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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 34 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 34/ मन्त्र 8
    ऋषिः - कवष ऐलूष अक्षो वा मौजवान् देवता - अक्षकितवनिन्दा छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    त्रि॒प॒ञ्चा॒शः क्री॑ळति॒ व्रात॑ एषां दे॒व इ॑व सवि॒ता स॒त्यध॑र्मा । उ॒ग्रस्य॑ चिन्म॒न्यवे॒ ना न॑मन्ते॒ राजा॑ चिदेभ्यो॒ नम॒ इत्कृ॑णोति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्रि॒ऽप॒ञ्चा॒शः । क्री॒ळ॒ति॒ । व्रातः॑ । ए॒षा॒म् । दे॒वःऽइ॑व । स॒वि॒ता । स॒त्यऽध॑र्मा । उ॒ग्रस्य॑ । चि॒त् । म॒न्यवे॑ । न । न॒म॒न्ते॒ । राजा॑ । चि॒त् । ए॒भ्यः॒ । नमः॑ । इत् । कृ॒णो॒मि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्रिपञ्चाशः क्रीळति व्रात एषां देव इव सविता सत्यधर्मा । उग्रस्य चिन्मन्यवे ना नमन्ते राजा चिदेभ्यो नम इत्कृणोति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्रिऽपञ्चाशः । क्रीळति । व्रातः । एषाम् । देवःऽइव । सविता । सत्यऽधर्मा । उग्रस्य । चित् । मन्यवे । न । नमन्ते । राजा । चित् । एभ्यः । नमः । इत् । कृणोमि ॥ १०.३४.८

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 34; मन्त्र » 8
    अष्टक » 7; अध्याय » 8; वर्ग » 4; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (एषां व्रातः) इन पाशों का समूह (सत्यधर्मा सविता देवः-इव) स्थिर नियमवाले सूर्यदेव के समान प्रभावकारी (त्रिपञ्चाशः क्रीडति) तीन और पाँच अर्थात् आठों दिशाओं में खेलता है-विहार करता है (उग्रस्य मन्यवे चित्-न नमन्ते) ये पाशे क्रूर के क्रोध के लिये-क्रोध के आगे नहीं झुकते हैं (राजा चित्-एभ्यः-नमः-इत् कृणोति) राजा भी इनके लिये नमस्कार करता है-इनके वश हो जाता है। ये ऐसे दुष्प्रभावकारी हैं, इनसे न खेलना चाहिए ॥८॥

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    विषय

    त्रेपन पासे

    पदार्थ

    [१] (एषाम्) = इन पासों का (त्रिपञ्चाश:) = त्रेपन [५३] संख्या से गणित (व्रातः) = समूह (क्रीडति) = द्यूत-फलक पर इस प्रकार खेलता है (इव) = जैसे कि (सत्यधर्मा) = सत्य का धारण करनेवाला (सविता) = सबका प्रेरक (देवः) = दिव्यगुणोंवाला महान् खिलाड़ी [दिव्-क्रीडा] वह प्रभु इस भुवन- फलक पर जीवरूपी पासों से खेलता है। वस्तुतः ये पासों का समूह भी कितने ही व्यक्तियों को अपना शिकार बनाता है । [२] ये पासे (उग्रस्य) = बड़े तीव्र स्वभाववाले अथवा बड़े भारी [ noble ] धनी पुरुष के (मन्यवे चित्) = क्रोध के लिये भी न नहीं आनमन्ते जरा भी झुकते । बड़े-से-बड़ा धन-सम्पन्न पुरुष भी अपने क्रोध से इन पासों को वशीभूत नहीं कर सकता। (राजा चित्) = स्वयं राजा भी (एभ्यः) = इनके लिये (नमः इत्) = नमस्कार को ही (कृणोति) = करता है । राजा भी इनकी प्रबलता को स्वीकार करता है । व्यसनाभिभूत पुरुष इन पासों को देव तुल्य प्रणाम करता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ-ये पासे कितने ही व्यक्तियों के जीवन के साथ खेल जाते हैं। इनकी प्रबलता उग्र से उग्र पुरुष व राजा भी स्वीकार करता है ।

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    विषय

    उनके कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    अध्यक्षों का पुनः वर्णन। (एषां) इनका (त्रि-पञ्चाशः व्रातः) ५३ का संघ (सत्य-धर्मा) सत्य धर्म का पालक (सविता) इनके प्रेरक नायक सूर्यवत् तेजस्वी (देवः) दाता स्वामी के समान (क्रीडति) खेलता है, विनोद से रण में जाता है। वह (उग्रस्य चित् मन्यवे) भयंकर से भयंकर के क्रोध के आगे (न नमन्ते) नहीं झुकते। (एभ्यः) इनके लिये (राजा चित् नमः इत् कृणोति) राजा भी नमस्कार, आदर ही करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कवष ऐलुषोऽक्षो वा मौजवान् ऋषिः। देवताः- १, ७, ९, १२, १३ अक्षकृषिप्रशंसा। २–६, ८, १०, ११, १४ अक्षकितवनिन्दा। छन्द:- १, २, ८, १२, १३ त्रिष्टुप्। ३, ६, ११, १४ निचृत् त्रिष्टुप्। ४, ५, ९, १० विराट् त्रिष्टुप्। ७ जगती॥ चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (एषां व्रातः) एतेषामक्षाणां समूहः (सत्यधर्मा सविता-देवः इव) स्थिरनियमवान् सूर्यो देव इव प्रभावकारी (त्रिपञ्चाशः क्रीडति) त्रयश्च पञ्च च त्रिपञ्च-अष्टसंख्याकदिशस्तासु दीर्घश्छन्दसि “अन्येषामपि दृश्यते” [अष्टा०६।३।१२५] विहरति, (उग्रस्य मन्यवे चित्-न नमन्ते) एतेऽक्षाः क्रूरस्य क्रोधाय तत्कोधाग्रे न नम्रीभवन्ति (राजा चित्-एभ्यः-नमः-इत् कृणोति) राजाऽपि खल्वेभ्योऽक्षेभ्यो नमस्कारं करोति-एषां वशीभवति तथाभूता दुष्प्रभावकारिण एते, न तैः सह क्रीडनीयं कदाचित् ॥८॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    The group of fifty-three of those dice is played strictly within unsparing mles of the game like the divine sun observing the laws of its motion. They do not bow even to the strongest of men, indeed the ruler bows and offers obeisance to the dice (if he too is addicted).

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे जुगाराचे फासे सूर्याप्रमाणे प्रभावकारी असून तीन, पाच, आठ दिशेमध्ये विहार करतात. हे फासे क्रोधासमोर झुकत नाहीत. राजाही त्यांच्या वशामध्ये राहतो. असे ते दुष्प्रभाव करणारे आहेत. कधीही खेळू नयेत. ॥८॥

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