ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 22/ मन्त्र 9
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
भुवो॒ जन॑स्य दि॒व्यस्य॒ राजा॒ पार्थि॑वस्य॒ जग॑तस्त्वेषसंदृक्। धि॒ष्व वज्रं॒ दक्षि॑ण इन्द्र॒ हस्ते॒ विश्वा॑ अजुर्य दयसे॒ वि मा॒याः ॥९॥
स्वर सहित पद पाठभुवः॑ । जन॑स्य । दि॒व्यस्य॑ । राजा॑ । पार्थि॑वस्य । जग॑तः । त्वे॒ष॒ऽस॒न्दृ॒क् । धि॒ष्व । वज्र॑म् । दक्षि॑णे । इ॒न्द्र॒ । हस्ते॑ । विश्वा॑ । अ॒जु॒र्य॒ । द॒य॒से॒ । वि । मा॒याः ॥
स्वर रहित मन्त्र
भुवो जनस्य दिव्यस्य राजा पार्थिवस्य जगतस्त्वेषसंदृक्। धिष्व वज्रं दक्षिण इन्द्र हस्ते विश्वा अजुर्य दयसे वि मायाः ॥९॥
स्वर रहित पद पाठभुवः। जनस्य। दिव्यस्य। राजा। पार्थिवस्य। जगतः। त्वेषऽसन्दृक्। धिष्व। वज्रम्। दक्षिणे। इन्द्र। हस्ते। विश्वा। अजुर्य। दयसे। वि। मायाः ॥९॥
ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 22; मन्त्र » 9
अष्टक » 4; अध्याय » 6; वर्ग » 14; मन्त्र » 4
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अष्टक » 4; अध्याय » 6; वर्ग » 14; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः स राजा किं कुर्यादित्याह ॥
अन्वयः
हे अजुर्येन्द्र ! राजा त्वं भुवः पार्थिवस्य जगतो दिव्यस्य जनस्य त्वेषसन्दृक् सन् दक्षिणे हस्ते वज्रं धिष्व। विश्वा माया वि दयसे ॥९॥
पदार्थः
(भुवः) पृथिव्याः (जनस्य) मनुष्यस्य (दिव्यस्य) शुद्धस्य कमनीयस्य (राजा) (पार्थिवस्य) पृथिव्यां भवस्य (जगतः) संसारस्य (त्वेषसन्दृक्) यस्त्वेषं न्यायप्रकाशं सम्पश्यति दर्शयति वा (धिष्व) धर (वज्रम्) शस्त्रास्त्रम् (दक्षिणे) (इन्द्र) परमेश्वर्यप्रद (हस्ते) (विश्वाः) समग्राः (अजुर्य) अजीर्ण (दयसे) देहि (वि) (मायाः) प्रज्ञाः ॥९॥
भावार्थः
स एव राजोत्तमोऽस्ति यो न्यायशीलो धार्मिको जितेन्द्रियो भूत्वा सर्वं जगत् पितृवत्सम्पाल्य समग्रा विद्याः प्रददाति ॥९॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (अजुर्य) जीर्ण अवस्था से रहित (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले (राजा) प्रकाशमान आप (भुवः) पृथिवी और (पार्थिवस्य) पृथिवी में हुए (जगतः) संसार और (दिव्यस्य) शुद्ध कामना करने योग्य सुन्दर (जनस्य) मनुष्य के (त्वेषसन्दृक्) न्यायप्रकाश को देखनेवाले होते हुए (दक्षिणे) दाहिने (हस्ते) हाथ में (वज्रम्) शस्त्र और अस्त्र को (धिष्व) धारण करिये और (विश्वाः) सम्पूर्ण (मायाः) बुद्धियों को (वि, दयसे) विशेष करके दीजिये ॥९॥
भावार्थ
वही राजा उत्तम है जो न्यायशील, धार्मिक, जितेन्द्रिय होकर सम्पूर्ण जगत् का पिता के समान पालन करके सम्पूर्ण विद्याओं को अच्छे प्रकार देता है ॥९॥
विषय
पक्षान्तर में राजा के कर्तव्य।
भावार्थ
है ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! राजन् ! प्रभो ! तू ( त्वेषसन्दृक् ) कान्तियुक्त न्याय प्रकाश से सम्यक् दर्शन, यथार्थ विवेक करने वाला होकर ( दिव्यस्य पार्थिवस्य राजा भुवः ) दिव्य उत्तम पृथिवी के समस्त जनों और ऐश्वर्य का स्वामी हो । हे ( अजुर्य ) अविनाशिन् ! तू ( दक्षिणे हस्ते ) दायें हाथ में ( वज्रं धिष्व ) वज्र, बल या धैर्य को धारण कर । तू (विश्वाः) समस्त ( मायाः ) उत्तम विद्याओं बुद्धियों को (विदयसे) विविध प्रकार से दे और उनकी रक्षा कर । उसी प्रकार तू अपने शस्त्र बल से ( मायाः वि दयसे ) शत्रु की कपटयुक्त चालों को विविध प्रकार से नाश कर ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः ।। इन्द्रो देवता ॥ छन्दः - १, ७ भुरिक् पंक्ति: । ३ स्वराट् पंक्तिः । १० पंक्तिः । २, ४, ५ त्रिष्टुप् । ६, ८ विराट् त्रिष्टुप् । ९, ११ निचृत्त्रिष्टुप् ॥ एकादशर्चं सुक्तम् ।।
विषय
माया-विनाश
पदार्थ
[१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! आप (दिव्यस्य जनस्य) = दिव्य वृत्तिवाले लोगों के (राजा भुवः) = राजा होते हैं, इनके जीवनों को ज्ञानदीप्त व व्यवस्थित करते हैं। (त्वेषसंदृक्) = दीप्त ज्ञानवाले प्रभो ! (पार्थिवस्य जगतः) = इस पार्थिव जगत् के भी, अर्थात् सूर्य, चन्द्र, तारे आदि के भी (राजा) = शासक व नियामक हैं। आपके भय से ही ये सब अपनी-अपनी मर्यादा में घूम रहे हैं [२] (इन्द्र) = हे परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! आप (दक्षिणे हस्ते) = दाहिने हाथ में (वज्रं धिष्व) = वज्र को धारण कीजिए, और उससे हे (अजुर्य) = कभी जीर्ण न होनेवाले प्रभो ! आप (विश्वा: माया:) = सब असुर मायाओं को (विदयसे) = बाधित करते हैं। प्रभु कृपा से ही उपासक आसुरभावों पर विजय पा सकता है।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु ही दिव्य जनों के जीवन को दीप्त करते हैं । ही सूर्यादि को भी मर्यादाओं में चला रहे हैं। प्रभु ही अपने वज्र से सब आसुर मायाओं का विनाश करते हैं ।
मराठी (1)
भावार्थ
जो न्यायी, धार्मिक, जितेंद्रिय बनून संपूर्ण जगाचे पित्याप्रमाणे पालन करून संपूर्ण विद्या देतो तोच राजा उत्तम असतो. ॥ ९ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Indra, self-refulgent ruler of earth and the world of light, of humanity and the moving world, ageless lord of light and justice, take the thunderbolt of light and justice in the right hand, destroy the wiles of the wicked and give the light of knowledge to the seekers.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
What should a king do is further told.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O young and energetic king ! giver of great wealth, you being the seer and showerer of the light of justice on this earth (all objects on earth of the world) and of a pure and desirable person, uphold powerful arms and missiles in your right hand. Give good intellect or noble advice to all the people.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
He alone is the best king who being quite just, righteous and man of self-control cherishes the whole world like a father and gives knowledge to all.
Foot Notes
(दिव्यस्य) शुद्धस्य कमनीयस्य । दिवु धातोरने-कार्थेष्वत्र व्यवहार कात्यर्थग्रहणम् । कान्ति:-कायन्त दिव्यल्य शुवे व्यवहारयुक्तस्य |= of the pure and desirable person. (त्वेषसन्दक्) यस्त्षं न्यायप्रकाशं सम्पश्यति दर्शयति वा। = He who sees or shows to others the light of justice. (दयसे) देहि । दय-दान गति रक्षण हिंसाऽऽदानेषु (भ्वा०) अत्र दानार्थं ग्रहणम् । = Give. (माया:) प्रज्ञा: । मातेति प्रज्ञानाम (NG 3, 9 ) | = Intellect.
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