Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 34 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 34/ मन्त्र 5
    ऋषिः - कवष ऐलूष अक्षो वा मौजवान् देवता - अक्षकितवनिन्दा छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    यदा॒दीध्ये॒ न द॑विषाण्येभिः परा॒यद्भ्योऽव॑ हीये॒ सखि॑भ्यः । न्यु॑प्ताश्च ब॒भ्रवो॒ वाच॒मक्र॑तँ॒ एमीदे॑षां निष्कृ॒तं जा॒रिणी॑व ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । आ॒ऽदी॒ध्ये॒ । न । द॒वि॒षा॒णि॒ । ए॒भिः॒ । प॒रा॒यत्ऽभ्यः॑ । अव॑ । हीये॑ । सखि॑ऽभ्यः । निऽउ॑प्ताः । च॒ । ब॒भ्रवः॑ । वाच॑म् । अक्र॑त । एमि॑ । इत् । ए॒षा॒म् । निः॒ऽकृ॒तम् । जा॒रिणी॑ऽइव ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यदादीध्ये न दविषाण्येभिः परायद्भ्योऽव हीये सखिभ्यः । न्युप्ताश्च बभ्रवो वाचमक्रतँ एमीदेषां निष्कृतं जारिणीव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । आऽदीध्ये । न । दविषाणि । एभिः । परायत्ऽभ्यः । अव । हीये । सखिऽभ्यः । निऽउप्ताः । च । बभ्रवः । वाचम् । अक्रत । एमि । इत् । एषाम् । निःऽकृतम् । जारिणीऽइव ॥ १०.३४.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 34; मन्त्र » 5
    अष्टक » 7; अध्याय » 8; वर्ग » 3; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (यत्-आदीध्ये-एभिः-न दविषाणि) जब मैं सङ्कल्प करता हूँ कि इन पाशों से नहीं खेलूँगा (परायद्भ्यः सखिभ्यः-अवहीये) मुझ पर प्रभाव डालनेवाले आते हुए जुआरी साथियों से मैं दब जाता हूँ, (बभ्रवः-न्युप्ताः-च वाचम्-अक्रत) चमकते हुए जुए के पाशे फैंके हुए जब शब्द करते हैं, (एषां निष्कृतं जारिणी-इव-एमि) इन पाशों के सजे स्थान की ओर व्यभिचारिणी स्त्री की भाँति चला जाता हूँ ॥५॥

    भावार्थ

    जुए का व्यसन जब किसी को पड़ जाता है, उससे बचना कठिन हो जाता है। बचने की भावना या संकल्प होते हुए भी पुराने साथियों को और जुए के स्थान को देखकर जुए की ओर फिर चल पड़ता है। यह व्यसन बहुत बुरा है और इससे बचना चाहिये ॥५॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    व्यसन की प्रबलता व दुरन्तता

    पदार्थ

    [१] उपरोक्त प्रकार से जुए से होनेवाली दुर्गति को देखकर (यद्) = जब (आदीध्ये) = यह ध्यान करता हूँ कि (एभिः) = इनसे (न दविषाणि) = [देविष्यामि] अब जुवा न खेलूँगा, इस जुए के परिणामरूप मैं (परायद्भ्यः) = एक-एक करके दूर जाते हुए (सखिभ्यः) = मित्रों से (अवहीये) = मैं हीन होता जाता हूँ। [२] परन्तु, (च) = और जब (न्युप्ता:) = द्यूत- फलक पर डाले हुए (बभ्रवः) = बभ्रु [Brown] वर्णवाले ये पासे वाचं अक्रत शब्द को करते हैं तो मैं (एषां निष्कृतम्) = इनके स्थान को (द्यूत) = व्यसन से अभिभूत हुआ हुआ मैं सब सङ्कल्पों को छोड़कर (एमि इत्) = आता ही हूँ। मैं फिर द्यूत सभा में पहुँच जाता हूँ, उसी प्रकार पहुँच जाता हूँ (इव) = जैसे कि (जारिणी) = कोई स्वच्छन्द आचरणवाली स्त्री संकेत स्थान की ओर अग्रसर होती है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- व्यसन दुरन्त हैं, इनका अन्त तो खराब है ही, पर इनका अन्त करना भी बड़ा कठिन है ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    जूएखोर की व्यसनमग्नता उसका घोर अधःपतन।

    भावार्थ

    मैं व्यसनी पुरुष (यद् आदीध्ये) जब ध्यान करता हूँ, उनकी चिन्ता करता हूं तब (एभिः न दविषाणि) इनके द्वारा दुःखित या पश्चात्ताप से युक्त भी नहीं होता, प्रत्युत (परायद्भ्यः सखिभ्यः) दूर से आने वाले वा दूर गये मित्रों के समान उनके लिये (अव हीये) बड़ा ध्यान देता हूँ। (२) वे (बभ्रवः) लाल-पीले गब्रू रंग के (न्युप्ताः) फेंके जाकर (वाचम् अक्रत) मानो बतियाते हैं और मैं भी (एषां निष्कृतं) इनके स्थान को (जारिणी इव एमि इत्) व्यभिचारिणी स्त्री के समान चला ही जाता। व्यसनी मनुष्य रसों का भी इसी प्रकार लोलुप हो जाता है, वह उनका अनुचिन्तन किया करता है और व्यभिचारिणी स्त्री के समान लुक छिप कर व्यसनों में पड़ता है। इति तृतीयो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कवष ऐलुषोऽक्षो वा मौजवान् ऋषिः। देवताः- १, ७, ९, १२, १३ अक्षकृषिप्रशंसा। २–६, ८, १०, ११, १४ अक्षकितवनिन्दा। छन्द:- १, २, ८, १२, १३ त्रिष्टुप्। ३, ६, ११, १४ निचृत् त्रिष्टुप्। ४, ५, ९, १० विराट् त्रिष्टुप्। ७ जगती॥ चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (यत्-आदीध्ये-एभिः न दविषाणि) यदा संकल्पयामि-एभिरक्षैर्न क्रीडिष्यामि (परायद्भ्यः सखिभ्यः अवहीये) परागच्छद्भ्यः स्वयं बलादागच्छद्भ्यः कितवेभ्योऽवस्थितो भवामि स्तब्धो भवामि (बभ्रवः-न्युप्ताः-च वाचम्-अक्रत) बभ्रुवर्णा अक्षाः क्षिप्ताश्च शब्दं कुर्वन्ति तदा (एषां निष्कृतं जारिणी-इव-एमि) एषामक्षाणां सम्पादितं स्थानं व्यभिचारिणीव गच्छामि ॥५॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    When I realise and think I must not play with dice and must not be miserable, even then, having so decided, I succumb to the approaching dice as to seductive friends. Red and shining dice cast in the game rattle and resound, and I walk into the den like a woman stealing to her paramour.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    जुगाराचे व्यसन जेव्हा एखाद्याला लागते त्यापासून त्याला बचाव करणे कठीण होते. बचाव करण्याची भावना किंवा संकल्प असूनही जुने सोबती व जुगाराचे स्थान पाहून जुगाराकडे वळतो. हे व्यसन अतिशय वाईट आहे. त्यापासून दूर राहिले पाहिजे. ॥५॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top