ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 30/ मन्त्र 15
ऋषिः - बभ्रु रात्रेयः
देवता - इन्द्र ऋणञ्चयश्च
छन्दः - पङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
चतुः॑सहस्रं॒ गव्य॑स्य प॒श्वः प्रत्य॑ग्रभीष्म रु॒शमे॑ष्वग्ने। घ॒र्मश्चि॑त्त॒प्तः प्र॒वृजे॒ य आसी॑दय॒स्मय॒स्तम्वादा॑म॒ विप्राः॑ ॥१५॥
स्वर सहित पद पाठचतुः॑ऽसहस्रम् । गव्य॑स्य । प॒श्वः । प्रति॑ । अ॒ग्र॒भी॒ष्म॒ । रु॒शमे॑षु । अ॒ग्ने॒ । घ॒र्मः । चि॒त् । त॒प्तः । प्र॒ऽवृजे॑ । यः । आसी॑त् । अ॒य॒स्मयः॑ । तम् । ऊँ॒ इति॑ । आदा॑म । विप्राः॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
चतुःसहस्रं गव्यस्य पश्वः प्रत्यग्रभीष्म रुशमेष्वग्ने। घर्मश्चित्तप्तः प्रवृजे य आसीदयस्मयस्तम्वादाम विप्राः ॥१५॥
स्वर रहित पद पाठचतुःऽसहस्रम्। गव्यस्य। पश्वः। प्रति। अग्रभीष्म। रुशमेषु। अग्ने। घर्मः। चित्। तप्तः। प्रऽवृजे। यः। आसीत्। अयस्मयः। तम्। ऊँ इति। आदाम। विप्राः ॥१५॥
ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 30; मन्त्र » 15
अष्टक » 4; अध्याय » 1; वर्ग » 28; मन्त्र » 5
Acknowledgment
अष्टक » 4; अध्याय » 1; वर्ग » 28; मन्त्र » 5
Acknowledgment
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे अग्ने ! योऽयस्मयस्तप्तो घर्मः प्रवृजे रुशमेष्वासीत्तं चतुःसहस्रं गव्यस्य पश्वो यथा वयं प्रत्यग्रभीष्म तथा त्वं गृहाण। हे विप्रा ! युष्मभ्यं तमु वयमादाम तमस्मभ्यं यूयं चिद् दत्त ॥१५॥
पदार्थः
(चतुःसहस्रम्) चत्वारि सहस्राणि सङ्ख्या यस्य तम् (गव्यस्य) गवां किरणानां विकारस्य (पश्वः) पशोः (प्रति) (अग्रभीष्म) प्रतिगृह्णीयाम (रुशमेषु) हिंसकमन्त्रिषु (अग्ने) अग्निरिव वर्त्तमान राजन् (घर्मः) प्रतापः (चित्) अपि (तप्तः) (प्रवृजे) प्रवृजते यस्मिँस्तस्मिन् (यः) (आसीत्) अस्ति (अयस्मयः) हिरण्यमिव तेजोमयः (तम्) (उ) (आदाम) समन्ताद् दद्याम (विप्राः) मेधाविनः ॥१५॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये मनुष्याः शीतोष्णसेवनं युक्त्या कर्त्तुं जानन्त्येतद्विद्यां परस्परं ददति ते सर्वदाऽरोगा भवन्तीति ॥ अत्रेन्द्रवीराग्निविद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति त्रिंशत्तमं सूक्तमष्टाविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
(अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान राजन् ! (यः) जो (अयस्मयः) सुवर्ण के सदृश तेजःस्वरूप (तप्तः) तापयुक्त (घर्मः) प्रताप (प्रवृजे) अच्छे प्रकार त्याग करते हैं जिसमें उसमें और (रुशमेषु) हिंसक मन्त्रियों में (आसीत्) वर्त्तमान है (तम्) उस (चतुःसहस्रम्) चार हजार संख्या युक्त को (गव्यस्य) किरणों के विकार और (पश्वः) पशु के सम्बन्ध में जैसे हम लोग (प्रति, अग्रभीष्म) ग्रहण करें, वैसे आप ग्रहण करो और हे (विप्राः) बुद्धिमान् जनो ! आप लोगों के लिये उस (उ) ही को हम लोग (आदाम) सब प्रकार से देवें, उसको हम लोगों के लिये आप लोग (चित्) भी दीजिये ॥१५॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो मनुष्य शीत और उष्ण का सेवन युक्ति से करने को जानते हैं और इसकी विद्या को परस्पर देते हैं, वे सर्वदा रोगरहित होते हैं ॥१५॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तीसवाँ सूक्त और अठ्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
विषय
missing
भावार्थ
भा०—हे (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्विन् ! हम प्रजाजन ( गव्यस्य अश्वः चतुः सहस्रं ) सबको दिखाने वाले प्रकाशक चार सहस्र किरणों को हम प्रत्यक्ष ग्रहण करते हैं उसी प्रकार प्रजाजन हे ( अग्ने ) तेजस्विन् नायक ! हे राजा ( गव्यस्य पश्वः चतुः सहस्रं ) चार हजार गवादिरूप पशु के तुल्य तेरे अधीन रहने वाले ( गव्यस्य पश्वः ) भूमि के हितकारी प्रजा के कार्यव्यवहारों को देखने वाले हैं हम उन से ( प्रति अग्रभीष्म ) प्रत्येक को स्वीकार करें । और ( यः ) जो ( अयस्मयः ) सुवर्णादि से सम्पन्न वा लोह के बने शस्त्रास्त्रों से सम्पन्न होकर ( धर्मः चित्) तेजस्वी सूर्य के समान ( तप्तः ) तप कर ( प्रवृजे ) शत्रु को दूर भगा देने में ( आसीत् ) समर्थ हो हे ( विप्राः ) विद्वान् बुद्धिमान् पुरुषो ! हम (तम् उ आदाम् ) उसको ही अपना नायक स्वीकार करें । इत्यष्टाविंशो वर्गः ॥
टिप्पणी
इस सूक्त में 'सहस्र' शब्द अनेक वाचक है । चारों दिशाओं की अपेक्षा वे चार सहस्र कह दिये हैं अर्थात् चारों दिशाओं में विस्तृत हज़ारों ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
बभ्रुरात्रेय ऋषिः ॥ इन्द्र ऋणञ्चयश्च देवता ॥ छन्दः–१,५, ८, ९ निचृत्त्रिटुप् । १० विराट् त्रिष्टुप् । ७, ११, १२ त्रिष्टुप् । ६, १३ पंक्तिः । १४ स्वराट् पंक्तिः । १५ भुरिक् पंक्तिः ॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम् ॥
विषय
अयस्मय [लोहा दृढ़ ] शरीर
पदार्थ
१. उस (पश्वः) = [ पश्यति] सर्वद्रष्टा प्रभु के (गव्यस्य) = इन ज्ञानदुग्धदात्री वेदधेनुओं के (चतुः सहस्त्रम्) = इन यजु साम रूप चार हजार मन्त्रों को हमने (रुशमेषु) = वासनाओं के संहारक उपाध्यायों के चरणों में बैठकर (प्रत्यग्रभीष्म) = ग्रहण किया है। २. हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (घर्मः) = यह शक्ति की उष्णतावाला शरीर (चित् तप्तः) = निश्चय से खूब ही तप वाला हुआ है, अर्थात् आचार्यकुल में मैंने तपस्यापूर्वक निवास किया है। अतएव (यः) = जो यह शरीर (प्रवृजे आसीत्) = सब रोगों व बुराइयों के छोड़नेवाला हुआ वह (अयस्मयः) = लोहे का बना हुआ - लोह दृढ़ बना है। हम (विप्राः) = ज्ञानी बनकर (तम् उ) = उस लोहों जैसे दृढ़ शरीर को ही (आदाय) = सदा ग्रहण करनेवाले हों ।
भावार्थ
भावार्थ- आचार्य कुल में विद्यार्थी ज्ञान को ग्रहण करे और शरीर के तप की अग्नि में तपा कर सब बुराइयों व रोगों से रहित करके अपने शरीर को अयोमय [लोह दृढ़] बनाए । इस प्रकार ज्ञान व तपस्या द्वारा अपने रक्षण की कामनावाला 'अवस्यु' आत्रेय बनाता है- सब त्रिविध कष्टों से दूर होता है। यह कहता है कि -
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जी माणसे शीत व उष्ण यांचे युक्तीने ग्रहण करतात व ती विद्या परस्परांना देतात ती सदैव रोगरहित होतात. ॥ १५ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Agni, O self-refulgent light of life, glorious ruler of the world, let us receive and share four thousand gifts of the wealth of light, energy and intelligence present in the lights of the dawn, and let us, O friends of knowledge, vibrant scholars, receive and share that golden wealth and heat of life which is tempered and refined in the pravargya yajna of self sacrifice and surrender.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The duties of a king are elaborated.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O king ! you are purifier and burning (sharp) like the fire. That fire or vigor is full of splendor like gold and is present in a person who gives up bad habits, and is the violent (strict discipline-enforcing) minister. As we accept that the four thousand rays of the sun and the cattle, so you should also do. O wisemen ! we give that to you, and you should give that to us in return.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
The persons who know how to take cold and hot thing methodically (in accordance with the different seasons and times) and give this knowledge to others, remain always free from sickness.
Foot Notes
(रुशमेषु) हिंसकमन्त्रिषु । रूश-हिंसायाम् | = In the ministers who are of violent (harsh or disciplinarian) nature. (धर्मः) प्रतापः । घु-क्षरणदीप्त्योः । अत्र दीप्त्यर्थः । दीप्तिरेवात्र प्रतापः । = Vigor, force.
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal