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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 39 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 39/ मन्त्र 5
    ऋषिः - नाभाकः काण्वः देवता - अग्निः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    स चि॑केत॒ सही॑यसा॒ग्निश्चि॒त्रेण॒ कर्म॑णा । स होता॒ शश्व॑तीनां॒ दक्षि॑णाभिर॒भीवृ॑त इ॒नोति॑ च प्रती॒व्यं१॒॑ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सः । चि॒के॒त॒ । सही॑यसा । अ॒ग्निः । चि॒त्रेण॑ । कर्म॑णा । सः । होता॑ । शश्व॑तीनाम् । दक्षि॑णाभिः । अ॒भिऽवृ॑तः । इ॒नोति॑ । च॒ । प्र॒ती॒व्य॑म् । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स चिकेत सहीयसाग्निश्चित्रेण कर्मणा । स होता शश्वतीनां दक्षिणाभिरभीवृत इनोति च प्रतीव्यं१ नभन्तामन्यके समे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सः । चिकेत । सहीयसा । अग्निः । चित्रेण । कर्मणा । सः । होता । शश्वतीनाम् । दक्षिणाभिः । अभिऽवृतः । इनोति । च । प्रतीव्यम् । नभन्ताम् । अन्यके । समे ॥ ८.३९.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 39; मन्त्र » 5
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 22; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Agni is known by his powerful and marvellous actions. He is the initiator and original high-priest of the eternal yajnas of the cycles of creation. Self- provided, generosity incarnate, universally chosen and adored, he comes to bless whoever reposes faith in him with prayer. May all negativities and adversities vanish.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    सर्वत्र विद्यमान जगदीश केवळ सृष्टिरचनारूपानेच जाणता येतो. तोच सर्व पूज्य आहे. ॥५॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    स कथं विज्ञायत इति दर्शयति ।

    पदार्थः

    सोऽग्निः=स ईश्वरः । सहीयसा=सर्वाभिभाविना । चित्रेण=अद्भुतेन । कर्मणा । चिकेत=विज्ञायते । सः शश्वतीनाम्=जगतीनाम् । दक्षिणाभिः=प्रदानैः । होता । पुनः अभीवृतः=अभितो वर्तमानः सर्वस्वीकृतो वा । च=पुनः । प्रतीच्यम्=प्रतीतियुक्तं पुरुषम् । इनोति=प्राप्नोति च । शेषं पूर्ववत् ॥५ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    वह कैसे जानता है, यह इससे दिखलाते हैं ।

    पदार्थ

    (सः+अग्निः) वह सर्वाधार जगदीश (अहीयसा) सर्वाभिभावी=सबके ऊपर शासक (चित्रेण) अद्भुत (कर्मणा) कर्म के द्वारा (चिकेत) जाना जाता है (सः+शश्वतीनाम्+होता) सर्वदा चली आती हुई नित्य सृष्टियों का (दक्षिणाभिः) विविध दानों के कारण (होता) दाता अथवा अस्तित्व में लानेवाला है (अभीवृतः) सर्वतः वर्तमान अथवा सबसे स्वीकृत है और वह (प्रतीच्यम्+च+इनोति) विश्वासी के निकट पहुँचता भी है । शेष पूर्ववत् ॥५ ॥

    भावार्थ

    जो जगदीश केवल सृष्टिरचनारूप द्वारा ही जाना जाता है, जो सर्वत्र विद्यमान है, वही सर्वपूज्य है ॥५ ॥

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    विषय

    उसके ज्ञान प्रकाश द्वारा क्रम से विघ्नों और दुष्टों का नाश।

    भावार्थ

    ( सः ) वह ( अग्निः ) अग्नि के समान तेजस्वी विद्वान् (सहीयसा) अत्यधिक सहन करने और प्रतिपक्ष रूप बाधक विघ्न को पराजित करने वाले (चित्रेण कर्मणा) अद्भुत, ज्ञानप्रद कर्म से बलवान् होकर (चिकेत) ज्ञान प्राप्त करता वा जाना जाता है। (सः) वह (दक्षिणाभिः) दक्षिणाओं से यज्ञाग्नि के समान दान, भिक्षान्नों से ( अभि-वृतः ) पुष्ट होकर ( शश्वतीनां होता ) नित्य विद्याओं का ग्रहण करने वाला होकर ( प्रतीव्यम् इनोति च ) ज्ञेय तत्व को प्राप्त होता है। इसी प्रकार नायक भी ( सहीयसा ) शत्रुपराजयकारी ( चित्रेण कर्मणा ) अद्भुत कर्म से (चिकेत) प्रसिद्ध हो। वह (दक्षिणाभिः) अपनी बलवती शक्तियों, सेनाओं से ( अभि-वृतः ) घिरा हुआ ( शश्वतीनां होता ) बहुत सी मौल प्रजाओं और सेनाओं को स्वीकार करने और उनको वेतन भोजनादि देने वाला होकर (प्रतीव्यं इनोति) आक्रमण करने योग्य शत्रु तक पहुंचता है और इस प्रकार (समे अन्यके नभन्ताम् ) समस्त छोटे मोटे शत्रुगण नाश को प्राप्त होते हैं। इति द्वाविंशो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    नाभाकः काण्व ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ३, ५ भुरिक् त्रिष्टुप्॥ २ विराट् त्रिष्टुप्। ४, ६—८ स्वराट् त्रिष्टुप्। १० त्रिष्टुप्। ९ निचृज्जगती॥ दशर्चं सूक्तम्॥

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    विषय

    शत्रुविनाश व दिव्यगुण प्राप्ति

    पदार्थ

    [१] (स:) = वे (अग्निः) = प्रभु (सहीयसा) = शत्रुओं को अभिभूत करनेवाले (चित्रेण कर्मणा) = अद्भुत कर्म से (चिकेत) = जाने जाते हैं। प्रभु अपने उपासकों के शत्रुओं का विनाश करते हैं । (सः) = वे प्रभु (शश्वतीनां होता) = [नि०- ३.१ 'बहु' शश्वत्] बहुत दिव्यभावनाओं के होता - [आह्वाता] पुकारनेवाले हैं, अर्थात् प्रभु के अनुग्रह से स्तोता के जीवन में दिव्यभावनाओं का वर्धन होता है। [२] वे प्रभु (दक्षिणाभिः) = दक्षिणाओं से (अभीवृतः) = परिवृत हैं, अर्थात् सब देय पदार्थों को स्तोता को प्राप्त कराने के लिए उद्यत हैं, (च) = और (प्रतीव्यम्) = [प्रत्येतव्यम्] आक्रमण करने योग्य शत्रु को (इनोति) = आक्रान्त करते हैं- उस पर आक्रमण के लिए जाते हैं। प्रभु के अनुग्रह से (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु हमारे काम-क्रोध आदि शत्रुओं को नष्ट करके दिव्य भावों को प्राप्त कराते हैं। हमारे लिए सब आवश्यक पदार्थों को देते हैं और हमारे शत्रुओं को आक्रान्त करते हैं।

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