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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 11 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 11/ मन्त्र 8
    ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    इन्द्रा॑य सोम॒ पात॑वे॒ मदा॑य॒ परि॑ षिच्यसे । म॒न॒श्चिन्मन॑स॒स्पति॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इन्द्रा॑य । सो॒म॒ । पात॑वे । मदा॑य । परि॑ । सि॒च्य॒से॒ । म॒नः॒ऽचित् । मन॑सः । पतिः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्द्राय सोम पातवे मदाय परि षिच्यसे । मनश्चिन्मनसस्पति: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इन्द्राय । सोम । पातवे । मदाय । परि । सिच्यसे । मनःऽचित् । मनसः । पतिः ॥ ९.११.८

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 11; मन्त्र » 8
    अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 37; मन्त्र » 3
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (सोम) हे परमात्मन् ! (मनश्चित्) भवान् ज्ञानस्वरूपः (मनसस्पतिः) सर्वेषां मनसां प्रेरकश्चास्ति (इन्द्राय पातवे) जीवात्मनः तृप्तये (मदाय) आह्लादाय च (परिषिच्यते) उपास्यते ॥८॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (सोम) हे परमात्मन् ! (मनश्चित्) आप ज्ञानस्वरूप हैं ‘मनुत इति मनः’ और (मनसस्पतिः) सब के मनों के प्रेरक हैं (इन्द्राय) जीवात्मा की (पातवे) तृप्ति के लिये (मदाय) आह्लाद के लिये (परिषिच्यते) उपासना किये जाते हैं ॥८॥

    भावार्थ

    जो लोग उपासना द्वारा अपने हृदय में ईश्वर को विराजमान करते हैं, वे उसके मधुर आनन्द का पान करते हैं। तात्पर्य यह है कि यों तो परमात्मा सर्वव्यापक होने के कारण सब के हृदय में स्थिर है, पर जो लोग धारणा ध्यानादि साधनों से सम्पन्न होकर उस को अत्यन्त समीपी बनाते हैं, वे ही उसके मधुर आनन्द का पान कर सकते हैं, अन्य नहीं ॥८॥

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    विषय

    'मनसस्पति' सोम

    पदार्थ

    [१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! तू (इन्द्राय पातवे) = जितेन्द्रिय पुरुष के पान के लिये होती है। एक जितेन्द्रिय व्यक्ति ही तुझे अपने अन्दर व्याप्त कर सकता है। तू शरीर के अंग-प्रत्यंग में परिषिच्यसे चारों ओर सिक्त होती है। शरीर में सिक्त होकर तू (मदाय) = जीवन में उल्लास के लिये होती है । [२] हे सोम ! तू (मनः चित्) = निश्चय से ज्ञान है [ मनु अवबोधने]। सोम के रक्षण से ही ज्ञानाग्नि दीप्त होती है। (मनसः पतिः) = सोम ही मन का पति है। सुरक्षित सोम मन की उत्तम स्थिति का कारण बनता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- सोम के शरीर में व्याप्त होने पर जीवन 'उल्लासमय व ज्ञानमय' बनता है। इससे मन भी ठीक स्थिति में रहता है ।

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    विषय

    प्रजा पालनार्थ अध्यक्ष का स्थापन।

    भावार्थ

    हे (सोम) ऐश्वर्यवन्! ज्ञानवन् ! वीर्यवन् ! तेरा (इन्द्राय) ऐश्वर्य पद को प्राप्त करने और (पातवे) पालन करने के लिये, और (मदाय) सुख, आनन्द लाभ के लिये (परि सिच्यसे) अभिषिक्त किया जाय। तू (मनः चित्) सब के मनों को जानने वाला, और (मनसः पतिः) सब मनों का पालक स्वामी है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    असितः काश्यप। देवलो वा ऋषिः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्दः–१–४, ९ निचृद गायत्री। ५–८ गायत्री॥ नवर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Soma, shower of divine joy, you are the eternal mind, cosmic master, protector and inspirer of all human mind, and you vibrate and constantly flow for the joy and fulfilment of Indra, the soul in the state of spiritual excellence.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जे लोक उपासनेद्वारे आपल्या हृदयात ईश्वराला विराजमान करतात ते त्याच्या मधुर आनंदाचे पान करतात.

    टिप्पणी

    तात्पर्य हे की परमात्मा जरी सर्व व्यापक असला तरी सर्वांच्या हृदयात स्थिर आहे; पण जे लोक धारणा ध्यान इत्यादी साधनांनी संपन्न होऊन त्याच्या अत्यंत निकट असतात तेच त्याच्या मधुर आनंदाचे पान करू शकतात इतर नाही. ॥८॥

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