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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 27 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 27/ मन्त्र 12
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - त्रिवृत् छन्दः - एकावसानार्च्युष्णिक् सूक्तम् - सुरक्षा सूक्त
    41

    ये दे॑वा अ॒न्तरि॑क्ष॒ एका॑दश॒ स्थ ते॑ देवासो ह॒विरि॒दं जु॑षध्वम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ये। दे॒वाः॒। अ॒न्तरि॑क्षे। एका॑दश। स्थ। ते। दे॒वा॒सः॒। ह॒विः। इ॒दम्। जु॒ष॒ध्व॒म् ॥२७.१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ये देवा अन्तरिक्ष एकादश स्थ ते देवासो हविरिदं जुषध्वम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ये। देवाः। अन्तरिक्षे। एकादश। स्थ। ते। देवासः। हविः। इदम्। जुषध्वम् ॥२७.१२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 27; मन्त्र » 12
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    विषय

    आशीर्वाद देने का उपदेश।

    पदार्थ

    (देवाः) हे विद्वानो ! (ये) जो तुम (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (एकादश) ग्यारह [श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, नासिका, वाणी, हाथ, पाँव, गुदा, लिङ्ग और मन−इन ग्यारह के समान] (स्थ) हो, (देवासः) हे विद्वानो ! (ते) वे तुम (इदम्) इस (हविः) ग्रहणयोग्य वस्तु [वचन] को (जुषध्वम्) सेवन करो ॥१२॥

    भावार्थ

    जैसे सूर्यादि लोकों में सब पदार्थ स्थित रहकर अपना-अपना कर्तव्य कर रहे हैं, वैसे ही मनुष्यों को ईश्वर और वेद में दृढ़ रहकर अपने कर्तव्य में परम निष्ठा रखनी चाहिये ॥११-१३॥

    टिप्पणी

    मन्त्र ११-१३ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं-१।१३९।-११ और यजुर्वेद ७।१९॥१२−(अन्तरिक्षे) मध्यलोके (एकादश) यजु०७।१९। श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनाघ्राणवाक्पाणिपादपायूपस्थमनांसि-इत्येभिः समानाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    [एकादश-एकादश-एकादश], यज्ञशेष का सेवन

    पदार्थ

    १. (ये) = जो (देवा:) = देव दिवि मस्तिष्करूप द्युलोक में (एकादश स्थ) = ग्यारह हो, (ते देवासः) = वे देव इस त्यागपूर्वक अदन को [हु दानादनयो:]-यज्ञशेष के सेवन को (जुषध्वम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करो। मेरे द्युलोकस्थ देव सदा यज्ञशेष का सेवन करें। यज्ञशेष का सेवन ही देवों के देवत्व को स्थिर रखता है। इसी से 'दशप्राण व जीवात्मा' ठीक बने रहेंगे। २. ये देवा:-जो देव अन्तरिक्षे-हृदयान्तरिक्ष में (एकादश स्थ) = ग्यारह है, (ते देवासः) = वे देव (इदं हविः जुषध्वम्) = इस यज्ञशेष का सेवन करनेवाले हों। अन्तरिक्षस्थ ग्यारह देव दश इन्द्रियाँ व मन' हैं, यज्ञशेष का सेवन इन्हें स्वस्थ रखता है। इससे इनका देवत्व बना रहता है। ३. (ये देवा:) = जो देव (पृथिव्याम्) = इस शरीररूप पृथिवी में (एकादश स्थ) = दश इन्द्रियगोलक और अन्नमयकोश हैं, (ते देवासः) = वे सब देव (इदं हविः) = इस हवि का (जुषध्वम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करें। यज्ञशेष के सेवन से ये सब ठीक बने रहते हैं।

    भावार्थ

    यज्ञशेष के सेवन से शरीरस्थ तेतीस देव ठीक बने रहें। इनका देवत्व नष्ट न हो, यही पूर्ण स्वास्थ्य है।

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    भाषार्थ

    (देवाः) हे विद्वानों! (ये) जो (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में निवास करनेहारे (एकादश) दशेन्द्रिय और एक मन (स्थ) हैं, (ते) वे जैसे हैं, वैसे उनको जानके (देवासः) हे विद्वानों! तुम (इदम्) इस (हविः) हवि का (जुषध्वम्) प्रीतिपूर्वक सेवन करो।

    टिप्पणी

    [ऋग्वेद मं० १, सू० १३९, मन्त्र ११ के महर्षि दयानन्द भाष्य के भावानुसार अर्थ दिया है। यजुर्वेद ७.१९, तथा ऋग्वेद १.१३९.११ में (अन्तरिक्षे) के स्थान में “अप्सु क्षितः” पाठ है। और इसका अर्थ किया है— “अन्तरिक्ष वा जलों में निवास करनेहारे, तथा प्राणों में ठहरनेवाले” (एकादश) ग्यारह श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, नासिका, वाणी, हाथ, पांव, गुदा, लिंग और मन (स्थ) हैं, (ते) वे जैसे अपने-अपने कामों में वर्तमान हैं, वैसे (देवासः) हे राजसभा के सभासदों! आप लोग यथायोग्य अपने-अपने कामों में वर्तमान होकर.........। सूचना—ऋग्वेद के मन्त्र में अन्तरिक्षे के स्थान में “अप्सु क्षितः” पाठ है। यजुर्वेद के मन्त्र में भी “अप्सु क्षितः” पाठ है। तो भी ऋग्वेद के मन्त्र में “अप्सु क्षितः” का “अन्तरिक्ष वा जलों में निवास करनेहारे” ऐसा अर्थ महर्षि ने किया है। इससे “अप्सु” का अर्थ अन्तरिक्ष भी महर्षि को अभिप्रेत है। परन्तु यजुर्वेद के मन्त्र में “अप्सु” का अर्थ महर्षि ने किया है—“प्राणों१ में ठहरनेवाले”। “अप्सु” में “आपः” पद है। निघण्टु १।३ के अनुसार आपः= अन्तरिक्ष नाम है। इस प्रकार ऋग्वेद और यजुर्वेद के उपर्युक्त मन्त्रों में “अप्सु” का अर्थ यदि “अन्तरिक्षे” किया जाय, तो ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद के मन्त्रों में समन्वय हो जाता है। इसी प्रकार ऋग्वेद और यजुर्वेद के मन्त्रों में “यज्ञम्” पाठ है। परन्तु अथर्ववेद में “यज्ञम्” के स्थान में “हविः” पाठ है। यज्ञ और हविः का परस्पर सम्बन्ध है।] [१. आपः=आपनानि, ईमान्येव षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तम्यात्मनि" (निरु० १२।४।३७)॥]

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    विषय

    व्याख्याः शृङ्गी मुनि कृष्ण दत्त जी महाराज

    व्याख्याः शृङ्गी ऋषि कृष्ण दत्त जी महाराज

    ग्यारह होताओं के द्वारा याग। इस प्रकार बेटा! देखो, ऋषि ने वर्णन किया, वर्णन करने के पश्चात उन्होंने पुनः यह प्रश्न किया यज्ञदत्त ने हे प्रभु! देखो, यज्ञमान की सन्तुष्टि नही हुई है। यज्ञमान याग करना चाहता तो कितने होताओं के द्वारा याग करें? उन्होंने कहा यज्ञं ब्रह्मा अव्रतम् देखो, ग्यारह होताओं के द्वारा याग करे। बेटा! ग्यारह होता कौन से होते हैं? मानो दस इन्द्रियां हैं और ग्यारहवां मन कहलाता हैं। इनके द्वारा जब याग किया जाता है, इनके विषयों का साकल्य बनाया जाता है इन्द्रियों के विषयों का जो साकल्य बनाया जाता है मेरे पुत्रों! देखो, वह मनस्तव को जानता है और मनस्तव को एकाग्र करने की उसमें देखो, युक्तियां विद्यमान होती हैं। तो वह मंगलं ब्रह्मा वर्णनं ब्रव्हे कृतं देवाः तो मुनिवरों! देखो, वह देवता बन जाता है। मुनिवरों! देखो, इन्द्रियों को एकाग्र करके मन देखो, जैसे एक रथ है और रथ में मुनिवरों! देखो, दस घोड़े विद्यमान है, दस अश्व हैं और मानो देखो, एक सारथी विद्यमान है और मुनिवरों! देखो, वह उसमें विद्यमान होने वाला कोई स्वामी है। इसी प्रकार देखो, आत्मा स्वामी है और मुनिवरों! देखो, ये दस इन्द्रियां उसके अश्व हैं और मुनिवरों! देखो, यह मन सारथी बनता है और गमन करता रहता है यदि मन में ज्ञान है आत्मा के प्रकाश में एकाग्र हो करके मानो गमन करता है इस रथ को तो बेटा! यह रथ मानो देखो, मोक्ष के मार्ग पर चला जाता है उसकी पगडण्डी को ग्रहण करने लगता है। लोक लोकान्तरों को अपने में धारण करता हुआ विज्ञान की प्रतिष्ठा में वह प्रतिष्ठित हो जाता है। जब बेटा! देखो, ऋषि ने इस प्रकार वर्णन किया, क्या देखो, ग्यारह होताओं के द्वारा याग करे, ग्यारहम् ब्रह्मा व्रतम् देखो, प्राणाय, अपानाय, व्यानाय, उदानाय, समानाय इस प्रकार देखो, हुत करने वाला बनेगा तो बेटा! वह इस लोक को विजय कर लेता है अपने मानवीयत्व को विजय कर लेता है।

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    विषय

    जीवन रक्षा।

    भावार्थ

    हे (देवाः) देवगण ! दिव्य पदार्थो ! आप (दिवि) द्यौलोक में, (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में और (पृथिव्याम्) पृथिवी में (ये) जो (एकादश ३) ग्यारह ग्यारह (स्थ) हों (ते) वे आप (देवासः) देव, दिव्य पदार्थ (इदं) इस (हविः) हवि—अन्न को (जुषध्वम् ३) सेवन करें। यजुर्वेद (७। १७) में महर्षि दयानन्द के लेखानुसार—द्यौ में ११ देव प्राण अपान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धंनजय और जीव। अप्सुक्षित एकादश देव—श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसन, घाण, वाक्, पाणि, पाद, यायु, उपस्थ और मन। भूमि पर एकादश देव—पृथिवी, अप्, तेज, वायु, आकाश, आदित्य, चन्द्र, नक्षत्र, अहंकार, महत्तत्व और प्रकृति। अथवा जैसे शरीर में दश प्राण, ११वां आत्मा, भौतिक में—पञ्च स्थूल भूत, ५ सूक्ष्मभूत और महत्तत्व हैं। और जिस प्रकार शरीर में दश इन्द्रिय और मन है उसी प्रकार समाज के उत्तम, मध्यम और निकृष्ट तीनों क्षेत्रों में विद्यमान ११, ११ देव, राजसभा के विद्वान् जन मेरे इस अन्न को स्वीकार करें।

    टिप्पणी

    ऋग्वेद परुच्छेप ऋषिः। विश्वेदेवाः देवताः॥ ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ। अप्सुक्षितो महिनैकादशास्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम्॥ इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वगिरा ऋषिः। त्रिवृद् उत चन्द्रमा देवता। ३, ९ त्रिष्टुभौ। १० जगती। ११ आर्ची उष्णिक्। १२ आर्च्यनुष्टुप्। १३ साम्नी त्रिष्टुप् (११-१३ एकावसानाः)। शेषाः अनुष्टुभः।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Protection

    Meaning

    Those eleven Divinities which abide in the middle region may accept and cherish this homage of havi.

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    Translation

    O you eleven bounties of Nature, that are in the midspace, (those bounties of Nature) enjoy this offering.

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    Translation

    Let those luminous and wondrous objects which are present in the firmament grass this ablator substance of Yajna.

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    Translation

    Let those eleven devas, which reside in the atmosphere,, partake of this oblation of mine.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    मन्त्र ११-१३ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं-१।१३९।-११ और यजुर्वेद ७।१९॥१२−(अन्तरिक्षे) मध्यलोके (एकादश) यजु०७।१९। श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनाघ्राणवाक्पाणिपादपायूपस्थमनांसि-इत्येभिः समानाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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