ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 70/ मन्त्र 5
स हि क्ष॒पावाँ॑ अ॒ग्नी र॑यी॒णां दाश॒द्यो अ॑स्मा॒ अरं॑ सू॒क्तैः ॥
स्वर सहित पद पाठसः । हि । क्ष॒पाऽवा॑न् । अ॒ग्निः । र॒यी॒णाम् । दाश॑त् । यः । अ॒स्मै॒ । अर॑म् । सु॒ऽउ॒क्तैः ॥
स्वर रहित मन्त्र
स हि क्षपावाँ अग्नी रयीणां दाशद्यो अस्मा अरं सूक्तैः ॥
स्वर रहित पद पाठसः। हि। क्षपाऽवान्। अग्निः। रयीणाम्। दाशत्। यः। अस्मै। अरम्। सुऽउक्तैः ॥
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 70; मन्त्र » 5
अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 14; मन्त्र » 5
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अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 14; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥
अन्वयः
हे चिकित्वो विद्वान् ! यस्त्वं क्षपावानग्निरिवास्मै रयीणामरं प्रापणायैतान् परं सूक्तैर्भूम देवानां जन्म मर्त्तांश्चादन्यश्च दाशत् स त्वं हि खल्वेतानि निपाहि ॥ ३ ॥
पदार्थः
(सः) परमेश्वरो जीवो वा (हि) खलु (क्षपावान्) क्षपाः प्रशस्ता रात्रयो विद्यन्ते यस्मिन् यस्य वा सः (अग्निः) यथा सर्वसुखदात्री विद्युत् (रयीणाम्) विद्यारत्नराज्यादिपदार्थानाम् (दाशत्) दाश्यात् (यः) उक्तार्थः (अस्मै) प्रापणाय (अरम्) अलम् (सूक्तैः) शोभनान्युक्तानि वचनानि येषूपदेशनेषु तेषु (एता) एतानि (चिकित्वः) ज्ञानवन् (भूम) भूमानि बहूनि (नि) नितराम् (पाहि) रक्ष (देवानाम्) दिव्यानां गुणानां विदुषां वा (जन्म) प्रादुर्भावम् (मर्त्तान्) मनुष्यान् (च) समुच्चये (विद्वान्) यो वेत्ति सः ॥ ३ ॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यः परमेश्वरो विद्वान् वा वेदान्तर्यामित्वद्वारोपदेशैर्वा सर्वा विद्या सर्वमनुष्येभ्यः प्रयच्छति, स एवोपास्यः सङ्गमनीयश्चेति ॥ ३ ॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर वह मनुष्य कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥
पदार्थ
हे (चिकित्वः) ज्ञानवान् जगदीश्वर वा (विद्वान्) जाननेवाले ! (यः) जो (क्षपावान्) जिसमें उत्तम बहुत रात्रि हैं (अग्निः) सब सुखों की देनेवाली बिजुली के समान (अस्मै) इन (रयीणाम्) विद्यारत्न राज्य आदि पदार्थों की (अरम्) पूर्णप्राप्ति के लिये (एता) इन (अरम्) पूर्ण (सूक्तैः) उत्तम वचनों से (भूम) बहुत (देवानाम्) दिव्यगुण वा विद्वानों के (जन्म) जन्म (मर्त्तान्) मनुष्य (च) मनुष्य से भिन्नों को (दाशत्) देते हो (सः) सो आप (हि) निश्चय करके इनकी (नि पाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये ॥ ३ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को जो परमेश्वर वा विद्वान् वेद वा अन्तर्यामि द्वारा तथा उपदेशों से सब मनुष्यों के लिये सब विद्याओं को देता है, उसकी उपासना तथा सत्सङ्ग करना चाहिये ॥ ३ ॥
विषय
क्षपावान् व रयि - प्रदाता
पदार्थ
१. (सः) = वे प्रभु (हि) = निश्चय से (क्षपावान्) = सब रस - वृत्तियों के संहार करनेवाले हैं [क्षपयति, Throws away], उपासक के हृदय से अब अशुभवृत्तियों को दूर करते हैं । इस प्रकार वे (अग्निः) = अग्रणी हैं । इन उपासकों को जीवन - पथ पर आगे और आगे ले - चलते हैं ।
२. (रयीणां दाशत्) = धनों के देनेवाले हैं, उस व्यक्ति के लिए (यः) = जोकि (अस्मै) = इस प्रभु की प्राप्ति के लिए (सूक्तैः) = [सु+उक्त] उत्तम मधुर शब्दों के द्वारा (अरम्) = अपने जीवन को सुभूषित करते हैं [अरम् - भूषणम्], इसे शक्तिशाली बनाते हैं [अरम् - शक्ति] अथवा जो सूक्तों के द्वारा अपने जीवनों से द्वेष को दूर करते हैं [अरम् - वारण] सूक्तों को बोलने के लिए ही प्रभु ने हमें संसार में भेजा है - “सूक्ता ब्रूहि” । यदि हम प्रभु के आदेश का पालन करते हुए चलते हैं तो सब आवश्यक धनों के पात्र बनते हैं ।
३. हे (चिकित्वः) = सर्वज्ञ प्रभो ! (भूम) = इस पृथिवी पर (एता) = इन प्राणियों का - आपके सूक्तवचन बोलनेरूप आदेश का पालन करनेवालों का (निपाहि) = निश्चय से आप रक्षण कीजिए । (देवानां जन्म) = सूर्यादि देवों के जन्म को (च) = और (मर्तान्) = मनुष्यों को (विद्वान्) = आप जानते हैं । कोई भी वस्तु आपके ज्ञानक्षेत्र से परे नहीं हैं । सर्वज्ञ होने के कारण आपके रक्षण में कमी हो भी कैसे सकती है । आप धनों से भौतिक जीवनों की उन्नति में सहायक होते हैं और राक्षसवृत्तियों के संहार के द्वारा अध्यात्म - उन्नति में ।
भावार्थ
भावार्थ - जो भी अपने जीवन को सूक्तों से अलंकृत करता है, प्रभु उसे आवश्यक रयि = धन देते हैं और उसकी राक्षसवृत्तियों का संहार कर देते हैं ।
विषय
अग्नि के समान भोक्ता राजा, स्वामी, ईश्वर का वर्णन ।
भावार्थ
हे परमेश्वर ! तू ( गोषु ) पृथिवी आदि लोकों और ज्ञान वाणियों में और ( वनेषु ) सेवन करने योग्य किरणों और जलों में सूर्य के समान ( प्रशस्तिम् ) उत्तम कथन करने योग्य गुण को ( धिषे ) धारण कराता है । ( विश्वे ) सब ही (नः) हममें से (स्वः) आदित्य के समान तेजस्वी (बलिम्) बलवान् तुझ को ( भरन्त ) प्राप्त होते हैं । ( पुरुत्रा ) बहुत से ( नरः ) मनुष्य ( त्वा ) तेरी (वि सपर्यन्) विविध प्रकार से उपासना करते हैं । ( जिव्रेः पितुः न ) बूढ़े पिता के धन को जिस प्रकार पुत्र ले लेते हैं उसी प्रकार तू ( जिव्रेः ) अति पुराण, सनातन पालक तुझ से ( वेदः ) परम ज्ञान और ऐश्वर्य को सब मनुष्य ( वि भरन्त ) प्राप्त करें । राजा के पक्ष में—राजा गवादि पशु और भोग्य ऐश्वर्यों के निमित्त उत्तम कीर्ति को धारण करे। सब सुखकारी प्रतापी बलवान् को शरण रूप से प्राप्त हों, या कर प्रदान करें । नायक जन उसकी सेवा करें । पिता के धन के समान उसके ऐश्वर्य को प्रजागण भोग करें, या बढ़ावें ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
पराशर ऋषिः ॥ अग्निर्देवता ॥ छन्दः—१, ४ विराट्पक्तिः । २ पङ्क्तिः ३, ५ निचृत् पंक्तिः । ६ याजुषी पंक्तिः ॥ षडर्चं सूक्तम् ॥
विषय
विषय (भाषा)- फिर वह मनुष्य कैसा हो, इस विषय को इस मन्त्र में कहा है ॥
सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः
सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे चिकित्वः विद्वान् ! यः त्वं क्षपावान् अग्निः इव अस्मै रयीणाम् अरं प्रापणाय एतान् परं सूक्तैः भूम देवानां जन्म मर्त्तान् च आत् अन्यः च दाशत् स त्वं हि खलु एतानि निपाहि ॥३॥
पदार्थ
पदार्थः- हे (चिकित्वः) ज्ञानवन्= ज्ञानवान्, (विद्वान्) यो वेत्ति सः= विद्वान् ! (यः) उक्तार्थः=जो, (त्वम्)=तुम, (क्षपावान्) क्षपाः प्रशस्ता रात्रयो विद्यन्ते यस्मिन् यस्य वा सः= प्रशस्त रात्रियों वाले, (अग्निः) यथा सर्वसुखदात्री विद्युत्=सब सुखों को देनेवाले विद्युत् के, (इव)=समान, (अस्मै) प्रापणाय =प्राप्त कराने के लिये, (रयीणाम्) विद्यारत्नराज्यादिपदार्थानाम्= विद्या, रत्न, राज्य आदि पदार्थों के, (अरम्) अलम् = पर्याप्त, (प्रापणाय)= प्राप्त कराने के लिये, (एता) एतानि=इन सबको, (परम्)=अधिकतम, (सूक्तैः) शोभनान्युक्तानि वचनानि येषूपदेशनेषु तेषु= सुन्दर वचनों से युक्त उपदेशों में, (भूम) भूमानि बहूनि=बहुत, (देवानाम्) दिव्यानां गुणानां विदुषां वा=दिव्य गुणों या विद्वानों का, (जन्म) प्रादुर्भावम्=उत्पन्न होना, (मर्त्तान्) मनुष्यान्= मनुष्यों का, (च)=और, (आत्) =तब, (अन्यः)=भिन्न, (च) समुच्चये=और, (दाशत्) दाश्यात्=प्रदान करता है, (सः) परमेश्वरो जीवो वा=परमेश्वर या जीव, (त्वम्) =तुम, (हि) खलु =निश्चय से ही, (एतानि)=इन सबकी, (नि) नितराम्=अच्छे प्रकार से, (पाहि) रक्ष=रक्षा कीजिये ॥३॥
महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद
महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो परमेश्वर या विद्वान् है, वेद ज्ञान का अन्तर्यामी होने से, उसके द्वारा किये गये उपदेशों से समस्त विद्याओं को, सब मनुष्यों के लिये देता है, मनुष्यों के द्वारा वही उपासना किये जाने योग्य है तथा उसी की सङ्गति करनी चाहिये ॥३॥
पदार्थान्वयः(म.द.स.)
पदार्थान्वयः(म.द.स.)- .)- हे (चिकित्वः) ज्ञानवान् और (विद्वान्) विद्वान् ! (यः) जो (त्वम्) तुम (क्षपावान्) प्रशस्त रात्रियों वाले, (अग्निः) सब सुखों को देनेवाले विद्युत् के (इव) समान (अस्मै) इसके लिये (रयीणाम्) विद्या, रत्न, राज्य आदि पदार्थों के (अरम्) पर्याप्त रूप से (प्रापणाय) प्राप्त कराने के लिये, (एता) इन सबको (परम्) अधिकतम (सूक्तैः) सुन्दर वचनों से युक्त उपदेशों में (भूम) बहुत (देवानाम्) दिव्य गुणों या विद्वानों के (जन्म) उत्पन्न होने से (मर्त्तान्) मनुष्यों को (च) और, (आत्) तब (अन्यः) भिन्न लोगों को (दाशत्) प्रदान करता है। [हे] (सः) परमेश्वर या जीव (त्वम्) तुम (हि) निश्चय से ही (एतानि) इन सबकी (नि) अच्छे प्रकार से (पाहि) रक्षा कीजिये ॥३॥
संस्कृत भाग
सः । हि । क्ष॒पाऽवा॑न् । अ॒ग्निः । र॒यी॒णाम् । दाश॑त् । यः । अ॒स्मै॒ । अर॑म् । सु॒ऽउ॒क्तैः ॥ ए॒ता । चि॒कि॒त्वः॒ । भूम॒ । नि । पा॒हि॒ । दे॒वाना॑म् । जन्म॑ । मर्ता॑न् । च॒ । वि॒द्वान् ॥ पदार्थः(महर्षिकृतः)- (सः) परमेश्वरो जीवो वा (हि) खलु (क्षपावान्) क्षपाः प्रशस्ता रात्रयो विद्यन्ते यस्मिन् यस्य वा सः (अग्निः) यथा सर्वसुखदात्री विद्युत् (रयीणाम्) विद्यारत्नराज्यादिपदार्थानाम् (दाशत्) दाश्यात् (यः) उक्तार्थः (अस्मै) प्रापणाय (अरम्) अलम् (सूक्तैः) शोभनान्युक्तानि वचनानि येषूपदेशनेषु तेषु (एता) एतानि (चिकित्वः) ज्ञानवन् (भूम) भूमानि बहूनि (नि) नितराम् (पाहि) रक्ष (देवानाम्) दिव्यानां गुणानां विदुषां वा (जन्म) प्रादुर्भावम् (मर्त्तान्) मनुष्यान् (च) समुच्चये (विद्वान्) यो वेत्ति सः ॥३॥ विषयः- पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥ अन्वयः- हे चिकित्वो विद्वान् ! यस्त्वं क्षपावानग्निरिवास्मै रयीणामरं प्रापणायैतान् परं सूक्तैर्भूम देवानां जन्म मर्त्तांश्चादन्यश्च दाशत् स त्वं हि खल्वेतानि निपाहि ॥३॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यः परमेश्वरो विद्वान् वा वेदान्तर्यामित्वद्वारोपदेशैर्वा सर्वा विद्या सर्वमनुष्येभ्यः प्रयच्छति, स एवोपास्यः सङ्गमनीयश्चेति ॥३॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! ज्या जगदीश्वराने सनातन कारणापासून सर्व कार्य अर्थात स्थूलरूप वस्तूंना उत्पन्न करून स्पर्श इत्यादी गुण प्रकाशित केलेले आहेत. ज्या सृष्टीत उत्पन्न झालेल्या पदार्थाचे पिता व पुत्राप्रमाणे सर्व जीव उत्तराधिकारी आहेत. जो सर्व प्राण्यांना सुख देतो त्याची आत्मा, मन, वाणी, शरीर व धनाने सेवा करा. ॥ ५ ॥
इंग्लिश (3)
Meaning
That Agni is the lord of night and day. It is the giver of wealth and power in ample measure for anyone who adores it with hymns of divinity. It is aware of all, knows the manifestations and operations of all the divinities of nature, and it knows all that are mortal. Lord of knowledge, wealth and power, protect and promote all these children of nature and the earth.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
How is Agni (God) is taught further in the third mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
(1) God, who is at the Giver of knowledge to all through these hymns is the Destroyer of the night of ignorance as fire is of the dark night. His gives much wealth to His devotees. O God! protect all these many creatures on earth as Thou being Omniscient, Knowest the origin of the divine virtues and enlightened persons and ordinary men. (2) O wise learned man, you also give instructions to all through these Vedic hymns and destroy the night of nescience. Knowing the nature of all divine virtues and enlightened and ordinary mort.ls, you should protect all.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(चिकित्व:) ज्ञानवन्-किती-संज्ञाने =Full of knowledge. (देवानाम्) दिव्यानां गुणानां विदुषां वा = Of the divine attributes and enlightened persons.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Men should adore only that God who being the universal Spirit pervading all and through the Vedas gives instructions to all and they should have communion with Him.
Subject of the mantra
Then, what kind of that person should be?This subject has been discussed in this mantra.
Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-
He=O! (cikitvaḥ)=knowledgeable and scholar, (yaḥ) =that, (tvam) =you, (kṣapāvān)= with long nights, (agniḥ)= of lightning that gives all happiness, (iva) =like, (asmai) =for this, (rayīṇām)= of things like knowledge, gems, kingdom etc., (aram)= In abundance, (prāpaṇāya)=to get it, (etā) =to all these, (param)=maximum, (sūktaiḥ) =In sermons with beautiful words, (bhūma) =very, (devānām) =of divine qualities or scholars, (janma) =by being born, (marttān) =to humans, (ca) =and, (āt) =then, (anyaḥ)= to different people, (dāśat) =provides, [he]=O! (saḥ) =God or living being, (tvam) =you,(hi)= definitely, (etāni) =to all these, (ni) =well, (pāhi) =protect.
English Translation (K.K.V.)
O knowledgeable and scholar! You who are like the lightning that gives all the pleasures, the one who is the one who has bright nights, in order to get adequate amount of things like knowledge, gems, kingdom etc., all these are given to human beings by the birth of very divine qualities or scholars in sermons with the most beautiful words, then provides to different people. O God or living being, you definitely protect all of them well.
TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand
There silent vocal simile as a figurative in this mantra. The Supreme God or the learned one, being the embodiment of Veda knowledge, imparts all the knowledge to all human beings through the teachings given by him, He is the one who is worthy of being worshiped by humans and should be associated with him.
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