ऋग्वेद मण्डल - 3 के सूक्त 17 के मन्त्र
1 2 3 4 5

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 17/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कतो वैश्वामित्रः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    हे मनुष्यो ! जो (समिध्यमानः) उत्तम प्रकार प्रकाशमान (विश्ववारः) सकल जन का प्रिय (शोचिष्केशः) तेजरूप केशवान् (घृतनिर्णिक्) तेजस्वी (पावकः) पवित्रकर्त्ता (सुयज्ञः) सुन्दर यज्ञ जिससे हों वह अग्नि (समक्तुभिः) उत्तम रात्रियों से (यजथाय) सङ्ग के लिये (प्रथमा) प्रसिद्ध (धर्म) धर्मों को (अज्यते) उत्तम प्रकार प्रसिद्ध करता तथा (देवान्) उत्तम गुणों का (अनु) प्रस्तार करता है, उसको अच्छे प्रकार प्रेरणा करो ॥१॥

    भावार्थ -

    जो अति गुणों से युक्त अग्नि आदि पदार्थ से कार्य्यों को सिद्ध करें, तो सम्पूर्ण कार्य्य मनुष्य सिद्ध कर सकते हैं ॥१॥

    अन्वय -

    हे मनुष्या यः समिध्यमानो विश्ववारः शोचिष्केशो घृतनिर्णिक् पावकः सुयज्ञोऽग्निः समक्तुभिर्यजथाय प्रथमा धर्माज्यते देवाननुगमयति तं संप्रयुङ्ग्ध्वम् ॥१॥

    पदार्थ -

    (समिध्यमानः) सम्यक् प्रदीप्यमानः (प्रथमा) प्रख्यातानि (अनु) (धर्म) धर्माणि। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (सम्, अक्तुभिः) सम्यक् रात्रिभिः (अज्यते) प्रक्षिप्यते (विश्ववारः) यो विश्वं वृणोति (शोचिष्केशः) शोचींषि तेजांसि इव केशा यस्य सः (घृतनिर्णिक्) यो घृतेन निर्णेक्ति सः (पावकः) पवित्रकर्त्ता (सुयज्ञः) शोभना यज्ञा यस्मात् सः (अग्निः) पावकः (यजथाय) सङ्गमनाय (देवान्) दिव्यान् गुणान् ॥१॥

    भावार्थ -

    यदि पुष्कलगुणयुक्तेनाऽग्न्यादिपदार्थेन कार्य्याणि साध्नुयुस्तर्हि किं कार्य्यमसिद्धं भवेत् ॥१॥

    Meanings -

    Agni, the holy fire that purifies and sanctifies, lighted and raised in accordance with ancient original Dharma, served in conjunction with morning and evening, becomes universally adorable. And radiant in flames in shining robes of ghrta-light, splendid metaphor of yajna, it rises as a clarion call to the divine bounties of Nature.

    भावार्थ -

    भावार्थ -जर अनंत गुणांनी युक्त अग्नी इत्यादी पदार्थाने कार्य सिद्ध होते, तर माणसे संपूर्ण कार्य का सिद्ध करू शकणार नाहीत? ॥ १ ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top