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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 86 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 86/ मन्त्र 4
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - मरुतः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    अ॒स्य वी॒रस्य॑ ब॒र्हिषि॑ सु॒तः सोमो॒ दिवि॑ष्टिषु। उ॒क्थं मद॑श्च शस्यते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्य । वी॒रस्य॑ । ब॒र्हिषि॑ । सु॒तः । सोमः॑ । दिवि॑ष्टिषु । उ॒क्थम् । मदः॑ । च॒ । श॒स्य॒ते॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्य वीरस्य बर्हिषि सुतः सोमो दिविष्टिषु। उक्थं मदश्च शस्यते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्य। वीरस्य। बर्हिषि। सुतः। सोमः। दिविष्टिषु। उक्थम्। मदः। च। शस्यते ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 86; मन्त्र » 4
    अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 11; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तै शिक्षितैः किं जायत इत्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    हे विद्वांसो ! भवच्छिक्षितस्यास्य वीरस्य सुतः सोमो दिविष्टिषूक्थं बर्हिषि मदो गुणसमूहश्च शक्यते नेतरस्य ॥ ४ ॥

    पदार्थः

    (अस्य) (वीरस्य) विज्ञानशौर्य्यनिर्भयाद्युपेतस्य (बर्हिषि) उत्तमे व्यवहारे कृते सति (सुतः) निष्पन्नः (सोमः) ऐश्वर्यसमूहः (दिविष्टिषु) दिव्या इष्टयः सङ्गतानि कर्माणि सुखानि वा येषु व्यवहारेषु तेषु (उक्थम्) शास्त्रप्रवचनम् (मदः) आनन्दः (च) विद्यादयो गुणाः (शस्यते) स्तूयते ॥ ४ ॥

    भावार्थः

    विदुषां शिक्षया विना मनुष्येषूत्तमा गुणा न जायन्ते तस्मादेतन्नित्यमनुष्ठेयम् ॥ ४ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर उन शिक्षित मनुष्यों से क्या होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

    पदार्थ

    हे विद्वानो ! आपके सुशिक्षित (अस्य) इस (वीरस्य) वीर का (सुतः) सिद्ध किया हुआ (सोमः) ऐश्वर्य (दिविष्टिषु) उत्तम इष्टिरूप कर्मों से सुखयुक्त व्यवहारों में (उक्थम्) प्रशंसित वचन (बर्हिषि) उत्तम व्यवहार के करने में (मदः) आनन्द (च) और सद्विद्यादि गुणों का समूह (शस्यते) प्रशंसित होता है, अन्य का नहीं ॥ ४ ॥

    भावार्थ

    विद्वानों की शिक्षा के विना मनुष्यों में उत्तम गुण उत्पन्न नहीं होते। इससे इसका अनुष्ठान नित्य करना चाहिये ॥ ४ ॥

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    विषय

    स्तवन व आनन्द

    पदार्थ

    १. (अस्य वीरस्य) = प्राणसाधना के द्वारा वीर बने हुए इस पुरुष के (बर्हिषि) = यज्ञों के होने पर तथा (दिविष्टिषु) = [दिव एषणेषु = निरु० ६/२२] ज्ञान की एषणाओं में - ज्ञानप्राप्ति की कामनाओं में (सोमः सुतः) = सोम का सम्पादन होता है । जब मनुष्य कर्मेन्द्रियों से यज्ञादि उत्तम कर्मों में लगा रहता है और ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञानप्राप्ति की कामनावाला बना रहता है तब वह वासनाओं का शिकार नहीं होता । बस, वासनाओं से आक्रान्त न होना ही सोम के सम्पादन का साधन है । वासना सोम = वीर्य की विनाशक है । २. सोम का रक्षण होने पर इस वीर पुरुष के जीवन में (उक्थम्) = स्तोत्र - प्रभुस्तवन चलता है (च) = और (मदः) = आनन्द का अनुभव होता है । इस वीर के जीवन की ये दो ही बातें (शस्यते) = प्रशंसनीय होती हैं । प्रभुस्तवन व आनन्दमय मन इसके जीवन को स्तुत्य बनानेवाले होते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ = वीर पुरुष कर्मेन्द्रियों को यज्ञों में और ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञानप्राप्ति में लगाता है । इस प्रकार सोम का रक्षण करता हुआ स्तवन व आनन्दमय मन से जीवन को प्रशस्त करता है ।

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    विषय

    उनके कर्तव्य ।

    भावार्थ

    ( बर्हिषि ) वृद्धिशील प्रजाजन के हित के निमित्त तथा ( दिविष्टिषु ) दिव्य उत्तम कर्मों के निमित्त ( अस्य वीरस्य ) इस वीर्यवान् पराक्रमी पुरुष को ( सुतः ) अभिषेक द्वारा प्राप्त हुआ (सोमः) राज्यैश्वर्य और ( उक्थं ) उत्तम वचन और ( मदः ) आनन्द, हर्ष ( च ) और अन्यान्य गुण भी ( शस्यते ) प्रशंसा योग्य होते हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गोतमो राहूगण ऋषिः ॥ मरुतो देवता ॥ छन्दः–१, ४, ८, ९ गायत्री । २, ३, ७ पिपीलिका मध्या निचृद्गायत्री । ५, ६, १० निचृद्गायत्री ॥ दशर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    विषय (भाषा)- फिर उन शिक्षित मनुष्यों से क्या होता है, इस विषय को इस मन्त्र में कहा है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे विद्वांसः ! भवत् शिक्षितस्य अस्य वीरस्य सुतः सोमः दिविष्टिपु उक्थं बर्हिषि मदः गुणसमूहः च {शस्यते} न इतरस्य ॥४॥

    पदार्थ

    पदार्थः- हे (विद्वांसः)=विद्वानों ! (भवत्)=आपके, (शिक्षितस्य)= शिक्षित किये हुए, (अस्य)=इस, (वीरस्य) विज्ञानशौर्य्यनिर्भयाद्युपेतस्य=विशेष ज्ञान, शौर्य और निर्भयता से, (सुतः) निष्पन्नः=परिपूर्ण, (सोमः) ऐश्वर्यसमूहः= ऐश्वर्यों के समूह, (दिविष्टिषु) दिव्या इष्टयः सङ्गतानि कर्माणि सुखानि वा येषु व्यवहारेषु तेषु=दिव्य कामनाओं और सङ्गत कर्मों के सुखों अथवा व्यवहारों में, (उक्थम्) शास्त्रप्रवचनम्=शास्त्रों के कथन और, (बर्हिषि) उत्तमे व्यवहारे कृते सति=उत्तम व्यवहारों के किये जाने पर, (मदः) आनन्दः= आनन्द और, (गुणसमूहः)= गुणों के समूह, अर्थात्, (च) विद्यादयो गुणाः=विद्या आदि गुणों की, {शस्यते} स्तूयते=प्रशंसा की जाती है, (न+ इतरस्य)=अन्य की नहीं ॥४॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- विद्वानों की शिक्षा के विना मनुष्यों में उत्तम गुण उत्पन्न नहीं होते, इसलिये इस नियम का अनुष्ठान करना चाहिये ॥४॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)- हे (विद्वांसः) विद्वानों ! (भवत्) आपके द्वारा (शिक्षितस्य) शिक्षित किये हुए, (अस्य) इस (वीरस्य) विशेष ज्ञान, शौर्य और निर्भयता से (सुतः) परिपूर्ण (सोमः) ऐश्वर्यों के समूह और (दिविष्टिषु) दिव्य कामनाओं और सङ्गत कर्मों के सुखों अथवा व्यवहारों में, (उक्थम्) शास्त्रों के कथन और (बर्हिषि) उत्तम व्यवहारों के किये जाने पर (मदः) आनन्द और (गुणसमूहः) गुणों के समूह, अर्थात् (च) विद्या आदि गुणों की {शस्यते} प्रशंसा की जाती है, (न+ इतरस्य) अन्य की नहीं ॥४॥

    संस्कृत भाग

    अ॒स्य । वी॒रस्य॑ । ब॒र्हिषि॑ । सु॒तः । सोमः॑ । दिवि॑ष्टिषु । उ॒क्थम् । मदः॑ । च॒ । श॒स्य॒ते॒ ॥ विषयः- पुनस्तै शिक्षितैः किं जायत इत्युपदिश्यते ॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- विदुषां शिक्षया विना मनुष्येषूत्तमा गुणा न जायन्ते तस्मादेतन्नित्यमनुष्ठेयम् ॥४॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    विद्वानांनी दिलेल्या शिक्षणाशिवाय माणसांमध्ये उत्तम गुण उत्पन्न होत नाहीत. त्यामुळे त्याचे अनुष्ठान नित्य करावे. ॥ ४ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    The soma of honour and fame distilled on the holy seats of yajna, the holy chant of praise, and the joy and celebration of the brilliant achievement of this brave young man is exceptional and it is raised all round.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What is the result of such training is taught further in the fourth Mantra

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O learned persons! Of the hero who is trained by you, the wealth earned by him righteously, the study and teaching of the Shastras, the joy experienced by him when he does noble deeds in delightening dealings, his deep knowledge and other virtues are praised and sung by all and not of ignoble men.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (बर्हिषि) उत्तमे व्यवहारे कृते सति = On behaving nobly. (दिविष्टिषु) दिव्याः इष्टय:-संगतानिकर्माणि वा येषु व्यवहारेषु तेषु । = In delightening dealings.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    It is not possible to acquire or cultivate good virtues among men without the education received from learned persons; therefore such education must be received by all.

    Translator's Notes

    बर्हिषि इति महन्नाम (निघ० ३.३) So it has been interpreted by Rishi Dayananda as उत्तमे व्यवहारे यज-देवपूजासंगतिकरजदानेषु अन्न संगतिकरणार्थस्य ग्रहणम् ।

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    Subject of the mantra

    Then, what is done by those educated persons? This has been discussed in the mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (vidvāṃsaḥ) =scholars, (bhavat) =by you, (śikṣitasya) =taught, (asya) =this, (vīrasya)=with special knowledge, bravery and fearlessness, (sutaḥ)= perfect, (somaḥ)= group of opulences and, (diviṣṭiṣu)=In the pleasures or activities of divine desires and corresponding actions, (uktham=statements of the scriptures and, (barhiṣi)=on best practices done, (madaḥ) =joys and, (guṇasamūhaḥ) =group of virtues, that is, (ca)=of qualities like knowledge etc., {śasyate} =is praised, (na+ itarasya) =not others.

    English Translation (K.K.V.)

    O scholars! In this group of opulences and the pleasures or practices of divine desires and corresponding actions, filled with perfect knowledge, bravery and fearlessness, taught by you, the scriptures are recited and good behaviour is performed, the group of joys and virtues, i.e. knowledge etc., are praised, and not others.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    Without the education of scholars, good qualities do not develop in humans, hence this rule should be followed.

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