ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 84/ मन्त्र 4
कया॑ ते अग्ने अङ्गिर॒ ऊर्जो॑ नपा॒दुप॑स्तुतिम् । वरा॑य देव म॒न्यवे॑ ॥
स्वर सहित पद पाठकया॑ । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒ङ्गि॒रः॒ । ऊर्जः॑ । नपा॑त् । उप॑ऽस्तुतिम् । वरा॑य । दे॒व॒ । म॒न्यवे॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
कया ते अग्ने अङ्गिर ऊर्जो नपादुपस्तुतिम् । वराय देव मन्यवे ॥
स्वर रहित पद पाठकया । ते । अग्ने । अङ्गिरः । ऊर्जः । नपात् । उपऽस्तुतिम् । वराय । देव । मन्यवे ॥ ८.८४.४
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 84; मन्त्र » 4
अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 5; मन्त्र » 4
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अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 5; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
O creator, preserver and protector of energy, dear as breath of life and vitality of existence, with words of beauty and bliss, O light of the world, we offer our homage and adoration to you, lord refulgent and great.
मराठी (1)
भावार्थ
मानवाला सम्यक् जीवन निर्वाहासाठी तेजस्वितेची आवश्यकता असते. त्यासाठी अन्यत्रही ‘मन्युरसि मन्युं मे देहि’ मन्युची प्रार्थना आहे. ‘मन्यू’ चा अर्थ ‘तेजस्विता’ आहे. जी माणसाला पूर्ण थंड व निस्तेज बनवीत नाही. ‘अग्नी’ या शक्तीचा प्रतीक देव आहे. ॥४॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे (ऊर्जा न पात्) ओजस्विता कम न होने देने वाले! (अङ्गिरः) अङ्ग-अङ्ग में व्याप्त, अङ्गों के रस प्रदाता! (देव!) देव (कया) सुखमयी वाणी से (ते) तेरी (उपस्तुतिम्) समीप रहकर स्तुति को हम (वराय) श्रेष्ठ (मन्यवे) क्रोध या तेजस्विता के लिये करते हैं॥४॥
भावार्थ
व्यक्ति को सम्यक् जीवनिर्वाह हेतु तेजस्विता की भी आवश्यकता है। इसीलिये अन्यत्र भी मन्यु की प्रार्थना है। 'मन्यु' का अर्थ 'तेजस्विता' है, जो मानव को निस्तेज नहीं बनाती। 'अग्नि' इस शक्ति का भी प्रतीक है॥४॥
विषय
नायक की दीपक वा अग्निवत् दो प्रकार की स्थिति।
भावार्थ
हे ( अग्ने ) अग्रणी नायक ! अग्निवत् ज्ञानप्रकाशक ! तेजस्विन्! हे (अंगिरः) अंग अर्थात् देह में रसवत् बलशालिन् ! (ऊर्जः नपात्) वीर्य से उत्पन्न, पुत्रवत् बल से उत्पन्न वा बल वीर्य का पतन या नाश न होने देने वाले ! हम लोग ( वराय ) वरण करने योग्य ( मन्यवे ) तेजस्वी, मननशील ( ते ) तुझ पुरुष की ( उपस्तुतिम् ) उपस्तुति, गुणवर्णना ( कया ) भला किस प्रकार की जिह्वा या वाणी से करें। तू स्वयं इतने २ गुणसम्पन्न सर्वथा वरने योग्य है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
उशना काव्य ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१ पादनिचृद् गायत्री। २ विराड् गायत्री। ३,६ निचृद् गायत्री। ४, ५, ७—९ गायत्री॥ नवर्चं सूक्तम्॥
विषय
'अग्नि, अंगिराः, ऊर्जोनपात् व देव'
पदार्थ
[१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (अंगिरः) = अंग-प्रत्यंग में रस का सञ्चार करनेवाले प्रभो ! (ऊर्जो न पात्) = शक्ति को न नष्ट होने देनेवाले प्रभो ! हम (कया) = किस वाणी से (ते उपस्तुतिम्) = आपके स्तवन को करें? अर्थात् शब्दों से आपके स्तवन करने का सम्भव नहीं । आपकी महिमा शब्दातीत है । [२] हे (देव) = प्रकाशमय प्रभो! आप ही (वराय मन्यवे) = उत्कृष्ट ज्ञान के लिये होते हैं। आपकी उपासना से ही हमें ज्ञान प्राप्त होता है। आपकी उपासना ही हमें प्रगतिशील [अग्नि] रसमय अंगोंवाला [अंगिरः] व स्थिर बलवाला [ऊर्जोनपात्] बनाती है।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु की महिमा शब्दों से वर्णनीय नहीं । प्रभु का उपासन हमें प्रगतिशील, रसमय अंगोंवाला, स्थिरशक्ति व उत्कृष्ट ज्ञानवाला बनाता है।
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