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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 57 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 57/ मन्त्र 8
    ऋषिः - श्यावाश्व आत्रेयः देवता - मरुतः छन्दः - विराड्जगती स्वरः - निषादः

    ह॒ये नरो॒ मरु॑तो मृ॒ळता॑ न॒स्तुवी॑मघासो॒ अमृ॑ता॒ ऋत॑ज्ञाः। सत्य॑श्रुतः॒ कव॑यो॒ युवा॑नो॒ बृह॑द्गिरयो बृ॒हदु॒क्षमा॑णाः ॥८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ह॒ये । नरः॑ । मरु॑तः । मृ॒ळत॑ । नः॒ । तुवि॑ऽमघासः । अमृ॑ताः । ऋत॑ऽज्ञाः । सत्य॑ऽश्रुतः । कव॑यः । युवा॑नः । बृह॑त्ऽगिरयः । बृ॒हत् । उ॒क्षमा॑णाः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    हये नरो मरुतो मृळता नस्तुवीमघासो अमृता ऋतज्ञाः। सत्यश्रुतः कवयो युवानो बृहद्गिरयो बृहदुक्षमाणाः ॥८॥

    स्वर रहित पद पाठ

    हये। नरः। मरुतः। मृळत। नः। तुविऽमघासः। अमृताः। ऋतऽज्ञाः। सत्यऽश्रुतः। कवयः। युवानः। बृहत्ऽगिरयः। बृहत्। उक्षमाणाः ॥८॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 57; मन्त्र » 8
    अष्टक » 4; अध्याय » 3; वर्ग » 22; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्मरुद्विषयकविद्वद्गुणानाह ॥

    अन्वयः

    हये नरो मरुतो ! तुवीमघासोऽमृता ऋतज्ञाः सत्यश्रुतो युवानो बृहद्गिरयो बृहदुक्षमाणाः कवयः सन्तो यूयं नो मृळता ॥८॥

    पदार्थः

    (हये) सम्बोधने (नरः) नायकाः (मरुतः) मरणशीलाः (मृळता) सुखयत। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (नः) अस्मान् (तुवीमघासः) बहुधनयुक्ताः (अमृताः) स्वस्वरूपेण मृत्युरहिताः (ऋतज्ञाः) ये ऋतं यथार्थं जानन्ति ते (सत्यश्रुतः) ये सत्यं श्रुतवन्तः शृण्वन्ति वा (कवयः) विद्वांसः (युवानः) प्राप्तयुवावस्थाः (बृहद्गिरयः) बहुप्रशंसाः (बृहत्) महत् (उक्षमाणाः) सेवमानाः ॥८॥

    भावार्थः

    ये मनुष्या आप्तान् विदुषः सेवन्ते ते सत्यां विद्यां प्राप्य सदैव मोदन्ते ॥८॥ अत्र रुद्रमरुद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति सप्तपञ्चाशत्तमं सूक्तं द्वाविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर मरुद्विषयक विद्वानों के गुणों को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    (हये) हे (नरः) नायक (मरुतः) मरणशील जनो ! (तुवीमघासः) बहुत धनों से युक्त (अमृताः) अपने स्वरूप से मृत्युरहित (ऋतज्ञाः) यथार्थ को जाननेवाले (सत्यश्रुतः) सत्य को सुने हुए वा सत्य को सुननेवाले (युवानः) युवावस्था को प्राप्त (बृहद्गिरयः) बहुत प्रशंसावाले (बृहत्) बहुत (उक्षमाणाः) सेवन किये और (कवयः) विद्वान् होते हुए आप लोग (नः) हम लोगों को (मृळता) सुखी करो ॥८॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य यथार्थवक्ता विद्वानों का सेवन करते हैं, वे सत्य विद्या को प्राप्त होकर सदा ही प्रसन्न होते हैं ॥८॥ इस सूक्त में रुद्र और वायु के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सत्तावनवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

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    विषय

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    भावार्थ

    भा०- (हये) हे ( नरः ) नायक, नेता पुरुषो ! हे ( मरुतः ) वायुवत् बलवान् शत्रुओं को मारने और शरीर से युद्धादि जीवन संकटों में स्वयं भी मरने वाले ! वीरो ! विद्वानो ! आप लोग ( तुवि-मघासः ) बहुत ऐश्वर्यों के स्वामी, (अमृताः ) दीर्घायु, (ऋतज्ञाः ) सत्य ज्ञान को जानने वाले, (सत्यश्रुतः ) सत्य ज्ञान को श्रवण करने वाले, (कवयः) दूरदर्शी, मेधावी, ( युवानः ) जवान, (बृहद्-गिरयः ) बड़े उपदेष्टा और (बृहत् ) बड़े भारी ज्ञान और ऐश्वर्य को ( उक्षमाणाः ) वहन करने वाले होकर (नः मृडत ) हमें सुखी बनाओ । इति द्वाविंशो वर्गः ॥

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्यावाश्व आत्रेय ऋषिः ॥ मरुतो देवताः ॥ छन्द:- १, ४, ५ जगती । २, ६ विराड् जगती । ३ निचृज्जगती । ७ विराट् त्रिष्टुप् । ८ निचृत्-त्रिष्टुप ॥ अष्टर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    राष्ट्र के प्रधान शासक लोग

    पदार्थ

    [१] (हये) = हे (नरः) = राष्ट्र को उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले (मरुतः) = [मितराविणः] कम बोलनेवाले शासक पुरुषो! (नः मृडता) = राष्ट्र के उत्तम शासन के द्वारा हमारे जीवनों को सुखी करिये। (तुवीमघासः) = आप महान् ऐश्वर्यवाले हो । (अमृताः) = रोगों से आक्रान्त न होनेवाले हो । (ऋतज्ञाः) = ऋत के ज्ञानवाले हो, ऋत के अनुसार ही राष्ट्र का शासन करते हो। [२] (सत्यश्रुतः) = आप सत्य ज्ञानवाले हो, (कवयः) = क्रान्तदर्शी हो, तत्त्वज्ञानवाले हो । (युवान:) = राष्ट्र से बुराइयों को दूर करनेवाले हो और अच्छाइयों को मिलानेवाले हो । (बृहद् गिरयः) = खूब ही प्रभु का स्तवन करनेवाले हो और (बृहद् उक्षमाणाः) = खूब ही राष्ट्र को सुखों से सिक्त करनेवाले हो ।

    भावार्थ

    भावार्थ- राष्ट्र को वे ही शासक सुखी कर सकते हैं, जो ऋत व सत्य को अपनानेवाले हैं, और जो खूब ज्ञान होते हुए प्रभु स्मरण से शक्ति का लाभ करनेवाले हैं। अगले सूक्त में भी मरुतों का ही उल्लेख है -

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जी माणसे आप्त विद्वानांचा स्वीकार करून सत्यविद्या प्राप्त करतात ती सदैव प्रसन्न होतात. ॥ ८ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O Maruts, leading lights of humanity and divinities of nature, commanders of unbounded wealth, honour and excellence, immortal souls, learned sages of the laws of nature and time, world renowned voices of truth, poetic visionaries young beyond aging and debility, diviners into the infinite Word and world languages, heroes of universal generosity and generative vitality, bless us with wealth of the world, peace of mind and everlasting grace.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The duties of the Maruts towards the enlightened persons are told further.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    Ó you heroes ! you are endowed with much wealth, immortal in the nature of the soul, knowers of truth, and always listening to truth or renowned for your truth. You are admired everywhere, while serving people abundantly and are greatly glorified among the young and wise poets. Be gracious to us and make us happy.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those persons who are absolutely truthful enlightened persons, acquire knowledge and always enjoy happiness.

    Foot Notes

    (नर:) नायकाः । (नरः) ग्नीण् प्रापणे (भ्वा० ) जननेतारः । = Leaders. ( तुवीमघासः) बहुधनयुक्ताः । सुवि इति बहुनाम (NG 3, 1 ) मधमिति धननाम (NG 2, 10 ) । = Opulent or endowed with much wealth. (बृहद् गिरयः ) बहुप्रशंसाः । गु-शब्दे ( चुरा० ) । = Admired much or greatly glorified. (उक्षमाणाः) सेवमानाः । उक्ष सेचने (वा० ) सुखसेचकाः सेवा दि- द्वारा । = Serving people.

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