ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 11/ मन्त्र 6
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
नम॒सेदुप॑ सीदत द॒ध्नेद॒भि श्री॑णीतन । इन्दु॒मिन्द्रे॑ दधातन ॥
स्वर सहित पद पाठनम॑सा । इत् । उप॑ । सी॒द॒त॒ । द॒ध्ना । इत् । अ॒भि । श्री॒णी॒त॒न॒ । इन्दु॑म् । इन्द्रे॑ । द॒धा॒त॒न॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
नमसेदुप सीदत दध्नेदभि श्रीणीतन । इन्दुमिन्द्रे दधातन ॥
स्वर रहित पद पाठनमसा । इत् । उप । सीदत । दध्ना । इत् । अभि । श्रीणीतन । इन्दुम् । इन्द्रे । दधातन ॥ ९.११.६
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 11; मन्त्र » 6
अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 37; मन्त्र » 1
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अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 37; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
हे परमात्मन् ! भवान् (नमसा इत्) मदीयनम्रवाग्भिः (उपसीदत) हृदये निवसतु (दध्ना इत्) मदीयधारणया च (उपश्रीणीतन) ध्यानविषयो भवतु (इन्दुम् इन्द्रे) मदीयम्मनः स्वप्रकाशितस्वरूपे (दधातन) योजयतु ॥६॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे परमात्मन् ! आप (नमसा इत्) हमारी नम्र वाणियों से (उपसीदत) हमारे हृदय में निवास करो (दध्ना इत्) ‘धीयतेऽनेनेति दधि’ हमारी धारणा से (उपश्रीणीतन) हमारे ध्यान का विषय बनो (इन्दुम् इन्द्रे) हमारे मन को अपने प्रकाशित स्वरूप में (दधातन) लगाओ ॥६॥
भावार्थ
जो लोग प्रार्थना से अपने हृदय को नम्र बनाते हैं, उनका मन परमात्मा के स्वरूप में अवश्यमेव स्थिर होता है ॥६॥
विषय
'इन्दु' का इन्द्र में धारण
पदार्थ
[१] (नमसा) = नमन के द्वारा (इत्) = निश्चय से (उपसीदत) = प्रभु की उपासना करो। इस प्रभु की उपासना से ही (इन्दुम्) = सोम को (इन्द्रे) = परमैश्वर्यशाली प्रभु की प्राप्ति के निमित्त [जितेन्द्रिय पुरुष में] (दधातन) = धारण करो। उपासना के होने पर वासनाओं की प्रबलता नहीं होती । वासनाओं की प्रबलता के अभाव में सोम का रक्षण सुगम होता है, रक्षित सोम ज्ञानाग्नि को दीप्त करके प्रभु के प्रकाश का साधन बनता है। [२] (दध्ना) = 'इन्द्रियं वै दधि' [ तै० २।१।५।६ ] इन्द्रियों के हेतु से (इत्) = निश्चय से (अभि श्रीणीतन) = इस सोम का परिपाक करो। सोम को शरीर में ही सुरक्षित रखना इसलिए आवश्यक है कि इसी के द्वारा सब इन्द्रियों की शक्ति ठीक बनी रहती है ।
भावार्थ
भावार्थ- सोमरक्षण के लिये हम प्रभु का उपासन करें। रक्षित सोम हमारी इन्द्रियों की शक्ति के वर्धन का कारण बनता है और अन्ततः प्रभु के प्रकाश को प्राप्त कराता है ।
विषय
सोमाभिषव और सोम-सवन, तथा उत्तम अध्यक्ष का आश्रय ग्रहण।
भावार्थ
हे प्रजाजनो ! आप लोग (इन्दुम्) ऐश्वर्ययुक्त, स्नेहार्द्र, तेजस्वी पुरुष के प्रति (नमसा इत्) नमस्कार द्वारा (उप सीदत) उपासना करो। (दध्ना इत्) धारण सामर्थ्य से (अभि श्रीणीतन) उस का आश्रय लो, और (इन्द्रे) ऐश्वर्ययुक्त राष्ट्र के राज्यासन पर उसे (अभि दधातन) स्थापित करो। (२) ओषधि पक्ष में—सोम को अन्न, दहि आदि से मिलाओ (इन्द्रे) सूर्य के प्रकाश में रक्खो। और उस का सेवन करो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
असितः काश्यप। देवलो वा ऋषिः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्दः–१–४, ९ निचृद गायत्री। ५–८ गायत्री॥ नवर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
O Soma, eternal peace and joy, come, listen and abide by our homage at the closest, be one with our prayer and meditation, hold our mind and spirit in concentration within the ecstasy of your divine glory.
मराठी (1)
भावार्थ
जे लोक प्रार्थनेने आपल्या हृदयाला नम्र बनवितात त्यांचे मन परमात्म्याच्या स्वरूपात अवश्य स्थिर होते. ॥६॥
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