ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 92/ मन्त्र 6
परि॒ सद्मे॑व पशु॒मान्ति॒ होता॒ राजा॒ न स॒त्यः समि॑तीरिया॒नः । सोम॑: पुना॒नः क॒लशाँ॑ अयासी॒त्सीद॑न्मृ॒गो न म॑हि॒षो वने॑षु ॥
स्वर सहित पद पाठपर् । सद्म॑ऽइव । प॒शु॒ऽमन्ति॑ । होता॑ । राजा॑ । न । स॒त्यः । सम्ऽइ॑तीः । इ॒या॒नः । सोमः॑ । पु॒ना॒नः । क॒लशा॑न् । अ॒या॒सी॒त् । सीद॑न् । मृ॒गः । न । म॒हि॒षः । वने॑षु ॥
स्वर रहित मन्त्र
परि सद्मेव पशुमान्ति होता राजा न सत्यः समितीरियानः । सोम: पुनानः कलशाँ अयासीत्सीदन्मृगो न महिषो वनेषु ॥
स्वर रहित पद पाठपर् । सद्मऽइव । पशुऽमन्ति । होता । राजा । न । सत्यः । सम्ऽइतीः । इयानः । सोमः । पुनानः । कलशान् । अयासीत् । सीदन् । मृगः । न । महिषः । वनेषु ॥ ९.९२.६
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 92; मन्त्र » 6
अष्टक » 7; अध्याय » 4; वर्ग » 2; मन्त्र » 6
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अष्टक » 7; अध्याय » 4; वर्ग » 2; मन्त्र » 6
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(होता) उक्तपरमात्मोपासकः (पशुमन्ति, सद्मेव) ज्ञानागारमिव तं (परि, याति) प्राप्नोति (राजा, न) यथा राजा (सत्यः) सत्यानुयायी (समितीः) सभाः (इयानः) प्राप्नुवन् प्रसीदति, तथैव विद्वान् ज्ञानागारं प्राप्य प्रसीदति (सोमः) सर्वोत्पादकः परमात्मा (पुनानः) सर्वान् पावयन् (कलशान्) अन्तःकरणानि (अयासीत्) प्राप्नोति (न) यथा (महिषः, मृगः) महाबली (वनेषु) वनेषु प्राप्नोति ॥६॥ इति द्विनवतितमं सूक्तं द्वितीयो वर्गश्च समाप्तः ॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(होता) उक्त परमात्मा का उपासक (पशुमन्ति सद्मेव) ज्ञानागार के सागर (परियाति) उसको प्राप्त होता है। (राजा न) जैसे कि राजा (सत्यः) सत्य का अनुयायी (समितिः) सभा को (इयानः) प्राप्त होता हुआ प्रसन्न होता है, इसी प्रकार विद्वान् ज्ञानागार को प्राप्त होकर प्रसन्न होता है। (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (पुनानः) सबको पवित्र करता हुआ (कलशान्) अन्तःकरणों को (अयासीत्) प्राप्त होता है, (न) जैसे कि (महिषो मृगः) बलवाला (वनेषु) वनों में प्राप्त होता है ॥६॥
भावार्थ
इस मन्त्र में राजधर्म का वर्णन है कि जिस प्रकार राजा लोग सत्यासत्य की निर्णय करनेवाली सभा को प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार विद्वान् लोग भी न्याय के निर्णय करनेवाली सभाओं को प्राप्त होकर संसार का उद्धार करते हैं ॥ तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार राजा लोग अपने न्यायरूपी सत्य से संसार का उद्धार करते हैं, इसी प्रकार विद्वान् लोग अपने सदुपदेशों द्वारा संसार का उद्धार करते हैं ॥६॥ यह ९२ वाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥
विषय
सिंहवत् पराक्रमी शासक का अभिषेक।
भावार्थ
वह शासक, प्रभु, स्वामी (पशुमान्ति सद्म इव) पशु आदि से समृद्ध गृह के समान हो। वह (होता राजा न सत्यः) दाता राजा के तुल्यं सत्यवान्, (समितीः इयानः) संग्रामों और सभादि स्थानों को प्राप्त होता हुआ, (वनेषु) वनों में (महिषः मृगः न) बड़े भारी सामर्थ्यवान् सिंहके तुल्य पराक्रमी होकर (पुनानः) देशको निष्कण्टक करता हुआ (कलशान् अयासीत्) राष्ट्रों, देशों, लोकों वा अभिषेक योग्य जलघटों को प्राप्त करता है। इति द्वितीयो वर्गः॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कश्यप ऋषिः॥ पवमानः सोमो देवता ॥ छन्दः- १ भुरिक त्रिष्टुप्। २, ४, ५ निचृत्त्रिष्टुप्। ३ विराट् त्रिष्टुप्। ६ त्रिष्टुप्॥ षडृचं सूक्तम्॥
विषय
होता - राजा - मृग:- महिषः
पदार्थ
(इव) = जैसे (होता) = यज्ञशील पुरुष (पशुमान्ति) = गौ आदि पशुओंवाले (सत्यः) = गृह को (परि इयान:) = सर्वथा प्राप्त होता है। 'होता' अपने गृह में 'अग्निहोत्री' गौ को रखता ही है, इसी के गोघृत से वह यज्ञादि करता है । (न) = जैसे (सत्य:) = सज्जनों के रक्षण में कुशल राजा (समिती: इयान:) = संग्रामों में गतिवाला होता है। इसी प्रकार (सोमः) = सोम (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ (कलशान्) = इन सोलह कलाओं के आधारभूत शरीर को (अयासीत्) = प्राप्त होता है । यह (मृगः न) = [मृग अन्वेषणे] आत्मलोचन करनेवाले के समान (महिषः) = पूजा की वृत्तिवाला सोम (वनेषु) = उपासकों में (सीदन्) = स्थित होता है। यही वस्तुतः हमें उपासना की वृत्तिवाला बनाता है और आत्मान्वेषण की ओर झुकाववाला करता है ।
भावार्थ
भावार्थ- सोम हमें यज्ञशील, रोगादि से युद्ध करनेवाला, आत्मालोचन व पूजा की वृत्तिवाला बनाता है। यह व्यक्ति 'नोधा' होता है जो इन्द्रियों को [नव द्वार] वंशीभूत करनेवाला। उनका ठीक से धारण करनेवाला बनता है। यह कहता है-
इंग्लिश (1)
Meaning
Like a high priest going to a prosperous and enlightened hall of yajna, and like a real kingly ruler going to the assemblies of state, may Soma, pure and purifying, consecrate the heart and soul of a dedicated devotee and reign there as a mighty lion ruling majestically over the forests.
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात राजधर्माचे वर्णन आहे. ज्या प्रकारे राजाजवळ सत्यासत्याचा निर्णय करणारी सभा असते. त्याचप्रकारे विद्वान लोकही न्यायाचा निर्णय करणाऱ्या सभेद्वारे संसाराचा उद्धार करतात.
टिप्पणी
तात्पर्य हे की ज्या प्रकारे राजे लोक आपल्या न्यायरूपी सत्याने संसाराचा उद्धार करतात त्याच प्रकारे विद्वान लोक आपल्या सदुपदेशाने संसाराचा उद्धार करतात. ॥६॥
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