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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 30 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 30/ मन्त्र 4
    ऋषिः - बभ्रु रात्रेयः देवता - इन्द्र ऋणञ्चयश्च छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    स्थि॒रं मन॑श्चकृषे जा॒त इ॑न्द्र॒ वेषीदेको॑ यु॒धये॒ भूय॑सश्चित्। अश्मा॑नं चि॒च्छव॑सा दिद्युतो॒ वि वि॒दो गवा॑मू॒र्वमु॒स्रिया॑णाम् ॥४॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स्थि॒रम् । मनः॑ । च॒कृ॒षे॒ । जा॒तः । इ॒न्द्र॒ । वेषि॑ । इत् । एकः॑ । यु॒धये॑ । भूय॑सः । चित् । अश्मा॑नम् । चि॒त् । शव॑सा । दि॒द्यु॒तः॒ । वि । वि॒दः । गवा॑म् । ऊ॒र्वम् । उ॒स्रिया॑णाम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स्थिरं मनश्चकृषे जात इन्द्र वेषीदेको युधये भूयसश्चित्। अश्मानं चिच्छवसा दिद्युतो वि विदो गवामूर्वमुस्रियाणाम् ॥४॥

    स्वर रहित पद पाठ

    स्थिरम्। मनः। चकृषे। जातः। इन्द्रः। वेषि। इत्। एकः। युधये। भूयसः। चित्। अश्मानम्। चित्। शवसा। दिद्युतः। वि। विदः। गवाम्। ऊर्वम्। उस्रियाणाम् ॥४॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 30; मन्त्र » 4
    अष्टक » 4; अध्याय » 1; वर्ग » 26; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ वीरकर्म्माह ॥

    अन्वयः

    हे इन्द्र ! यथैकः सूर्य्यो युधये शवसाऽश्मानं भूयसश्चिद् घनाँश्च गवामुस्रियाणामूर्वं चकृषे द्वौ चिद्वि दिद्युतस्तथा त्वं विजयं विदः। एको जातस्त्वं यतो मनः स्थिरं चकृषे तस्मादिद् राज्यं वेषि ॥४॥

    पदार्थः

    (स्थिरम्) निश्चलम् (मनः) अन्तःकरणम् (चकृषे) करोति (जातः) प्रकटः सन् (इन्द्र) योगैश्वर्यमिच्छुक (वेषि) व्याप्नोषि (इत्) एव (एकः) (युधये) युद्धाय (भूयसः) बहून् (चित्) अपि (अश्मानम्) मेघम् (चित्) अपि (शवसा) बलेन (दिद्युतः) प्रकाशयतः (वि) (विदः) वेदय (गवाम्) गन्तॄणाम् (ऊर्वम्) हिंसकम् (उस्रियाणाम्) रश्मीनाम् ॥४॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । यथा सूर्य्यमेघौ युद्ध्येते तथा राजा शत्रुणा सह सङ्ग्रामं कुर्य्याद्यथा सूर्य्यः किरणैः सर्वं कार्यं साध्नोति तथा राजा सेनाऽमात्यैः सर्वं राजकृत्यं साधयेत् ॥४॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब वीरों के कर्म्म को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) योगजन्य ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाले जन ! जिस प्रकार (एकः) एक सूर्य्य (युधये) युद्ध के लिये (शवसा) बल से (अश्मानम्) मेघ को और (भूयसः) बहुत (चित्) भी मेघों को तथा (गवाम्) चलनेवाले (उस्रियाणाम्) किरणों के (ऊर्वम्) नाश करनेवालों को (चकृषे) करता और दोनों (चित्) निश्चित (वि, दिद्युतः) प्रकाश करते हैं, वैसे आप विजय को (विदः) जनाइये, एक (जातः) प्रकट हुए आप जिससे (मनः) अन्तःकरण को (स्थिरम्) निश्चल करते हो (इत्) इसी से राज्य को (वेषि) प्राप्त होते हो ॥४॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य और मेघ परस्पर युद्ध करते हैं, वैसे राजा शत्रु के साथ संग्राम करे और जैसे सूर्य्य किरणों से सब कार्य्य को सिद्ध करता है, वैसे राजा सेना और मन्त्रीजनों से सम्पूर्ण राजकृत्य सिद्ध करे ॥४॥

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    विषय

    बीज निधाता प्रभु और कोशसञ्चयी राजा का वर्णन । विद्यादाता गुरु का वर्णन ।

    भावार्थ

    भा०—हे ( इन्द्र ) विद्वन् ! हे शत्रुहन्तः ! ऐश्वर्यवन् ! राजन् ! तू ( जातः ) विद्यासम्पन्न और ऐश्वर्यसमृद्धि से प्रसिद्ध होकर भी अपने ( मनः ) मन और ज्ञान को ( स्थिरं चकृषे ) स्थिर, निश्चित कर । क्योंकि एकाग्र चित्त होकर मनुष्य ( एकः ) अकेला भी ( भूयसः चित् ) बहुत से लोगों के भी मुकाबले पर ( वेषीत् ) जाने में समर्थ होता है । जिस प्रकार सूर्य ( शवसा अश्मानं दिद्युतः ) अपने तेजो बल से मेघ को चमका देता है उसी प्रकार हे राजन् ! विद्वन् ! तू भी ( शवसा ) अपने बाहु बल वा सैन्यबल और ज्ञानबल से ( अश्मानं ) व्यापक सैन्य वा शस्त्र बल को (विद्युत) प्रकाशित और प्रकम्पित कर और ( उस्त्रियाणाम् गवाम् ) सूर्य जिस प्रकार ऊपर निकलने वाली किरणों को लाभ करता है उसी प्रकार तू भी उन्नति पथ पर जाने वाली ( गवाम् ) भूमियों और उन्नति की ओर ले जाने वाली वेदवाणियों का लाभ और ज्ञान कर उनको अपने वश कर । उनका अभ्यास कर । ( २ ) परमेश्वर पक्ष में–जिस समय हे प्रभु तुम प्रकट होते हो तो उपासक का मन स्थिर कर देते हो । वह अकेला तव बहुत से बाधक कारणों का मुकाबला कर लेता है, आत्मा को प्रकाशित कर लेता और ऊर्ध्वगामी किरणों वा उच्च वेदमय ज्ञान वाणियों को प्राप्त करता है ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    बभ्रुरात्रेय ऋषिः ॥ इन्द्र ऋणञ्चयश्च देवता ॥ छन्दः–१,५, ८, ९ निचृत्त्रिटुप् । १० विराट् त्रिष्टुप् । ७, ११, १२ त्रिष्टुप् । ६, १३ पंक्तिः । १४ स्वराट् पंक्तिः । १५ भुरिक् पंक्तिः ॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    एकाग्रता का लाभ

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष! तू (जातः) = गतमन्त्र के अनुसार प्रभु की उपासना से विकसित शक्तियोंवाला होकर (मनः) = अपने मन को (स्थिरम्) = स्थिर [Still] शान्त विषयों में न भटकने वाला (चकृषे) = करता है। मन को स्थिर करके तू (एकः इत्) = अकेला ही (भूयसः चित्) = संख्या में कितने ही अधिक हजारों शत्रुओं के साथ युधये युद्ध के लिए वेषीत् गतिवाला होता है - उनपर आक्रमण के लिए उनकी ओर जाता है । २. (अश्मानं चित्) = इस अविद्या पर्वत को भी (शवसा) = शक्ति के द्वारा (विदिद्युतः) = विच्छिन्न करता है। इस अविद्यापर्वत को विनष्ट करके (उस्त्रियाणाम्) = ज्ञानदुग्ध को देनेवाली (गवाम्) = इस वेदवाणी रूप गौवों के (ऊर्वम्) = समूह को (विदः) = प्राप्त करता है। मन के एकाग्र होने पर इन वेदवाणी रूप धेनुओं का ज्ञानदुग्ध प्राप्त होता ही है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- उपासना से मन एकाग्र होता है। एकाग्र मन वासनाओं को पराजित करता है। इस वृद्धि होती है । मन के द्वारा अविद्या का विनाश होकर खूब ज्ञान की -

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे सूर्य व मेघ परस्पर युद्ध करतात तसे राजाने शत्रूबरोबर युद्ध करावे व जसे सूर्य किरणांद्वारे सर्व कार्य पूर्ण करतो तसे राजाने मंत्र्यांकडून सर्व राज्याचे कार्य करवून घ्यावे. ॥ ४ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra, commander of light, knowledge and power, rising, you firm and resolve the mind to stability and constancy. In battle, you alone, by yourself, overcome many. You illuminate the cloud and the firmament and break the mountain with your power and force, and you recover and reveal the vastness of earth, the sun rays, the wisdom of knowledge and the ocean fire enshrined in words.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The duties of a hero are told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O man desirous of the wealth of Yoga ! the sun in order to fight with his strength slays big and small clouds with his band of active rays and both (the sun and his Same way you achieve victory over all rays) illuminate the world. the evils, because sometime even single-handed you make your mind steady. Therefore, you are fit to administer your state well.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    As the sun and the clouds fight, so a king should fight with his foes. As the sun accomplishes all works with his rays, so the king should accomplish all targets of the State with the help of his army and minister.

    Foot Notes

    (इन्द्र) योगेश्वर्यमिच्छक । इति परमेश्वर्ये अत्र योगरूपं परमैश्वर्यमभिप्रयते । = O desirous of the wealth of Yoga. (गवाम् ) गन्तृणास् । गच्छतीति गौ: अत्र गमनशीलाः किरणग्रहीताः । = Moving or active. (उस्रियाणाम्) रश्मीनाम् । उस्रा इति रश्मिनाम (NG 2, 11 ) तत्साम्यात् उस्त्रिया अपि रश्मेनो गृहीता यद्यपि (NG 2, 11 ) । = Of the rays. (ऊर्वम्) हिंसकम् । उर्वी हिमायाम् । = Destroyer. (विदयुतः) प्रकाशयतः । द्युत-तदीप्तौ। = Illuminate.

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