अथर्ववेद के काण्ड - 16 के सूक्त 1 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 16/ सूक्त 1/ मन्त्र 1
    ऋषि: - प्रजापति देवता - द्विपदा साम्नी बृहती छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - दुःख मोचन सूक्त

    अति॑सृष्टो अ॒पांवृ॑ष॒भोऽति॑सृष्टा अ॒ग्नयो॑ दि॒व्याः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अति॑ऽसृष्ट: । अ॒पाम् । वृ॒ष॒भ: । अति॑ऽसृष्ट: । अ॒ग्नय॑: । दि॒व्या: ॥१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अतिसृष्टो अपांवृषभोऽतिसृष्टा अग्नयो दिव्याः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अतिऽसृष्ट: । अपाम् । वृषभ: । अतिऽसृष्ट: । अग्नय: । दिव्या: ॥१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 16; सूक्त » 1; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (अपाम्) प्रजाओं का (वृषभः) बड़ा ईश्वर [परमात्मा] (अतिसृष्टः) विमुक्त [छूटा हुआ] है, [जैसे] (दिव्याः) व्यवहारों में वर्तमान (अग्नयः) अग्नियाँ [सूर्य, बिजुली और प्रसिद्धअग्नि] (अतिसृष्टाः) विमुक्त हैं ॥१॥

    भावार्थ -
    वह परमात्मा सब सृष्टिमें ऐसा स्वतन्त्र रम रहा है, जैसे सूर्य, बिजुली, अग्नि, वायु आदि संसार मेंनिरन्तर सर्वोपकारी हैं, सब मनुष्य उस जगदीश्वर की उपासना करें ॥१॥

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