ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 21/ मन्त्र 12
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - विराट्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
स नो॑ बोधि पुरए॒ता सु॒गेषू॒त दु॒र्गेषु॑ पथि॒कृद्विदा॑नः। ये अश्र॑मास उ॒रवो॒ वहि॑ष्ठा॒स्तेभि॑र्न इन्द्रा॒भि व॑क्षि॒ वाज॑म् ॥१२॥
स्वर सहित पद पाठसः । नः॒ । बो॒धि॒ । पु॒रः॒ऽए॒ता । सु॒ऽगेषु॑ । उ॒त । दुः॒ऽगेषु॑ । प॒थि॒ऽकृत् । विदा॑नः । ये । अश्र॑मासः । उ॒रवः॑ । वहि॑ष्ठाः । तेभिः॑ । नः॒ । इ॒न्द्र॑ । अ॒भि । व॒क्षि॒ । वाज॑म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
स नो बोधि पुरएता सुगेषूत दुर्गेषु पथिकृद्विदानः। ये अश्रमास उरवो वहिष्ठास्तेभिर्न इन्द्राभि वक्षि वाजम् ॥१२॥
स्वर रहित पद पाठसः। नः। बोधि। पुरःऽएता। सुऽगेषु। उत। दुःऽगेषु। पथिऽकृत्। विदानः। ये। अश्रमासः। उरवः। वहिष्ठाः। तेभिः। नः। इन्द्र। अभि। वक्षि। वाजम् ॥१२॥
ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 21; मन्त्र » 12
अष्टक » 4; अध्याय » 6; वर्ग » 12; मन्त्र » 7
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अष्टक » 4; अध्याय » 6; वर्ग » 12; मन्त्र » 7
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे इन्द्र ! स त्वं पुरएता सुगेषूत दुर्गेषु पथिकृद्विदानो नोऽस्मान् बोधि। य अश्रमास उरवो वहिष्ठाः सन्ति तेभिस्सह नो वाजमभि वक्षि ॥१२॥
पदार्थः
(सः) (नः) अस्मानस्माकं वा (बोधि) (पुरएता) यः पुर एति गच्छति सः (सुगेषु) सुगमेषु व्यवहारेषु (उत) अपि (दुर्गेषु) दुःखेन गन्तुं योग्येषु (पथिकृत्) यः पन्थानं करोति (विदानः) विजानन् (ये) (अश्रमासः) श्रमरहिताः (उरवः) बहवः (वहिष्ठाः) अतिशयेन वोढारः (तेभिः) तैः (नः) अस्मान् (इन्द्र) सुखैश्वर्यप्रापक (अभि) (वक्षि) प्रापय (वाजम्) विज्ञानम् ॥१२॥
भावार्थः
स एवास्ति विद्वान्त्सर्वेषां मङ्गलकारी यः स्वयं धर्ममार्गं गत्वाऽन्यान् धर्ममार्गगन्तॄन् कुर्यात् यः सदा सत्सङ्गं करोति स एव सर्वेभ्य उत्तमो भूत्वा विज्ञानं दातुमर्हतीति ॥१२॥ अत्रेन्द्रविद्वदीश्वरराजगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इत्येकविंशतितमं सूक्तं द्वादशो वर्गश्च समाप्तः ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (इन्द्र) सुख और ऐश्वर्य के प्राप्त करानेवाले (सः) वह आप (पुरएता) अग्रगामी (सुगेषु) सुगम व्यवहारों में (उन) और (दुर्गेषु) दुःख से प्राप्त होने योग्यों में (पथिकृत्) मार्ग के करनेवाले (विदानः) जानते हुए (नः) हम लोगों को (बोधि) जानें और (ये) जो (अश्रमासः) थकावट से रहित (उरवः) बहुत (वहिष्ठाः) अतिशय पहुँचानेवाले हैं (तेभिः) उनके साथ (नः) हम लोगों के वा हम लोगों के लिये (वाजम्) विज्ञान को (अभि, वक्षि) प्राप्त कराइये ॥१२॥
भावार्थ
वही विद्वान् है जो सबका मङ्गलकारी, स्वयं धर्ममार्ग को प्राप्त होकर औरों को धर्ममार्ग में चलनेवाले करे, जो सदा सत्संग करता है, वही सब से उत्तम होकर विज्ञान देने को योग्य होता है ॥१२॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, ईश्वर और राजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह इक्कीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
विषय
उसके प्रति प्रार्थना ।
भावार्थ
(सः) वह तू ( विदानः ) ज्ञानवान् (पथि-कृत् ) मार्ग बनाने हारा, ( सुगेषु ) सुगम और (दुः-गेषु) विषम स्थानों में (उत ) भी ( पुरः-एता ) आगे चलने वाला नायक होकर ( नः बोधि ) हमें उत्तम ज्ञान दे, सन्मार्ग का उपदेश दे । ( ये ) जो ( अश्रमासः ) कभी न थकने वाले, (उरवः) बड़े ( वहिष्ठा: ) उत्तम वहन करने वाले अश्व के समान सुदृढ़, धुरन्धर पुरुष हैं ( तेभिः ) उन द्वारा हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् ! तू ( नः ) हमें ( अभि-वाजम् ) ऐश्वर्य प्राप्ति और संग्राम आदि कार्यों की ओर ( वक्षि ) ले चल । इति द्वादशो वर्गः ॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः ।। इन्द्रो देवता ।। छन्दः – १, २, ९, १०, १२ विराट् त्रिष्टुप् । ४, ५, ६, ११ त्रिष्टुप् । ३, ७ निचृत्त्रिष्टुप् । ८ स्वराड्बृहती ।। द्वादशर्चं सूक्तम् ॥
विषय
'अश्रमासः उरवः वहिष्ठाः' इन्द्रियाश्व
पदार्थ
[१] हे (इन्द्र) = सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! (सः) = वे आप (नः) = हमारे लिए (पुरः एता) = आगे चलनेवाले, अर्थात् मार्गदर्शक (बोधि) = होइये [भव] । (सुगेषु) = सुगमता से जाने योग्य मार्गों में (उत) = और (दुर्गेषु) = दुःखेन गन्तव्य स्थानों में (पथिकृत्) = आप हमारे लिए मार्ग को करनेवाले हों। (विदान:) = आप ही सर्वज्ञ हैं। आप ही हमारे लिए ठीक मार्ग का ज्ञान देने में समर्थ हैं । [२] (ये) = जो आपके (अश्रमासः) = न जल्दी थक जानेवाले, (उरवः) = विशाल, (वहिष्ठा:) = सर्वोत्तम शरीररथ का वहन करनेवाले इन्द्रियाश्व हैं, (तेभिः) = उन इन्द्रियाश्वों के द्वारा (नः) = हमें (वाजं अभिवक्षि) = शक्ति की ओर ले चलिए ।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु [क] हमारे लिये मार्गदर्शन करें, [ख] उत्तम इन्द्रियाश्वों को प्राप्त कराएँ, [ग] शक्ति को दें। अग्ले सूक्त में भी 'भरद्वाज बार्हस्पत्य' इन्द्र का स्तवन करते हैं -
मराठी (1)
भावार्थ
जो सर्वांचे मंगल करणारा, स्वतः धर्मात चालणारा व इतरांनाही चालविणारा, असतो तोच विद्वान असतो. जो सदैव सत्संग करतो तोच सर्वात उत्तम होऊन विज्ञान देण्यायोग्य असतो. ॥ १२ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
May he, Indra, the lord all-knowing, know us and enlighten us, the leader who goes forward as pioneer over paths both easy and difficult, carving new channels of progress over annals of history, and may he bring us those modes of energy, power and transport which are wide and versatile beyond wear and tear, indefatigable, inexhaustible.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The same subject of man's duties are highlighted.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O Indra-conveyor of happiness and prosperity! be our leader in easy as well as in difficult dealings, as you are an enlightened path-maker (finder). Enlighten us, with those persons who are unwearied, who are many and bearers of great virtues and responsibilities, convey true knowledge to us.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
He alone is, truly an enlightened and auspicious person for all, who having trodden the path of Dharma (righteousness), makes others also tread the same path and who always associates himself with the righteous persons. It is he alone, who being the best of all can give true knowledge to all.
Foot Notes
(वहिष्ठा:) अतिशवेन बोढार: । वह झापतो (भ्वा०) । = Bearers of (holders of) good virtues or great responsibilities. (वाजम् ) विश्वानम् । वाजम is from वज-गतौ, गवेस्त्रयोsर्थाः ज्ञानं नममं प्राप्तिश्व (भ्वा०) अत्र ज्ञानार्थग्रहणम् । = True knowledge.
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