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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 70 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 70/ मन्त्र 9
    ऋषिः - पराशरः शाक्तः देवता - अग्निः छन्दः - द्विपदा विराट् स्वरः - पञ्चमः

    गोषु॒ प्रश॑स्तिं॒ वने॑षु धिषे॒ भर॑न्त॒ विश्वे॑ ब॒लिं स्व॑र्णः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    गोषु॑ । प्रऽश॑स्तिम् । वने॑षु । धिषे॑ । भर॑न्त । विश्वे॑ । ब॒लिम् । स्वः॑ । नः॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    गोषु प्रशस्तिं वनेषु धिषे भरन्त विश्वे बलिं स्वर्णः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    गोषु। प्रऽशस्तिम्। वनेषु। धिषे। भरन्त। विश्वे। बलिम्। स्वः। नः ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 70; मन्त्र » 9
    अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 14; मन्त्र » 9
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    हे भरन्त ! पुरुत्रा गोषु बलिं स्वः वनेषु प्रशस्तिं नो विधिषेऽतो विश्वे नरः पुत्राः जिव्रेः पितुर्वेदो भरन्त न त्वा सपर्यन् ॥ ५ ॥

    पदार्थः

    (गोषु) पृथिव्यादिषु (प्रशस्तिम्) प्रशस्तव्यवहारम् (वनेषु) सम्यग्विभाजकेषु किरणेषु (धिषे) दधासि (भरन्त) यो भरति सर्वं विश्वं सर्वान् गुणांस्तत्संबुद्धौ (विश्वे) सर्वे (बलिम्) संवरणम् (स्वः) आदित्यम् (नः) अस्मान् (वि) विशेषे (त्वा) त्वाम् (नरः) नयनकर्त्तारो मनुष्याः (पुरुत्रा) पुरूणि देयानि (सपर्यन्) परिचरन्ति (पितुः) (न) इव (जिव्रेः) जीर्णात् वृद्धावस्थां प्राप्तात् जनकात् (वि) विशेषे (वेदः) विन्दति सुखानि येन धनेन तत् (भरन्त) धरन्तु ॥ ५ ॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। हे मनुष्याः ! सर्वे यूयं येन जगदीश्वरेण सनातनात्कारणात्सर्वाणि कार्याणि वस्तून्युत्पाद्य स्पर्शादयो गुणाः प्रकाशिताः। यस्य सृष्टावुत्पन्नानां जनकस्य पुत्रा इव सर्वे जीवा दायभागिनः सन्ति। येन सर्वेभ्यः सर्वाणि सुखानि दीयन्ते तस्यात्ममनोवाक्छरीरधनैर्नित्यं परिचर्य्यां यूयं कुरुत ॥ ५ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर ईश्वर के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

    पदार्थ

    हे (भरन्त) सब विश्व वा सब गुणों को धारण करनेवाले जगदीश्वर ! जिस कारण (पुरुत्रा) बहुत दान करने योग्य आप (गोषु) पृथिवी आदि पदार्थों में (बलिम्) संवरण (स्वः) आदित्य (वनेषु) किरणों में (प्रशस्तिम्) उत्तम व्यवहार और (नः) हम लोगों को (वि धिषे) विशेष धारण करते हो (विश्वे) सब (नरः) इससे विद्वान् लोग जैसे (पुत्राः) पुत्र (जिव्रेः) वृद्धावस्था को प्राप्त हुए (पितुः) पिता के सकाश से (वेदः) विद्याधन को (भरन्त) धारण करें (न) वैसे (त्वा) आपका (सपर्यन्) सेवन करते हैं ॥ ५ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम सब लोग जिस जगदीश्वर ने सनातन कारण से सब कार्य अर्थात् स्थूलरूप वस्तुओं को उत्पन्न करके स्पर्श आदि गुणों को प्रकाशित किया है, जिसकी सृष्टि में उत्पन्न हुए सब पदार्थों के पिता-पुत्र के समान सब जीव दायभागी हैं, जो सब प्राणियों के लिये सब सुखों को देता है, उसी की आत्मा, मन, वाणी, शरीर और धनों से सेवा करो ॥ ५ ॥

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    विषय

    अध्यात्म - सम्पत्ति की प्राप्ति 

    पदार्थ

    १. हे प्रभो ! आप ही (वनेषु) = उपासकों में (गोषु) = ज्ञानेन्द्रिय - विषयक (प्रशस्तिम्) = उत्तमता को (धिषे) = स्थापित करते हैं अथवा आप ही (वनेषु) = हमारी ज्ञानरश्मियों में तथा (गोषु) = ज्ञानेन्द्रियों में प्रशस्ति को स्थापित करते हैं । आपकी कृपा से हमारा ज्ञान उज्ज्वल होता है और ज्ञान की उज्ज्वलता के लिए ही आप हमारी ज्ञानेन्द्रियों को उत्तम बनाते हैं । पवित्र व उत्तम बनी हुई (विश्वे) = ये सब इन्द्रियाँ - ये सब देव [विश्वेदेवाः] (नः) = हमारे लिए (स्वः बलिम्) = प्रकाश की भेंट को (भरन्त) = प्राप्त कराती हैं । २. इस प्रकार ज्ञान को प्राप्त करानेवाले (नरः) = प्रगतिशील लोग (त्वा) = आपको (पुरुत्रा) = सर्वत्र, सब कार्यों में (विसपर्यन्) = विशेष रूप से पूजते हैं, कर्मों के द्वारा आपका अर्चन करते हैं, कर्मों को करते हुए उन्हें आपको अर्पित कर देते हैं । ज्ञान उन्हें निरहंकार बनाता है । ३. इस प्रकार आपके सच्चे पुत्र बनकर ये ज्ञानी लोग आपसे उसी प्रकार (वेदः) = अध्यात्म - सम्पत्ति को (विभरन्त) = अपने में भरते हैं (न) = जैसे (जिव्रेः पितुः) = वृद्ध पिता से उनके सुपुत्र (वेदः) = धन को प्राप्त करते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु - कृपा से हमारी ज्ञानरश्मियाँ प्रशस्त हों, हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ उत्तम हो । ज्ञानी बनकर हम अपने कर्मों को प्रभु - अर्पण करते हुए प्रभु की अर्चना करें और उस परमपिता प्रभु से अध्यात्म - सम्पत्ति को प्राप्त करें ।

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    विषय

    विषय (भाषा)- फिर ईश्वर के गुणों का उपदेश इस मन्त्र में किया है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे भरन्त ! पुरुत्रा गोषु बलिं स्वः वनेषु प्रशस्तिं नः वि धिषे अतः विश्वे नरः पुत्राः जिव्रेः पितुः वेदः भरन्त न त्वा सपर्यन् ॥५॥

    पदार्थ

    पदार्थः- हे (भरन्त) यो भरति सर्वं विश्वं सर्वान् गुणांस्तत्संबुद्धौ=सारे विश्व में सबको गुणों से भरनेवाले ! (पुरुत्रा) पुरूणि देयानि=बहुत वस्तुओं को देनेवाला, (गोषु) पृथिव्यादिषु=पृथिवी आदि में, (बलिम्) संवरणम्= आच्छादित करने को, (स्वः) आदित्यम्=सूर्य, (वनेषु) सम्यग्विभाजकेषु किरणेषु=अच्छे प्रकार से विभाजन करनेवाली किरणों में, (प्रशस्तिम्) प्रशस्तव्यवहारम्=प्रशस्त व्यहार को, (नः) अस्मान्=हमें, (वि) विशेषे=विशेष रूप से, (धिषे) दधासि=देते हो, (अतः)=इसलिये, (विश्वे) सर्वे=समस्त, (नरः) नयनकर्त्तारो मनुष्याः=ले जानेवाले मनुष्यों के, (पुत्राः)= पुत्र, (जिव्रेः) जीर्णात् वृद्धावस्थां प्राप्तात् जनकात्=जीर्ण वृद्ध आयु को प्राप्त हुए पिता, (पितुः)= पिता, (वेदः) विन्दति सुखानि येन धनेन तत्=जिस धन से सुखों को खोजने के लिए, (भरन्त) धरन्तु=धारण करने के, (न) इव=समान, (त्वा) त्वाम्=तुम्हारी, (सपर्यन्) परिचरन्ति=सेवा करते हैं ॥५॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यों ! तुम सब में जिस परमेश्वर ने सनातन कारणों से सब कार्य और स्थूलरूप वस्तुओं को उत्पन्न करके, स्पर्श आदि गुणों को प्रकाशित किया है। जिसकी सृष्टि में उत्पन्न हुओं के पिताओं के पुत्र के समान सब जीव विरासत के साझीदार हैं। जिसके द्वारा सब प्राणियों को सब सुख दिये जाते हैं, उसी की अपने मन, वाणी, शरीर और धनों से तुम सेवा करो ॥५॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)- हे (भरन्त) सारे विश्व में सबको गुणों से भरनेवाले ! (पुरुत्रा) बहुत वस्तुओं को देनेवाला (बलिम्) आच्छादित करने को (गोषु) पृथिवी आदि में, (स्वः) सूर्य (वनेषु) अच्छे प्रकार से विभाजन करनेवाली किरणों से (प्रशस्तिम्) प्रशस्त व्यहार को, (नः) हमें (वि) विशेष रूप से (धिषे) देते हो। (अतः) इसलिये (विश्वे) समस्त (नरः) मनुष्यों के (पुत्राः) पुत्र (जिव्रेः) जीर्ण और वृद्ध आयु को प्राप्त हुए (पितुः) पिता को, (वेदः) जिस धन से सुखों को खोजने के लिए (भरन्त) धारण करने के (न) समान (त्वा) तुम्हारी (सपर्यन्) सेवा करते हैं ॥५॥

    संस्कृत भाग

    गोषु॑ । प्रऽश॑स्तिम् । वने॑षु । धिषे॑ । भर॑न्त । विश्वे॑ । ब॒लिम् । स्वः॑ । नः॒ ॥ वि । त्वा॒ । नरः॑ । पु॒रु॒ऽत्रा । स॒प॒र्य॒न् । पि॒तुः । न । जिव्रेः॑ । वि । वेदी॑ । भ॒र॒न्त॒ ॥ पदार्थः(महर्षिकृतः)- (गोषु) पृथिव्यादिषु (प्रशस्तिम्) प्रशस्तव्यवहारम् (वनेषु) सम्यग्विभाजकेषु किरणेषु (धिषे) दधासि (भरन्त) यो भरति सर्वं विश्वं सर्वान् गुणांस्तत्संबुद्धौ (विश्वे) सर्वे (बलिम्) संवरणम् (स्वः) आदित्यम् (नः) अस्मान् (वि) विशेषे (त्वा) त्वाम् (नरः) नयनकर्त्तारो मनुष्याः (पुरुत्रा) पुरूणि देयानि (सपर्यन्) परिचरन्ति (पितुः) (न) इव (जिव्रेः) जीर्णात् वृद्धावस्थां प्राप्तात् जनकात् (वि) विशेषे (वेदः) विन्दति सुखानि येन धनेन तत् (भरन्त) धरन्तु ॥५॥ विषयः- पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥ अन्वयः- हे भरन्त ! पुरुत्रा गोषु बलिं स्वः वनेषु प्रशस्तिं नो विधिषेऽतो विश्वे नरः पुत्राः जिव्रेः पितुर्वेदो भरन्त न त्वा सपर्यन् ॥५॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्रोपमालङ्कारः। हे मनुष्याः ! सर्वे यूयं येन जगदीश्वरेण सनातनात्कारणात्सर्वाणि कार्याणि वस्तून्युत्पाद्य स्पर्शादयो गुणाः प्रकाशिताः। यस्य सृष्टावुत्पन्नानां जनकस्य पुत्रा इव सर्वे जीवा दायभागिनः सन्ति। येन सर्वेभ्यः सर्वाणि सुखानि दीयन्ते तस्यात्ममनोवाक्छरीरधनैर्नित्यं परिचर्य्यां यूयं कुरुत ॥५॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Agni, lord sustainer of life and the world, you in-vest the cows and forests and the earth and sunbeams with excellence of quality, virtue and wealth. May all powers of nature and humanity bear and bring joy for us. May all people doing homage to you in various ways receive from you and bear and advance knowledge like children receiving patrimony from the parents.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How is Agni is taught further in the fifth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O God Supporter and Nourisher of the world, Thou who art protector and giver of all things, conferest preserving power in the cattle and the earth etc. Thou createst the sun and establishest excellence in the rays. In this way, Thou upholdest and preservest us. Therefore all leaders worship and serve Thee as the sons serve their father from whom they get knowledge and wealth.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (गोषु) पृथिव्यादिषु = In earth and other things. (वनेषु) सम्यग् विभाजकेषु किरणेषु = In the rays. (वेदः) विन्दति सुखानि येन तत् धनम् विद्याविरूपम् = Wealth. (वेद इति धननाम निघ०)

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    There is Upamalankara or simile in the Mantra. O men, you must serve and adore God with your mind, body and wealth (by obeying His commands to do good to all beings) who has created all non-eternal objects or effects from the eternal cause-Primordial Matter and has established in them touch and other attributes, in whose creation all souls are heirs as the sons of their father, and who is the Giver of all happiness to all.

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    Subject of the mantra

    Then the qualities of God have been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (bharanta)=the one who fills everyone in the entire world with virtues, (purutrā)= giver of many things, (balim)=to cover, (goṣu)= in the earth etc., (svaḥ) =Sun, (vaneṣu)= by well dividing rays, (praśastim) praśasta vyahāra ko, (naḥ) =tous, (vi)=especially, (dhiṣe) =give, (ataḥ) =therefore, (viśve) =all, (naraḥ) =of human’s (putrāḥ) =son, (jivreḥ) =aged and reached old age, (pituḥ) =to father, (vedaḥ) =wealth with which to find happiness, (bharanta) =to hold (na) =like, (tvā) =your, (saparyan) =serve.

    English Translation (K.K.V.)

    O the one who fills everyone in the entire world with virtues! The one who gives many things, the Sun to cover the earth etc. and the rays that divide well, you especially give us the abundant behaviour. Therefore, the sons of all human beings serve you like a father who has reached old age and wealth with which to earn happiness.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There is simile as a figurative in this mantra. O humans! The God, who has created all the works and physical objects for eternal reasons and has manifested the qualities of touch etc. in all of you. In whose creation all living beings are partners in inheritance like the sons of their fathers. By whom all happiness is given to all living beings, serve him with your mind, speech, body and wealth.

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