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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 70 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 70/ मन्त्र 3
    ऋषिः - पराशरः शाक्तः देवता - अग्निः छन्दः - निचृत्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    गर्भो॒ यो अ॒पां गर्भो॒ वना॑नां॒ गर्भ॑श्च स्था॒तां गर्भ॑श्च॒रथा॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    गर्भः॑ । यः । अ॒पाम् । गर्भः॑ । वना॑नाम् । गर्भः॑ । च॒ । स्था॒ताम् । गर्भः॑ । च॒रथा॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    गर्भो यो अपां गर्भो वनानां गर्भश्च स्थातां गर्भश्चरथाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    गर्भः। यः। अपाम्। गर्भः। वनानाम्। गर्भः। च। स्थाताम्। गर्भः। चरथाम् ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 70; मन्त्र » 3
    अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 14; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    यो जगदीश्वरो जीवो वा यथाऽपामन्तर्गर्भो वनानामन्तर्गर्भः स्थातामन्तर्गर्भश्चरथामन्तर्गर्भोऽद्रौ चिदन्तर्गर्भो दुरोणेऽन्तर्गर्भो विश्वोऽमृतः स्वाधीर्विशा प्रजानामन्तराकाशोऽग्निर्वायुर्नेव सर्वेषु च बाह्यदेशेष्वपि विश्वानि दैव्यानि व्रतान्यश्या व्याप्तोऽस्त्यस्मै सर्वे पदार्थाः सन्ति तं वयं वनेम ॥ २ ॥

    पदार्थः

    (गर्भः) स्तोतव्योऽन्तःस्थो वा (यः) परमात्मा जीवात्मा वा (अपाम्) प्राणानां जलानां (गर्भः) गर्भ इव वर्त्तमानः (वनानाम्) संभजनीयानां पदार्थानां रश्मीनां वा (गर्भः) गूढ इव स्थितः (च) समुच्चये (स्थाताम्) स्थावराणाम्। अत्र वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति तुक्। (गर्भः) गर्भ इवावृतः (चरथाम्) जङ्गमानाम्। अत्र वाच्छन्दसीति नुडागमाभावः। (अद्रौ) शैलादो घने पदार्थे (चित्) अपि (अस्मै) जगदुपकाराय कर्मभोगाय वा (अन्तः) मध्ये (दुरोणे) गृहे (विशाम्) प्रजानाम् (न) इव (विश्वः) अखिलश्चेतनस्वरूपः (अमृतः) अनुत्पन्नत्वान्नाशरहितः (स्वाधीः) यः सुष्ठु समन्ताद् ध्यायति सर्वान् पदार्थान् सः ॥ २ ॥

    भावार्थः

    अत्र श्लेषालङ्कारः। (अश्याः) (वनेम) (विश्वानि) (दैव्यानि) (व्रता) इति पञ्चपदानां पूर्वस्मान्मन्त्रादनुवृत्तिश्च। मनुष्यैर्नहि चिन्मयेन परमेश्वरेण विना किंचिदपि वस्त्वव्याप्तमस्ति। नहि चिन्मयो जीवः स्वकर्मफलभोगविरह एकक्षणमपि वर्त्तते तस्मात्तं सर्वाभिव्याप्तमन्तर्यामिणं विज्ञाय सर्वदा पापकर्माणि त्यक्त्वा धर्म्यकार्य्येषु प्रवर्त्तितव्यम्। यथा पृथिव्यादिककार्य्यरूपाः प्रजा अनेकेषां तत्त्वानां संयोगेनोत्पन्ना वियोगेन विनष्टाश्च भवन्ति तथैष ईश जीवकारणाख्या अनादित्वात् संयोगविभागेभ्यः पृथक्त्वादनादयो सन्तीति वेदितव्यम् ॥ २ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

    पदार्थ

    हम लोग जो जगदीश्वर वा जीव (अपाम्) प्राण वा जलों के (अन्तः) बीच (गर्भः) स्तुतियोग्य वा भीतर रहनेवाला (वनानाम्) सम्यक् सेवा करने योग्य पदार्थ वा किरणों में (गर्भः) गर्भ के समान आच्छादित (अद्रौ) पर्वत आदि बड़े-बड़े पदार्थों में (चित्) भी गर्भ के समान (दुरोणे) घर में गर्भ के समान (विश्वः) सब चेतन तत्त्वस्वरूप (अमृतः) नाशरहित (स्वाधीः) अच्छे प्रकार पदार्थों का चिन्तन करनेवाला (विशाम्) प्रजाओं के बीच आकाश वायु के (न) समान बाह्य देशों में भी सब दिव्य गुण कर्मयुक्त व्रतों को (अश्याः) प्राप्त होवे, (अस्मै) उसके लिये सब पदार्थ हैं, उसका (आ वनेम) सेवन करें ॥ २ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। पूर्व मन्त्र से (अश्याः) (वनेम) (विश्वानि) (दैव्यानि) (व्रता) इन पाँच पदों की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को ज्ञानस्वरूप परमेश्वर के विना कोई भी वस्तु अव्याप्त नहीं है और चेतनस्वरूप जीव अपने कर्म के फल भोग से एक क्षण भी अलग नहीं रहता। इससे उस सबमें अभिव्याप्त अन्तर्य्यामी ईश्वर को जानकर सर्वदा पापों को छोड़ कर धर्मयुक्त कार्यों में प्रवृत्त होना चाहिये। जैसे पृथिवी आदि कार्यरूप प्रजा अनेक तत्त्वों के संयोग से उत्पन्न और वियोग से नष्ट होती है, वैसे यह ईश्वर जीव कारणरूप आदि वा संयोग-वियोग से अलग होने से अनादि है, ऐसा जानना चाहिये ॥ २ ॥

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    विषय

    चराचर में व्यापक प्रभु

    पदार्थ


    १. (यः) = जो प्रभु (अपां गर्भः) = सब प्रजाओं के मध्य में अवस्थित हैं और (वनानाम्) = ज्ञानरश्मियों के (गर्भः) = मध्य में स्थित हैं । सब प्रजाओं के मध्य में, उनके हृदयों में स्थित हुए - हुए उनको ज्ञान देनेवाले हैं । 

    २. वे प्रभु (स्थाताम्) = स्थावर पदार्थों के (गर्भः) = मध्य में स्थित है (च) = तथा (चरथां गर्भः) = जंगम पदार्थों के भी मध्य में स्थित हैं । इस चराचर सम्पूर्ण जगत् में वे प्रभु व्याप्त हैं । 

    ३. (अस्मै) = गत मन्त्र में वर्णित उपासक के लिए वे प्रभु (अद्रौ चित अन्तः) = पर्वत के अन्दर भी विद्यमान हैं और (दुरोणे) = गृह में भी व्याप्त हैं । क्या पर्वतों में और क्या घरों में, सर्वत्र यह प्रभु की महिमा को देखता है । 

    ४. (विशां न विश्वः) = [न इति चार्थे] सब प्रजाओं का वे प्रभु निवासस्थान हैं । “विशन्ति भूतानि यस्मिन् सर्वेषु विशतीति वा” - सब प्रजाओं में वे प्रभु प्रविष्ट हैं और सब प्रजाएँ उसी में निविष्ट हैं । (अमृतः) = वे प्रभु अमृत हैं, सब उपासकों को अमृतत्व प्राप्त करानेवाले हैं और (स्वाधीः) = उत्तम ध्यान व कर्म से युक्त हैं । सब प्राणियों का ध्यान करते हैं और उनके कल्याण के लिए सब आवश्यक कर्मों को करनेवाले हैं [धी - ज्ञान व कर्म] । प्रभु के न ज्ञान में कमी है, न कर्म में । इस प्रभु का ही हम भजन करनेवाले बनें । 


     

    भावार्थ

    भावार्थ - हम सर्वव्यापक, अमृत, सर्वज्ञ प्रभु की उपासना करें । 

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    विषय

    अग्नि के समान भोक्ता राजा, स्वामी, ईश्वर का वर्णन ।

    भावार्थ

    ( यः ) जो परमेश्वर और ज्ञानी पुरुष ( अस्मै ) इस मनुष्य प्राणी को (सूक्तैः) उत्तम उपदेश वचनों से ( अरम् ) बहुत अधिक ज्ञान ( दाशत् ) प्रदान करता है वह ही ( अग्निः ) अग्नि जिस प्रकार रात्रि के अन्धकार को नाश करने से रात्रि का स्वामी कहाता है, उसी प्रकार (क्षपावान्) अज्ञानमय मोहरात्रि का नाश करने वाला (अग्निः ) ज्ञानमय परमेश्वर ( रयीणां ) ऐश्वर्यो को ( अरं दाशत् ) बहुत अधिक प्रदान करता है। हे (चिकित्वः) ज्ञानवन् विद्वन् ! और परमेश्वर ! (देवानां जन्म) विद्वानों और उत्तम गुणों की उत्पत्ति और (मर्त्तान् च) सब मनुष्यों को भी उनके विषय में ( विद्वान् ) अच्छी प्रकार जानता हुए ( एता ) इन समस्त (भूमा) भूमिवासी, जीवों और पदार्थों को ( नि पाहि ) रक्षा कर। इसी प्रकार ( अग्निः ) अग्रणी पुरुष प्रजाजन को ऐश्वर्य दे, उत्तम वचनों से ज्ञान दे और वह सब उत्तम व्यवहारों, विद्वानों और मनुष्यों को जानकर उनके हितार्थ नाना जीवों और धनों की रक्षा करे ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    पराशर ऋषिः ॥ अग्निर्देवता ॥ छन्दः—१, ४ विराट्पक्तिः । २ पङ्क्तिः ३, ५ निचृत् पंक्तिः । ६ याजुषी पंक्तिः ॥ षडर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    विषय (भाषा)- फिर वह कैसा है, इस विषय को इस मन्त्र में कहा है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- यः जगदीश्वरः जीवः वा यथा अपाम् अन्तः गर्भः वनानाम् अन्तः गर्भः स्थाताम् अन्तः गर्भः चरथाम् अन्तः गर्भः अद्रौ चित् अन्तः गर्भः दुरोणे अन्तः गर्भः विश्वः अमृतः स्वाधीः विशां प्रजानाम् अन्तः आकाशः अग्निः वायुः न इव सर्वेषु च बाह्य देशेषु अपि विश्वानि दैव्यानि व्रतानि अश्या व्याप्तः अस्ति अस्मै सर्वे पदार्थाः सन्ति तं वयं वनेम ॥२॥

    पदार्थ

    पदार्थः- (यः) परमात्मा जीवात्मा वा= परमात्मा या जीवात्मा, (यथा)=जैसे, (अपाम्) प्राणानां जलानां=प्राणों और जलों के, (अन्तः) मध्ये= मध्य में, (गर्भः) गर्भ इव वर्त्तमानः= गर्भ के समान उपस्थित है, (वनानाम्) संभजनीयानां पदार्थानां रश्मीनां वा= अच्छे प्रकार से पूजित पदार्थों या किरणों के, (अन्तः) मध्ये= मध्य में, (गर्भः) गूढ इव स्थितः=रहस्य के समान स्थित है, (स्थाताम्) स्थावराणाम्=अचल वस्तुओं के, (अन्तः) मध्ये= मध्य में, (गर्भः) गर्भ इवावृत= गर्भ के समान ढका हुआ है, (चरथाम्) जङ्गमानाम्=चल जीवों के, (अन्तः) मध्ये= मध्य में, (गर्भः)= गर्भ, (अद्रौ) शैलादौ घने पदार्थे=पर्वत आदि घने पदार्थों में, (चित्) अपि=भी, (अन्तः) मध्ये= मध्य में, (गर्भः) = गर्भ, (दुरोणे) गृहे=घर में, (अन्तः) मध्ये= मध्य में, (गर्भः)= स्तोतव्योऽन्तःस्थो वा=स्तुति करनेवालों के अन्तःकरण में स्थित है, (विश्वः) अखिलश्चेतनस्वरूपः=समस्त चेतन स्वरूप, (अमृतः) अनुत्पन्नत्वान्नाशरहितः=उत्पन्न न होने से नाश रहित है, (स्वाधीः) यः सुष्ठु समन्ताद् ध्यायति सर्वान् पदार्थान् सः=उत्तम रूप से हर ओर से समस्त पदार्थों का चिन्तन करनेवाला, (विशाम्) प्रजानाम्=प्रजाओं के, (अन्तः) मध्ये= मध्य में, (आकाशः)= आकाश, (अग्निः)= अग्नि, और, (वायुः)=वायु के, (न) इव=समान, (सर्वेषु)=सब में, (च) समुच्चये= और, (बाह्य)=बाहरी, (देशेषु)=स्थानों में, (अपि)=भी, (विश्वानि)=समस्त, (दैव्यानि)=दिव्य, (व्रतानि)= संकल्पों में, (अश्या) व्याप्तः= व्याप्त होता, (अस्ति)= है, (अस्मै) जगदुपकाराय कर्मभोगाय वा= संसार के उपकार और कर्म के भोग के लिये, (सर्वे)=समस्त, (पदार्थाः)=पदार्थ, (सन्ति)=हैं, (तम्)=उसको, (वयम्)=हम, (वनेम)= हम अच्छे प्रकार से अनुष्ठान करें ॥२॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। पूर्व मन्त्र से ‘अश्याः’, ‘वनेम’, ‘विश्वानि’, ‘दैव्यानि’ और ‘व्रता’ इन पाँच पदों की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को चेतनस्वरूप परमेश्वर के विना कोई भी वस्तु प्राप्त नहीं होती है। चेतनस्वरूप जीव अपने कर्म के फल भोग और से एक क्षण भी अलग नहीं रहता है, इसलिये सबमें हर ओर से व्याप्त अन्तर्य्यामी ईश्वर को जानकर सर्वदा पाप कर्मों को छोड़ कर धर्मयुक्त कार्यों में प्रवृत्त होना चाहिये। जैसे पृथिवी आदि कार्यरूप और सन्तान अनेक तत्त्वों के संयोग से उत्पन्न और वियोग से नष्ट होती है, वैसे यह ईश्वर जीव कारणरूप अनादि होने से संयोग-वियोग से पृथक् है, ऐसा जानना चाहिये ॥२॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)- (यः) परमात्मा या जीवात्मा, (यथा) जैसे (अपाम्) प्राणों और जलों के (अन्तः) मध्य में (गर्भः) गर्भ के समान उपस्थित है। (वनानाम्) अच्छे प्रकार से पूजित पदार्थों या किरणों के (अन्तः) मध्य में (गर्भः) रहस्य के समान स्थित है। (स्थाताम्) अचल वस्तुओं के (अन्तः) मध्य में (गर्भः) गर्भ के समान ढका हुआ है। (चरथाम्) चल जीवों के (अन्तः) मध्य में (गर्भः) गर्भ के समान और (अद्रौ) पर्वत आदि घने पदार्थों में (चित्) भी (अन्तः) मध्य में (गर्भः) गर्भ के समान है। (दुरोणे) घर के (अन्तः) मध्य में (गर्भः) स्तुति करनेवालों के अन्तःकरण में स्थित है। (विश्वः) समस्त चेतन स्वरूप है और (अमृतः) उत्पन्न न होने से नाश रहित है। (स्वाधीः) उत्तम रूप से, हर ओर से समस्त पदार्थों का चिन्तन करनेवाला है। (विशाम्) प्रजाओं के (अन्तः) मध्य में (आकाशः) आकाश, (अग्निः) अग्नि और (वायुः) वायु के (न) समान है (च) और (सर्वेषु) सब (बाह्य) बाहरी (देशेषु) स्थानों में (अपि) भी (विश्वानि) समस्त (दैव्यानि) दिव्य गुणों और (व्रतानि) संकल्पों में (अश्या) व्याप्त होता (अस्ति) है। (अस्मै) संसार के उपकार और कर्म के भोग के लिये (सर्वे) समस्त (पदार्थाः) पदार्थ (सन्ति) हैं। (तम्) उस [परमात्मा का] (वयम्) हम (वनेम) अच्छे प्रकार से अनुष्ठान करं( ॥२॥

    संस्कृत भाग

    गर्भः॑ । यः । अ॒पाम् । गर्भः॑ । वना॑नाम् । गर्भः॑ । च॒ । स्था॒ताम् । गर्भः॑ । च॒रथा॑म् ॥ अद्रौ॑ । चित् । अ॒स्मै॒ । अ॒न्तः । दु॒रो॒णे । वि॒शाम् । न । विश्वः॑ । अ॒मृतः॑ । सु॒ऽआ॒धीः ॥ पदार्थः(महर्षिकृतः)- (गर्भः) स्तोतव्योऽन्तःस्थो वा (यः) परमात्मा जीवात्मा वा (अपाम्) प्राणानां जलानां (गर्भः) गर्भ इव वर्त्तमानः (वनानाम्) संभजनीयानां पदार्थानां रश्मीनां वा (गर्भः) गूढ इव स्थितः (च) समुच्चये (स्थाताम्) स्थावराणाम्। अत्र वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति तुक्। (गर्भः) गर्भ इवावृतः (चरथाम्) जङ्गमानाम्। अत्र वाच्छन्दसीति नुडागमाभावः। (अद्रौ) शैलादो घने पदार्थे (चित्) अपि (अस्मै) जगदुपकाराय कर्मभोगाय वा (अन्तः) मध्ये (दुरोणे) गृहे (विशाम्) प्रजानाम् (न) इव (विश्वः) अखिलश्चेतनस्वरूपः (अमृतः) अनुत्पन्नत्वान्नाशरहितः (स्वाधीः) यः सुष्ठु समन्ताद् ध्यायति सर्वान् पदार्थान् सः ॥२॥ विषयः- पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥ अन्वयः- यो जगदीश्वरो जीवो वा यथाऽपामन्तर्गर्भो वनानामन्तर्गर्भः स्थातामन्तर्गर्भश्चरथामन्तर्गर्भोऽद्रौ चिदन्तर्गर्भो दुरोणेऽन्तर्गर्भो विश्वोऽमृतः स्वाधीर्विशा प्रजानामन्तराकाशोऽग्निर्वायुर्नेव सर्वेषु च बाह्यदेशेष्वपि विश्वानि दैव्यानि व्रतान्यश्या व्याप्तोऽस्त्यस्मै सर्वे पदार्थाः सन्ति तं वयं वनेम ॥२॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र श्लेषालङ्कारः। (अश्याः) (वनेम) (विश्वानि) (दैव्यानि) (व्रता) इति पञ्चपदानां पूर्वस्मान्मन्त्रादनुवृत्तिश्च। मनुष्यैर्नहि चिन्मयेन परमेश्वरेण विना किंचिदपि वस्त्वव्याप्तमस्ति। नहि चिन्मयो जीवः स्वकर्मफलभोगविरह एकक्षणमपि वर्त्तते तस्मात्तं सर्वाभिव्याप्तमन्तर्यामिणं विज्ञाय सर्वदा पापकर्माणि त्यक्त्वा धर्म्यकार्य्येषु प्रवर्त्तितव्यम्। यथा पृथिव्यादिककार्य्यरूपाः प्रजा अनेकेषां तत्त्वानां संयोगेनोत्पन्ना वियोगेन विनष्टाश्च भवन्ति तथैष ईश जीवकारणाख्या अनादित्वात् संयोगविभागेभ्यः पृथक्त्वादनादयो सन्तीति वेदितव्यम् ॥२॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात श्लेष व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. माणसांनी हे जाणावे की जो परमेश्वर (किंवा विद्वान) वेदाद्वारे अंर्तयामी रूपाने व उपदेशाद्वारे माणसांना सर्व विद्या देतो. त्या परमेश्वराची उपासना व (विद्वानांचा) सत्संग करावा. ॥ ३ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Agni abides at the heart of the waters and the pranic energies of the universe. It is at the heart of forests, sunbeams and all the lovely and beloved beauties of the world. It is at the heart of all that is still and all that moves. It abides in the cloud and in the mountain and it is the centre of the homes of people. Universal, immortal, free and absolute, it is the very life and ruler of everything in nature as it is the life and ruler of all the people for their sake only.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How is he (Agni) is taught further in the second mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    Let us worship God who is adorable and with in the waters and Pranas, within forests and rays of the sun and the moon, within all movable and immovable things within the mountains and within the mansions being Omnipresent. He is perfect, Immortal Lord of the subjects, performing always noble deeds like the creation and preservation of the world and Omniscient. He is the controller of all objects.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (गर्भ:) स्तोतव्योऽन्तःस्थोवा = Adorable and within. (विश्व:) अखिल: चेतनस्वरूप:= Perfect and conscious. (स्वाधी:) य: सुष्ठु समन्ताद् ध्यायति सर्वान् पदार्थान् स: = He who knows all things well, Omniscient

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Men should know that there is nothing that is not. pervaded by the conscious Supreme Being or God. The soul cannot remain even for a moment without doing an act or getting its fruit. Therefore a man should always engage himself in doing righteous deeds by giving up all evils.

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    Subject of the mantra

    Then, what kind of is he?This topic has been discussed in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (yaḥ)=God or soul, (yathā) =like, (apām)=of life and waters, (antaḥ)=midst, (garbhaḥ) =is present like a womb, (vanānām) =of well worshiped substances or rays, (antaḥ)=midst, (garbhaḥ)=It is situated like a mystery, (sthātām)=of immovable objects, (antaḥ) =midst, (garbhaḥ) =is covered like a womb, (carathām) =of mobile creatures, (antaḥ)=midst, (garbhaḥ) =is like a womb, (adrau) =in dense materials like mountains etc., (cit) =also, (antaḥ) =midst, (garbhaḥ) =is covered like a womb, (duroṇe) =of house, (antaḥ) =midst, (garbhaḥ)=in the hearts of those who praise, (viśvaḥ)= is the entire conscious form and, (amṛtaḥ)= because of not being born, it is free from destruction, (svādhīḥ) =At its best, it contemplates all things from all sides, (viśām) =of people, (antaḥ)=midst, (ākāśaḥ) =space, (agniḥ) =fire and, (vāyuḥ) =air, (na) =is like, (ca) =and, (sarveṣu) =all, (bāhya) =outer, (deśeṣu) =in places, (api) =also, (viśvāni) =all, (daivyāni) =devine virtues and, (vratāni) =detrminations, (aśyā) =pervades, (asti) =is, (asmai)= For the benefit of the world and enjoyment of karma, (sarve) =all, (padārthāḥ) =substances, (santi)=are, (tam) =that, [paramātmā kā]=of God, (vayam) =we, (vanema) =perform rituals well.

    English Translation (K.K.V.)

    God or soul is present like a womb in the midst of life and waters. It is situated like a mystery in the midst of well-worshipped substances or rays. It is covered like a womb amidst immovable objects. It is like a womb in the middle of moving creatures and even in dense objects like mountains, it is like a womb in the middle. It is situated in the middle of the house, in the hearts of those who praise. Everything is a conscious form and is free from destruction due to not being born. At its best, it contemplates all things from all sides. Among the people, the sky is like fire and air and in all the outer places also it is pervaded with all the divine qualities and resolutions. All things are there for the benefit of the world and for the enjoyment of karma. Let us perform rituals well for that God.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There are paronomasia and simile as figurative in this mantra. From the previous mantra, these five terms i.e. ‘aśyāḥ’, ‘vanema’, ‘viśvāni’, ‘daivyāni’ and ‘vratā’ follow. Human beings do not attain anything without God in the form of consciousness. A living being in the form of consciousness does not remain separated even for a moment from enjoying the rewards of his actions, therefore, knowing the omnipresent God present in everyone, one should always give up sinful activities and engage in righteous activities. Just as the earth, its working form and children are created by the combination of many elements and are destroyed by their separation, in the same way, this divine soul, being eternal as its cause, is separate from combination and separation, this should be known.

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