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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 57 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 57/ मन्त्र 2
    ऋषिः - श्यावाश्व आत्रेयः देवता - मरुतः छन्दः - बृहती स्वरः - मध्यमः

    वाशी॑मन्त ऋष्टि॒मन्तो॑ मनी॒षिणः॑ सु॒धन्वा॑न॒ इषु॑मन्तो निष॒ङ्गिणः॑। स्वश्वाः॑ स्थ सु॒रथाः॑ पृश्निमातरः स्वायु॒धा म॑रुतो याथना॒ शुभ॑म् ॥२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वाशी॑ऽमन्तः । ऋ॒ष्टि॒ऽमन्तः॑ । म॒नी॒षिणः॑ । सु॒ऽधन्वा॑नः । इषु॑ऽमन्तः । नि॒ष॒ङ्गिणः॑ । सु॒ऽअश्वाः॑ । स्थ॒ । सु॒ऽरथाः॑ । पृ॒श्नि॒ऽमा॒त॒रः॒ । सु॒ऽआ॒यु॒धाः । म॒रु॒तः॒ । या॒थ॒न॒ । शुभ॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वाशीमन्त ऋष्टिमन्तो मनीषिणः सुधन्वान इषुमन्तो निषङ्गिणः। स्वश्वाः स्थ सुरथाः पृश्निमातरः स्वायुधा मरुतो याथना शुभम् ॥२॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वाशीऽमन्तः। ऋष्टिऽमन्तः। मनीषिणः। सुऽधन्वानः। इषुऽमन्तः। निषङ्गिणः। सुऽअश्वाः। स्थ। सुऽरथाः। पृश्निऽमातरः। सुऽआयुधाः। मरुतः। याथन। शुभम् ॥२॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 57; मन्त्र » 2
    अष्टक » 4; अध्याय » 3; वर्ग » 21; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ मरुद्गुणानाह ॥

    अन्वयः

    हे पृश्निमातरो मरुतो ! यूयं वाशीमन्त ऋष्टिमन्तो मनीषिणस्सुधन्वान इषुमन्तो निषङ्गिणः स्वश्वाः स्वायुधाः सुरथाश्च स्थ शुभं याथना ॥२॥

    पदार्थः

    (वाशीमन्तः) प्रशस्ता वाग् विद्यते येषान्ते (ऋष्टिमन्तः) ज्ञानवन्तः (मनीषिणः) मनसा ईषिणः (सुधन्वानः) शोभनं धनुर्येषान्ते (इषुमन्तः) वाणवन्तः (निषङ्गिणः) निषङ्गाः प्रशस्ता अस्यादयो येषान्ते (स्वश्वाः) उत्तमाश्वाः (स्थ) भवथ (सुरथाः) शोभना रथा येषान्ते (पृश्निमातरः) पृश्निरन्तरिक्षं मातेव येषान्ते (स्वायुधाः) शोभनान्यायुधानि येषान्ते (मरुतः) सुशिक्षिता मानवाः (याथना) गच्छथ। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (शुभम्) कल्याणं सङ्ग्रामं वा ॥२॥

    भावार्थः

    मनुष्यैर्विद्यादिशुभान् गुणान् गृहीत्वा सदैव विजयेन युक्तैर्भवितव्यम् ॥२॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब पवनों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (पृश्निमातरः) अन्तरिक्ष माता के सदृश जिनका ऐसे (मरुतः) उत्तम प्रकार शिक्षित जनो ! आप लोग (वाशीमन्तः) उत्तम वाणी जिनकी वा जो (ऋष्टिमन्तः) ज्ञानवाले (मनीषिणः) वा मन की इच्छा करनेवाले (सुधन्वानः) सुन्दर धनुष जिनका (इषुमन्तः) वा वाणोंवाले और (निषङ्गिणः) अच्छे तरवार आदि पदार्थ जिनके वा जो (स्वश्वाः) उत्तम घोड़ों से युक्त (स्वायुधाः) सुन्दर आयुधोंवाले वा (सुरथाः) सुन्दर रथ जिनके ऐसे (स्थ) होओ और (शुभम्) कल्याणकारक व्यवहार वा संग्राम को (याथना) प्राप्त होओ ॥२॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिये कि विद्या आदि श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण करके सदा ही विजय से युक्त हों ॥२॥

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    भावार्थ

    भा०-हे ( मरुतः ) विद्वानो, शिल्पि जनो और वीर पुरुषो ! आप लोग ( वाशीमन्तः ) उत्तम वाणियों, शिल्प साधनों से युक्त, (ऋष्टिमन्तः ) ज्ञान और युद्धोपयोगी शक्तियों से युक्त, ( मनीषिणः ) मन को यथेष्ट विषय में प्रेरने वाले, जितेन्द्रिय, मनस्वी, ज्ञान के इच्छुक, (सु-धन्वानः) उत्तम धनुर्धर, ( इषु-मन्तः ) बाणों से सम्पन्न, ( नि-षङ्गिणः ) तर्कस और खाण्डे वाले, (सु अश्वाः) उत्तम अश्वारोही, ( सु-रथाः) उत्तम रथारोही, ( सु-आयुधाः ) उत्तम हथियारों से सजे, और ( पृश्नि-मातरः ) आदित्य के समान तेजस्वी वेद, गुरु वा राजा, अन्तरिक्ष के समान आश्रयदाता और भूमि के समान अन्नप्रद स्वामी को माता के समान मानने वाले होवो । आप लोग ( शुभं ) शुभ, शोभाजनक, उत्तम मार्ग को या युद्धकर्म को लक्ष्य करके ( याथन ) प्रयाण करो। पक्षान्तर में- वायुगण ( पृश्नि- मातरः ) सेचक मेघों के उत्पादक हैं। वे (शुभं याथन ) सर्वत्र जल प्राप्त करावें ।

    टिप्पणी

    उत्तम वीरों को उपदेश । 'पृश्नि मातरों' का रहस्य ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्यावाश्व आत्रेय ऋषिः ॥ मरुतो देवताः ॥ छन्द:- १, ४, ५ जगती । २, ६ विराड् जगती । ३ निचृज्जगती । ७ विराट् त्रिष्टुप् । ८ निचृत्-त्रिष्टुप ॥ अष्टर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    वीर योद्धा

    पदार्थ

    [१] आधिभौतिक जगत् में 'मरुत्' वीर योद्धा हैं। ये (वाशीमन्तः) = शत्रुओं के तक्षण के साधनभूत अस्त्रोंवाले हैं [ वाशी - axe, spear], कुल्हाड़े व भालेवाले हैं। (ऋष्टिमन्तः) = उत्तम तलवारवाले हैं। (मनीषिणः) = समझदार हो । (सुधन्वानः) = उत्तम धनुषवाले हैं। (इषुमन्तः) = प्रशस्त बाणोंवाले हो तथा (निषङ्गिणः) = तरकसवाले हैं। [२] (स्वश्वा:) = उत्तम अश्वोंवाले व (सुरथाः) = उत्तम रथवाले (स्थ) = हैं। (पृश्निमातरः) = ['इयं पृथिवी वै पृश्नि' तै० १।४।१।५] इस पृथिवी को माता के समान समझनेवाले हैं। (स्वायुधाः) = उत्तम आयुधोंवाले होते हुए (मरुतः) = हे वीर योद्धाओ ! तुम (शुभं याथना) = बड़ी शोभा के साथ संग्राम में गतिवाले होते हो ।

    भावार्थ

    भावार्थ- राष्ट्र के वीर सैनिक सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हुए हुए, पृथ्वी को माता समझनेवाले होकर उसकी रक्षा के लिये संग्राम में शुभ गतिवाले हों ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी विद्या इत्यादी श्रेष्ठ गुणांचा स्वीकार करून सदैव विजय मिळवावा. ॥ २ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O Maruts, tempestuous heroes of the world, children of the essence of nature in love with the earth, you are blest with the voice of thunder, light of knowledge, wisdom and understanding of the speed of mind, mighty bows, unfailing arrows and inexhaustible quivers, noble steeds and excellent chariots and the best arms and armaments. Go forward, noble heroes, and do good to all.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    Now the attributes of the Maruts. (heroes) are told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O you highly educated and wise men , sons of the firmament you are endowed with admirable speech and knowledge, armed with daggers! spears and swords, carrying good bows and arrows and are giver, you possess of good horses and chariots. With your wood weapons, O heroes! to do good deeds or to achieve victory in battles.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Men should cultivate knowledge and others good virtues and should ever achieve victory.

    Foot Notes

    (वाशीमन्तः ) प्रशस्ता वाक् विद्यते येषान्ते । वाशी इति वाङ्नाम (NG 1, 11 ) = Endowed with admirable speech. (ॠष्टिमन्त:) ज्ञानवन्तः । ऋषी-गतौ । गतेस्त्रिष्वर्थेष्वत्र ज्ञानार्थं ग्रहणम् । (पुश्निमातरः ) पुतिरन्तरिक्षं मातेव येषान्ते । प्रश्निरिति साधारण नाम (NG 1, 8) अन्तरिक्षाकाशसाधारणमित्यर्थः । पुश्नि : also means पृथिवी or earth इयं पृथिवी वे पृश्नि: Taittiraya 1, 4, 1, 5) पुश्न्या वै मरुतो जाता वाचो वा अस्या वा पृथिव्याः (काष्ठक संहिता ( 10, 111 ) So पृश्निमाता may also mean those who regard the earth as their mother, who are devoted to the service of the mother earth) = Those who regard the firmament as their mother. (निषङ्गण:) निषङ्गा प्रशस्ता अस्यादयो विद्यन्ते येषान्ते | = Possessed or good swords and quivers.

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