) महान् कर्त्तव्य करनेवाले! (प्रियमेधवत्) अति मनोहर बुद्धि वाले प्रतिभावान् पुरुष के समान (अत्रिवत्) तीनों तापों से रहित, सुखयुक्त पुरुष के समान, और (विरूपवत्) नाना रूपों को धारण करनेवाले बहुश्रुत के समान और (अंगिरस्वत्) अंगों में बलकारक प्राण के समान होकर (प्रस्कण्वस्य) उत्कृष्ट कोटि के विद्वान् पुरुषों के (हवम्) उपादेय ज्ञानयुक्त वचन को (श्रुधि) श्रवण कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रस्कण्वः काण्व ऋषिः ॥ १—१० अग्निर्देवा देवताः ॥ छन्दः—१ भुरिगुष्णिक् । ५ उष्णिक् । २, ३, ७, ८ अनुष्टुप् । ४ निचृदनुष्टुप् । ६, ९,१० विराडनुष्टुप् ॥ दशर्चं सूक्तम् ।
विषय
फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश इस मंत्र में किया है।
सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः
हे जातवेदः महिव्रत ! विद्वन् त्वं प्रियमेधवत् अत्रिवत् विरूपवत् अङ्गिरस्वत् प्रस्कण्वस्य हवम् श्रुधि ॥३॥
पदार्थ
हे (जातवेदः) यो जातेषु पदार्थेषु विद्यते सः=जो उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान है, (महिव्रत) महि महद्व्रतं शीलं यस्य सः=जिसका बड़े व्रतों का स्वभाव है, (विद्वन्) विद्वान् ! (त्वम्)=आप, (प्रियमेधवत्- अत्रिवत्) न विद्यन्ते त्रयआध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकास्तापा यस्य तद्वत्=जिसमे आध्यात्मिक, अधिभौतिक और आधिदैविक तीनों ताप विद्यमान नहीं रहते उसके समान, (विरूपवत्) विविधानि रूपाणि यस्य तद्वत्=जिसके विविध रूप हैं, उसके समान, (अङ्गिरस्वत्) योऽङ्गानां रसः प्राणस्तद्वत् = जो अङ्गों का रस प्राण है,उसके समान, (प्रस्कण्वस्य) प्रकृष्टश्चासौ कण्वो मेधावी= उत्तम मेधावी मनुष्य के, (हवम्) ग्राह्यं देयमध्ययनाध्यापनाख्यं व्यवहारम्= देने-लेने पढ़ने-पढ़ाने योग्य व्यवहार का, (श्रुधि) शृणु= श्रवण किया करो ॥३॥
महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद
इस मंत्र में उपमालंकार है। हे मनुष्यो ! जैसे सब पर दया करनेवाले लोग शरीर, वाणी और मन के दोषों से रहित विभिन्न विद्याओं को प्राप्त करके अपने प्राण के समान सबको जानते हुए, विद्वान् मनुष्यों के प्रिय कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही तुम भी किया करो ॥३॥
विशेष
अनुवादक की टिप्पणी- आध्यात्मिक, अधिभौतिक और आधिदैविक तीन प्रकार के ताप होते हैं।
पदार्थान्वयः(म.द.स.)
हे (जातवेदः) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान रहनेवाले [और] (महिव्रत) बड़े व्रतों के स्वभाववाले (विद्वन्) विद्वान् ! (त्वम्) आप (प्रियमेधवत्-अत्रिवत्) जिसमे आध्यात्मिक, अधिभौतिक और आधिदैविक तीनों ताप विद्यमान नहीं रहते उसके समान, (विरूपवत्) जिसके विविध रूप हैं, उसके समान [और] (अङ्गिरस्वत्) जो अङ्गों का रस प्राण है, उसके समान (प्रस्कण्वस्य) उत्तम मेधावी मनुष्य के, (हवम्) देने-लेन और पढ़ने-पढ़ाने योग्य व्यवहार का (श्रुधि) श्रवण किया करो ॥३॥
संस्कृत भाग
पदार्थः(महर्षिकृत)- (प्रियमेधवत्) प्रिया तृप्ता कमनीया प्रदीप्ता मेधा बुद्धिर्यस्य तेन तुल्यः (अत्रिवत्) न विद्यन्ते त्रयआध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकास्तापा यस्य तद्वत् (जातवेदः) यो जातेषु पदार्थेषु विद्यते सः (विरूपवत्) विविधानि रूपाणि यस्य तद्वत् (जातवेदः) यो जातेषु पदार्थेषु विद्यते सः (विरूपवत्) विविधानि रूपाणि यस्य तद्वत् (अंगिरस्वत्) योऽङ्गानां रसः प्राणस्तद्वत् (महिव्रत) महि महद्व्रतं शीलं यस्य सः (प्रस्कण्वस्य) प्रकृष्टश्चासौ कण्वो मेधावी (श्रुधी) शृणु। अत्र #व्यत्ययो द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (हवम्) ग्राह्यं देयमध्ययनाध्यापनाख्यं व्यवहारम्। यास्कमुनिरेषमिमं मंत्रं व्याख्यातवान्। प्रियमेधः प्रिया अस्य मेधा यथैतेषामृषीणामेवं प्रस्कण्वस्य शृणु ह्णनम्। प्रस्कण्वः कण्वस्य पुत्रः कण्वस्य प्रभवो यथा प्राग्रमिति। विरूपो नानारूपो महिव्रतो महाव्रत इति। निरु० ३।१७। ॥३॥ #[‘विष्करण व्यत्ययः’ इत्यर्थः। सं०] विषयः - पुनः स किंकुर्यादित्युपदिश्यते। अन्वयः - हे जातवेदो महिव्रत ! विद्वँस्त्वं प्रियमेधवदत्रिवद्विरूपवदङ्गिरस्वत्प्रकण्वस्य हवं श्रुधि ॥३॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्रोपमालंकारः। हे मनुष्य ! यथा सर्वस्य प्रियकारिणो जनाः कायिकवाचिकमानसदोषरहिता नानाविद्याप्रत्यक्षाः स्वप्राणवत्सर्वान् जानन्तो विद्वांसो मनुष्याणां प्रियाणि कार्य्याणि साध्नुयुस्तथा यूयमप्याचरत ॥३॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! जसे सर्वांचे प्रिय जन शरीर, वाणी, मनाच्या दोषांनी रहित नाना विद्यांचा प्रत्यय घेऊन आपल्या प्राणासारखे सर्वांना जाणून विद्वान लोक माणसांच्या प्रिय कार्याला सिद्ध करतात व शिक्षित बुद्धिमान विद्यार्थीही पुष्कळ उत्तम कार्य सिद्ध करू शकतात, तसे तुम्हीही करा. ॥ ३ ॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Agni, lord of existential knowledge, committed to the great laws of eternity, listen to the invocation and prayer of the man of intelligence and reason like a lord of beauteous wisdom, above ignorance, injustice and poverty, and free from physical, mental and spiritual want, a power of versatile form and present within as the breath of life.
Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-
He=O! (jātavedaḥ)=present in created substances, [aura]=and, (mahivrata)=those with big vows, (vidvan) =scholar, (tvam)=you, (priyamedhavat-atrivat)=similar to the one in whom all the three sorrows, ādhyātmika, adhibhautika aura ādhidaivika do not exist, (virūpavat)=similar to the one who has different forms, [aura]=and, (aṅgirasvat)=like the essence of the organs that is life, (praskaṇvasya)=of the most brilliant man, (havam) =practice capable of giving-takin and, reading-teaching (śrudhi)=listen.
English Translation (K.K.V.)
O scholar who is present in the created substances and has the nature of great vows! Like the one who does not have all the three ādhyātmika, adhibhautika and ādhidaivika sorrows, like the one who has various forms, and like the one who is the juice of the organs, listen to the best meritorious man's behaviour of giving-receiving and reading-teaching.
TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand
There is simile as figurative in this mantra. O humans! Just as people who are kind to everyone and free from defects in body, speech and mind, having acquired various knowledge, knowing everyone as if they are their own, accomplish the tasks dear to learned people, you do the same as well.
TRANSLATOR’S NOTES-
There are three types of sorrows spiritual, spiritual and spiritual.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
What should he (Agni) do is further taught in the third Mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O learned person knower of many things, accomplisher of many great vows, listen to the invocation dealing with reading and teaching of him who is possessed of wisdom, like a person, who is lover of genius, like one who has risen above three kinds of sufferings i.e. spiritual, including physical, social and cosmic, like a scientist who knows the properties and attributes of various substances and like one who knows the science of Prana or vital energy.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
( प्रियमेधवत् ) प्रिया तृप्ता कमनीया प्रदीप्ता मेधा बुद्धिर्यस्य = Like men of sharp intellect. ( अत्रिवत् ) न विद्यन्ते त्रयः आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकास्तापा यस्य तद्वत् = Like one who has risen above three kinds of suffering spiritual including Physical, social and cosmic. (प्रस्कण्वस्य) प्रकृष्टश्चासौ कण्वो मेधावी = Of a highly intelligent person.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
There is Upamalankara or simile used in the Mantra. O men, you should behave like those persons who are lovers of all, who are free from physical, vocal and mental defects, who have practical knowledge of all sciences and who regard all as their own lives and accomplish works dear to all men.
Translator's Notes
Sayanacharya, Wilson, Griffith and other translators have committed the blunder of taking प्रियमेध, अत्रि, विरूप, अंगिरा and प्रस्कण्व as the names of particular persons, which as has pointed out several times, is against the fundamental principles of the Vedic terminology. Sayanacharya has quoted Nirukta also, but truly speaking it does not support his interpretation as Yaskacharya has pointed out derivative meanings of these so called proper names प्रिया अस्य मेधा विरूपो नानारूप: महाव्रत: Had Yaskacharya meant to take these words as proper nouns, there was no need to give their derivative meanings. When he interprets as प्रस्कवः कण्वय पुत्रः कण्वस्य प्रभव: (निरु० ३.१७) he means to take कणव: as मेधावी as clearly given in Nighantu 3.15 ३.१५ कण्व इति मेधाविनाम (निघ० ३.१५) The son of a highly intelligent or word अंगिरा: as wise person. For the meaning of the अंगानां रस: प्राण: there is the authority of the Shatapath Brahmana प्राणो वा अंगिरा: (शतपथ ८.२.२.२८॥ ६.६.२.३.४)
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