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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 84 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 84/ मन्त्र 7
    ऋषिः - उशना काव्यः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    कस्य॑ नू॒नं परी॑णसो॒ धियो॑ जिन्वसि दम्पते । गोषा॑ता॒ यस्य॑ ते॒ गिर॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    कस्य॑ । नू॒नम् । परी॑णसः । धियः॑ । जि॒न्व॒सि॒ । द॒म्ऽप॒ते॒ । गोऽसा॑ता । यस्य॑ । ते॒ । गिरः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कस्य नूनं परीणसो धियो जिन्वसि दम्पते । गोषाता यस्य ते गिर: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कस्य । नूनम् । परीणसः । धियः । जिन्वसि । दम्ऽपते । गोऽसाता । यस्य । ते । गिरः ॥ ८.८४.७

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 84; मन्त्र » 7
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 6; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O lord protector of the world, as a happy home and shelter for the people, whose sincere and abundant prayers do you accept and fulfil? His whose prayers to you are enlightened and inspired by knowledge, wisdom and sincere awareness of divinity.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो उपासक अग्नी = परमेश्वर, विद्वान इत्यादींच्या गुणांना पूर्णपणे जाणून त्यांच्या ज्ञानाच्या पूर्ण प्रकाशात त्यांचे गुण-कीर्तन करतो. निश्चयपूर्वक त्याचे कर्म व त्याचे चिंतन दैवी ज्ञान कर्माच्या शक्तीने भरपूर असते. या मंत्रात ‘दम्पती’ पदाने हे दर्शविले आहे, की परमेश्वर विद्वान इत्यादी देव आपल्या विश्रामदायिनी स्थिती (दम) पासून कधी विस्थापित होत नाहीत. ॥७॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    हे (दम्पते) अपनी आश्रयभूत स्थिति बनाये रखने वाले ज्ञान व कर्मशक्ति के प्रतीक अग्निदेव! आप (नूनम्) निश्चय ही (कस्य) किस साधक की (परीणसः) बहुत से कर्मों व चिन्तन शक्तियों को (जिन्वसि) परिपूर्ण करते हैं? उत्तरः--(यस्य) जिस साधक की की हुईं (ते) आपकी (गिरः) स्तुतियाँ, गुणगान (गोषाताः) ज्ञान के प्रकाश से सेवित हों॥७॥

    भावार्थ

    जो उपासक अग्नि (परमेश्वर) विद्वान् आदि के गुणों को पूरी तरह जानता हुआ उनके ज्ञान के पूर्ण प्रकाश में उनका कीर्तन करता है, निश्चय ही उसके कर्म तथा उसके चिन्तन दैवी ज्ञान व कर्म की शक्तियों से पूर्ण होते हैं। इस मन्त्र में 'दम्पति' पद से यह भी दिखाया गया है कि परमेश्वर विद्वान् आदि देव अपनी विश्रामदायिनी स्थिति (दम्) से कभी नहीं हटते॥७॥

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    विषय

    नायक वा प्रभु के प्रति अधीनों के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    हे ( दम्पते ) गृहपते ! हे दमन, शासन, दण्ड व्यवस्थादि के पालक ! ( यस्य ते ) जिस तेरी ( गिरः ) वाणियां ( गो-साता ) हमें ज्ञान वाणियों और भूमियों के विभाग या प्रदान करने के लिये हैं वह तू ( कस्य परीणसः ) किस महान् पुरुष के निमित्त ( धियः जिन्वसि ) नाना कर्म करता है वा किस के प्रति बहुत सी स्तुतियों, बुद्धियों को प्रेरित करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    उशना काव्य ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१ पादनिचृद् गायत्री। २ विराड् गायत्री। ३,६ निचृद् गायत्री। ४, ५, ७—९ गायत्री॥ नवर्चं सूक्तम्॥

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    विषय

    गोमाता यस्म ते गिरः

    पदार्थ

    [१] हे (दम्पते) = गृहपते ! हम सबके गृहों के रक्षक प्रभो ! आप (नूनम्) = निश्चय से (कस्य) = आनन्द के - आनन्द को प्राप्त करानेवाले (परीणसः) = बहुत (धिया) = ज्ञानपूर्वक किये जानेवाले कर्मों को (जिन्वसि) = [प्रीणयसि] प्रीणित करते हैं-इन कर्मों को हमें प्राप्त कराते हैं। [२] (यस्य) = जिस (ते) = आपकी (गिरः) = स्तुतियाँ (गोषाता) = हमारे साथ ज्ञान का सम्भजन करनेवाली है। आप स्तोता के लिये ज्ञान को प्राप्त कराते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु उपासक को आनन्द को प्राप्त करानेवाले बुद्धिपूर्वक किये जानेवाले कर्मों में प्रेरित करते हैं और उसके ज्ञान को बढ़ाते हैं।

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