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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 137 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 137/ मन्त्र 7
    ऋषिः - सप्त ऋषय एकर्चाः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - निचृदनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः

    हस्ता॑भ्यां॒ दश॑शाखाभ्यां जि॒ह्वा वा॒चः पु॑रोग॒वी । अ॒ना॒म॒यि॒त्नुभ्यां॑ त्वा॒ ताभ्यां॒ त्वोप॑ स्पृशामसि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    हस्ता॑भ्याम् । दश॑ऽशाखाभ्याम् । जि॒ह्वा । वा॒चः । पु॒रः॒ऽग॒वी । अ॒ना॒म॒यि॒त्नुऽभ्या॑म् । त्वा॒ । ताभ्या॑म् । त्वा॒ । उप॑ । स्पृ॒शा॒म॒सि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिह्वा वाचः पुरोगवी । अनामयित्नुभ्यां त्वा ताभ्यां त्वोप स्पृशामसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    हस्ताभ्याम् । दशऽशाखाभ्याम् । जिह्वा । वाचः । पुरःऽगवी । अनामयित्नुऽभ्याम् । त्वा । ताभ्याम् । त्वा । उप । स्पृशामसि ॥ १०.१३७.७

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 137; मन्त्र » 7
    अष्टक » 8; अध्याय » 7; वर्ग » 25; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (दशशाखाभ्यां) दश अङ्गुलियोंवाले (हस्ताभ्याम्) दोनों हाथों से (अनामयित्नुभ्याम्) रोगनिवारक उन हाथों से (त्वा-उप स्पृशामसि) तुझे स्पर्श करते हैं तथा (जिह्वा) जिह्वा (वाचः पुरोगवी) वाणी की प्रेरणा करनेवाली आश्वासन देनेवाली है, रोग दूर हो जावेगा, यह आशा है ॥७॥

    भावार्थ

    रोगी को यथोचित वाणी से अच्छे होने का आश्वासन दे, साथ में दोनों पूरे अँगुलियों सहित हाथों को यथोचित स्पर्श करते जावें, ऐसे जैसे इनसे रोग दूर होता हुआ प्रतीत हो रोगी को लाभ पहुँचाता है ॥७॥

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    विषय

    वैद्य का अन्तिम कथन [ हस्तस्पर्श व प्रेरणा ]

    पदार्थ

    [१] वैद्य रोगी से अन्त में कहता है कि यह जिह्वा वाणी [वाचः] - उत्साह के शब्दों के द्वारा (पुरोगवी) = आगे ले चलनेवाली होती है। अर्थात् मेरे शब्द तेरे में उत्साह का संचार करें। तुझे इन शब्दों से शीघ्र नीरोग हो जाने का पूर्ण विश्वास हो । [२] और इन (दशशाखाभ्याम्) = दस अंगुली रूप शाखाओंवाले (हस्ताभ्याम्) = हाथों जो कि (अनामयित्नुभ्याम्) = नीरोग करनेवाले हैं, (ताभ्याम्) = उन हाथों से (त्वा) = तुझे (त्वा) = निश्चय से तुझे (उपस्पृशामसि) = हम समीपता से छूते हैं और तेरे इस रोग को दूर करते हैं। इस प्रकार वैद्य उत्साह की वाणी व विशिष्ट स्पर्श से रोगी के रोग को दूर करने का वातावरण उपस्थित करता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - वैद्य रोगी में उत्साह का संचार करता हुआ अपने हस्त- स्पर्श से उसके रोग के दूर भगाने का निश्चय करता है । वायु आदि देवों की अनुकूलता, जल का ठीक प्रयोग, प्राणायाम व योग्य वैद्य की प्रेरणा ये सब बातें हमें नीरोग बनाती हैं और पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करती हैं। स्वस्थ बनकर हम क्रियाशील होते हैं। अस्वस्थ होने पर पड़े रहने की तबीयत होती है । यह स्वस्थ पुरुष 'अंग: ' [अगि गतौ] गतिशील होता है और 'औरवः' [उरोः अपत्यम्:] = खूब विशाल हृदयवाला होता है । स्वास्थ्य के साथ उदारता का सम्बन्ध है, अस्वास्थ्य के साथ संकुचित हृदयता का । इन 'अङ्ग औरवों' का चित्रण करते हुए कहते हैं कि-

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    विषय

    रोगनाश के लिये वाणी के प्रयोग के साथ हाथों की दशों अंगुलियों के स्पर्श का प्रयोग।

    भावार्थ

    (दश-शाखाम्यां हस्ताम्याम्) दस शाखाओं वाले दोनों हाथों के साथ (वाचः पुरोगवी) वाणी को आगे फेंकने वाली (जिह्वा) जीभ (ताभ्यां अनामयित्नुभ्याम्) उन रोगहारी दोनों हाथों से (त्वा उप स्पृशामसि) हम तुझे स्पर्श करते हैं। इति पञ्चविंशो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः सप्त ऋषय एकर्चाः॥ विश्वेदेवा देवताः॥ छन्द:- १, ४, ६ अनुष्टुप्। २, ३, ५, ७ निचृदनुष्टुप्॥ सप्तर्चं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (दशशाखाभ्यां हस्ताभ्याम्) दशाङ्गुलिकाभ्यां हस्ताभ्याम् “शाखाः-अङ्गुलिनाम” [निघ० ३।५] (अनामयित्नुभ्यां ताभ्याम्) रोगनिवारकाभ्यां ताभ्यां (त्वा-उप स्पृशामसि) त्वामुपस्पृशामः तथा (जिह्वा वाचः पुरोगवी) जिह्वा वाचः पुरः प्रेरयित्री तथाऽऽश्वासनेनापि रोगो दूरीभविष्यतीत्याशासे ॥७॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    The tongue is the leading articulator of the physician’s speech. The two hands and ten fingers are the physician’s magical touch. The soothing speech and soft sympathetic touch of both hands and ten fingers, with these two inspiring curatives, O suffering man, we touch and retouch you and caress you back to health and self-assurance.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    योग्य वाणी वापरून रोग्याला स्वास्थ्य लाभेल असे आश्वासन द्यावे. त्याबरोबर दोन्ही हाताच्या पूर्ण बोटांनी त्याच्या हाताला स्पर्श करावा. असा स्पर्श करावा, की त्याला रोग दूर होत आहे असे वाटावे, त्यामुळे रोग्याला लाभ होईल. ॥७॥

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