ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 77 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 77/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कुरुसुतिः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    हे इन्द्र ! इस जगत् को (ओजसा+सह) बल से (उत्तिष्ठन्) उठाता हुआ अर्थात् इसको बल से युक्त करता हुआ और (शिप्रे) हनुस्थानीय द्युलोक और पृथिवीलोक को (पीत्वी) उपद्रवों से बचाता हुआ तू दुष्टों को (अवेपयः) डरा। हे प्रभो ! (चमू) इन द्युलोक भूलोकों के मध्य (सुतम्) विराजित (सोमम्) सोम आदि सकल पदार्थों को कृपादृष्टि से देख ॥१०॥

    भावार्थ -

    वही प्रभु सबको बल और शक्ति देता और वही रक्षक है, अन्य नहीं ॥१०॥

    पदार्थ -

    हे इन्द्र ! इदं जगत्। ओजसा सह=बलेन सार्धम्। उत्तिष्ठन्=उत्थापयन्। शिप्रे=द्यावापृथिव्यौ। हनुस्थानीयौ। पीत्वी=पालयित्वा। दुष्टान्। अवेपयः=कम्पय। तथा। चमू=द्यावापृथिव्यौ। तयोर्मध्ये सुतं+सोमम्। रक्ष ॥१०॥

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