Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 100 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 100/ मन्त्र 3
    ऋषि: - वसिष्ठः देवता - विष्णुः छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    त्रिर्दे॒वः पृ॑थि॒वीमे॒ष ए॒तां वि च॑क्रमे श॒तर्च॑सं महि॒त्वा । प्र विष्णु॑रस्तु त॒वस॒स्तवी॑यान्त्वे॒षं ह्य॑स्य॒ स्थवि॑रस्य॒ नाम॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्रिः । दे॒वः । पृ॒थि॒वीम् । ए॒षः । ए॒ताम् । वि । च॒क्र॒मे॒ । श॒तऽअ॑र्चसम् । म॒हि॒ऽत्वा । प्र । विष्णुः॑ । अ॒स्तु॒ । त॒वसः॑ । तवी॑यान् । त्वे॒षम् । हि । अ॒स्य॒ । स्थवि॑रस्य । नाम॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्रिर्देवः पृथिवीमेष एतां वि चक्रमे शतर्चसं महित्वा । प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान्त्वेषं ह्यस्य स्थविरस्य नाम ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्रिः । देवः । पृथिवीम् । एषः । एताम् । वि । चक्रमे । शतऽअर्चसम् । महिऽत्वा । प्र । विष्णुः । अस्तु । तवसः । तवीयान् । त्वेषम् । हि । अस्य । स्थविरस्य । नाम ॥ ७.१००.३

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 100; मन्त्र » 3
    अष्टक » 5; अध्याय » 6; वर्ग » 25; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (देवः) दिव्यशक्तियुक्त उक्त परमात्मा (एतां) इस (पृथिवीं) पृथिवी को (त्रिः) तीन प्रकार से (विचक्रमे) रचता है, (शतर्चसं) जिस पृथिवी में सैकड़ों प्रकार की (अर्चिः) ज्वालायें हैं, (महित्वा) जिसका बहुत विस्तार है और इस (स्थविरस्य) प्राचीन पुरुष का नाम इसीलिये (विष्णुः) विष्णु है, क्योंकि (तवसः, तवीयान्) यह तेरा स्वामी है, इसलिये इसका नाम विष्णु है अथवा यह सर्वव्यापक होने से सर्वस्वामी है, इसलिये इसका नाम विष्णु है ॥३॥

    भावार्थ - तीन प्रकार से पृथिवी को रचने के अर्थ ये हैं कि प्रकृति के सत्त्वादि गुणोंवाले परमाणुओं को परमात्मा ने तीन प्रकार से रखा। तामस-भाववाले परमाणु, पृथिवी पाषाणादिरूप से, राजस नक्षत्रादिरूप से और दिव्य अर्थात् द्युलोकस्थ पदार्थों को सात्त्विक भाव से, ये तीन प्रकार की गतियें हैं, इसी का नाम ‘त्रेधा निधदे पदं’ है, इसी भाव को “इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निधदे पदम्” ॥ मं. १।२२।१७॥ में वर्णन किया है। जो कई एक लोग इसके अर्थ ये करते हैं कि विष्णु ने वामनावतार को धारण करके तीन पैर से पृथिवी को नापा, इसका उत्तर यह है कि इसी विष्णुसूक्त में “तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः” ॥ मं. १।२२।२०॥ में इस पद को चक्षु की निराकार ज्योति के समान निराकार माना है। अन्य युक्ति यह है कि विष्णु का स्वरूपपद निराकार होने से एक कथन किया है, तीन संख्या केवल प्रकृतिरूपी पद में मानी है, विष्णु के पद में नहीं, फिर निराकार विष्णु का देह धर कर साकार पद कैसे ? सबसे प्रबल प्रमाण इस विषय में यह है कि इसी प्रसङ्ग में सूक्त ९९वें के दूसरे मन्त्र में यह कथन किया है कि “न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप” हे देव ! तुम्हारी महिमा के अन्त को कोई नहीं पा सकता, क्योंकि तुमने ही लोक-लोकान्तरों को धारण किया हुआ है, तो फिर जब वह सर्वाधिष्ठान अर्थात् सब भुवनों का आश्रय है, तो उसके पैरों को अन्य वस्तुएँ कैसे आश्रय दे सकती हैं ॥३॥


    Bhashya Acknowledgment

    पदार्थः -
    (देवः) दिव्यशक्तिः परमात्मा (एताम्) इमां (पृथिवीम्) भुवं (त्रिः) त्रेधा (विचक्रमे) रचयामास (शतर्चसम्) यस्यां शतधा ज्वालाः (महित्वा) यातिविस्तृता (अस्य, स्थविरस्य, विष्णुः, नाम) अस्य प्राचो नाम विष्णुरिति यतः (तवसः, तवीयान्) अयं ते स्वामी यद्वा व्यापकः ॥३॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    This self-refulgent and self-potent generous lord Vishnu has made and set in motion the three dimensional world of matter, energy and mind by virtue of his own essential power and has vested it with the light of countless stars. Immanent in the world, mighty Vishnu manifests mightier and mightier. The very name of this lord beyond motion is ‘Lord of Light.’


    Bhashya Acknowledgment

    भावार्थ - तीन प्रकारे पृथ्वी उत्पन्न करण्याचा हा अर्थ आहे, की प्रकृतीच्या सत्त्व इत्यादी गुणांच्या परमाणूंना परमात्म्याचे तीन प्रकारे विभागून ठेवलेले आहे. तामस इत्यादी गुणांच्या परमाणूंना पृथ्वी पाषाण इत्यादी रूपाने राजस नक्षत्र इत्यादी रूपाने व दिव्य अर्थात द्युलोकस्थ पदार्थांना सात्त्विक भावाने, या तीन प्रकारच्या गती आहेत. याचेच नाव ‘त्रेधा निधदे पदम्’ आहे हाच भाव ‘इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्’ ॥ मं. १।२२।१७॥ मध्ये वर्णन केलेले आहे. कित्येक लोक याचा अर्थ असा लावतात विष्णूने वामनावतार धारण करून तीन पावलांनी पृथ्वी मोजली होती. याचे उत्तर असे की याच विष्णुसूक्तात ‘तद विष्णो परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरय:’ ॥ मं. १।२२।२० मध्ये या पदाला चक्षूच्या निराकार ज्योतीप्रमाणे निराकार मानलेले आहे. ॥३॥


    Bhashya Acknowledgment
    Top