अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 27/ मन्त्र 5
ऋषिः - भृग्वङ्गिराः
देवता - त्रिवृत्
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सुरक्षा सूक्त
49
घृ॒तेन॑ त्वा॒ समु॑क्षा॒म्यग्न॒ आज्ये॑न व॒र्धय॑न्। अ॒ग्नेश्च॒न्द्रस्य॒ सूर्य॑स्य॒ मा प्रा॒णं मा॒यिनो॑ दभन् ॥
स्वर सहित पद पाठघृ॒तेन॑। त्वा॒। सम्। उ॒क्षा॒मि॒। अग्ने॑। आज्ये॑न। व॒र्धय॑न्। अ॒ग्नेः। च॒न्द्रस्य॑। सूर्य॑स्य। मा। प्रा॒णम्। मा॒यिनः॑। द॒भ॒न् ॥२७.५॥
स्वर रहित मन्त्र
घृतेन त्वा समुक्षाम्यग्न आज्येन वर्धयन्। अग्नेश्चन्द्रस्य सूर्यस्य मा प्राणं मायिनो दभन् ॥
स्वर रहित पद पाठघृतेन। त्वा। सम्। उक्षामि। अग्ने। आज्येन। वर्धयन्। अग्नेः। चन्द्रस्य। सूर्यस्य। मा। प्राणम्। मायिनः। दभन् ॥२७.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
आशीर्वाद देने का उपदेश।
भावार्थ
सब मनुष्य विद्या से पूर्ण होकर और अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य आदि की जीवनशक्तियों से यथावत् उपकार लेकर शत्रुओं को वश में करें ॥५॥
टिप्पणी
५−(घृतेन) ज्ञानप्रकाशेन (त्वा) त्वाम् (सम्) सम्यक् (उक्षामि) उक्षण उक्षतेर्वृद्धिकर्मणः-निरु०१२।९। वर्धयमामि (अग्ने) हे अग्निवत्तेजस्विन् विद्वन् (आज्येन) सर्पिषा। होमद्रव्येण (वर्धयन्) प्रवृद्धं कुर्वन्-अग्निं यथा (अग्नेः) पावकस्य (चन्द्रस्य) चन्द्रलोकस्य (सूर्यस्य) भास्करस्य (प्राणम्) जीवनसामर्थ्यम् (मायिनः) छलिनः (मा दभन्) दम्भु दम्भे-लुङ्। मा हिंसन्तु नाशयन्तु ॥
विषय
'अग्नि, चन्द्र, सूर्य'
पदार्थ
१. हे अग्ने अग्रणी प्रभो। आज्येन [अब्ज कान्ती] आपकी प्राप्ति की प्रबल कामना से आपको अपने हृदयदेश में (वर्धयन्) = बढ़ाता हुआ मैं (त्वा) = आपको (घृतेन) = मलों के क्षरण व ज्ञानदीप्ति से (समक्षामि) = अपने हृदय में सम्यक् सिक्त करता हूँ। मेरा हृदय आपकी भावना से ओतप्रोत हो जाता है। २. ऐसा होने पर मैं शरीर में शक्ति की अग्निवाला, मन में आहादवाला [चन्द्र] तथा मस्तिष्क में दीप्त ज्ञान के सूर्यवाला बनता हूँ। इस (अग्ने: चन्द्रस्य सूर्यस्य) = शरीर अग्नि, मन में चन्द्र तथा मस्तिष्क में सूर्य के (प्राणम्) = प्राण को (मायिन:) = मायाविनी वृत्तियाँ राक्षसीभाव (मा दभन्) = मत हिंसित करें। जब हम अग्नि, चन्द्र व सूर्य बनते हैं तब आसुरभावों से आक्रान्त नहीं होते।
भावार्थ
हम प्रभु-प्राति की प्रबल कामना, मल-क्षरण व ज्ञानदीप्ति से प्रभु को हृदयों में आसीन करें। तब हम शरीर में 'अग्नि', मन में 'चन्द्र' तथा मस्तिष्क में 'सूर्य' बनेंगे। ऐसा होने पर हम आसुरभावों से आक्रान्त नहीं होंगे।
भाषार्थ
(अग्ने) हे अग्नि के सदृश तेजस्वी पुरुष! यज्ञाग्नि को (आज्येन१)] घृत द्वारा (वर्धयन्) बढ़ाता हुआ मैं, (घृतेन) घृत द्वारा (त्वा) तुझे (समुक्षामि) सम्यक् प्रकार से सींचता हूं। ताकि (अग्नेः) यज्ञाग्नि सम्बन्धी (चन्द्रस्य) चान्द सम्बन्धी, (सूर्यस्य) और सूर्य सम्बन्धी (प्राणम्) प्राप्त प्राणशक्ति को, (मायिनः) छल-कपट से अर्थात् विना जाने शरीर में प्रविष्ट हो जाने वाले रोग कीटाणु (मा दभन्) दबा न दें।
टिप्पणी
[घृतेन=“आयुर्वै घृतम्”, अर्थात् घृत द्वारा आयु या प्राणशक्ति बढ़ती है। अतः शरीर को घृत द्वारा सिंचित करना चाहिये। यज्ञाग्नि में आज्याहुतियों द्वारा वायुशुद्धि, रोगनाश, तथा जल-ओषधियाँ प्राण सम्पन्न हो जाती हैं। चान्द भी ओषधियों में रस सेचन द्वारा प्राणप्रद है। सूर्य भी ताप, प्रकाश, तथा वर्षा द्वारा प्राण शक्ति प्रदान करता है। घृत, यज्ञाग्नि, चान्द और सूर्य द्वारा प्राण शक्ति ग्रहण करने से रोग कीटाणु, प्राप्त प्राण शक्ति को दबा नहीं सकते।] [१. सर्पिर्विलीनमाज्यं स्याद् घनीभूतं घृतं भवेत् (आप्टे) तथा घृतम्= Butter (आप्टे)।]
विषय
जीवन रक्षा।
भावार्थ
हे (अग्ने) अग्ने ! अग्रणी, राजन् ! जिस प्रकार अग्नि को विलीन घृत से बढ़ाया जाता है और उसकी आहुति दी जाती है उसी प्रकार (आज्येन) आाज्य, वीर्य या युद्धोपयोगी समस्त सामग्री और सेनाबल से तुझे (वर्धयन्) बढ़ाता हुआ (त्वा) तुझको (घृतेन) क्षरणशील वेगवान् अथवा तेजस्वी बल से (सम् उक्षामि) भली प्रकार अभिषेचित करता हूं। (अग्नेः) अग्नि के समान शत्रुतापक (चन्द्रस्य) चन्द्र के और (सूर्यस्य) सूर्य के समान मनोहर और तेजस्वी तुझ राजा के (प्राणम्) प्राण को (मायिनः) मायावी पुरुष अथवा बुद्धिमान् शिल्पी लोग (मा दभन्) विनाश न करें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृग्वगिरा ऋषिः। त्रिवृद् उत चन्द्रमा देवता। ३, ९ त्रिष्टुभौ। १० जगती। ११ आर्ची उष्णिक्। १२ आर्च्यनुष्टुप्। १३ साम्नी त्रिष्टुप् (११-१३ एकावसानाः)। शेषाः अनुष्टुभः।
इंग्लिश (4)
Subject
Protection
Meaning
O leading light, Agni, I sprinkle you with ghrta, thereby raising you with Ajya, special preparation of ghrta, further, so that no clever negative forces may suppress the pranic energies gifted by the sacred fire, sun and moon through yajna.
Translation
O fire divine, with clarified butter I sprinkle you, augmenting you with sacrificial butter. May not the wily ones suppress -the vital force of fire, of moon or of sun.
Translation
I, the performer of Yajna increasing this fire with praise sprinkle with molten butter. Let not Mayinah, the clouds over-power the vitality of fire, moon and the sun.
Translation
O king or leader, brilliant like fire, I (God) nurture you well with clarified butter, just as fire is increased by clarified butter. Let not the cheats destroy the life of the leader, who is charming and splendorous like the moon and the Sun.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(घृतेन) ज्ञानप्रकाशेन (त्वा) त्वाम् (सम्) सम्यक् (उक्षामि) उक्षण उक्षतेर्वृद्धिकर्मणः-निरु०१२।९। वर्धयमामि (अग्ने) हे अग्निवत्तेजस्विन् विद्वन् (आज्येन) सर्पिषा। होमद्रव्येण (वर्धयन्) प्रवृद्धं कुर्वन्-अग्निं यथा (अग्नेः) पावकस्य (चन्द्रस्य) चन्द्रलोकस्य (सूर्यस्य) भास्करस्य (प्राणम्) जीवनसामर्थ्यम् (मायिनः) छलिनः (मा दभन्) दम्भु दम्भे-लुङ्। मा हिंसन्तु नाशयन्तु ॥
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