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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 53 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 53/ मन्त्र 10
    ऋषिः - भृगुः देवता - कालः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - काल सूक्त
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    का॒लः प्र॒जा अ॑सृजत का॒लो अग्रे॑ प्र॒जाप॑तिम्। स्व॑यं॒भूः क॒श्यपः॑ का॒लात्तपः॑ का॒लाद॑जायत ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    का॒लः। प्र॒ऽजाः। अ॒सृ॒ज॒त॒। का॒लः। अग्रे॑। प्र॒जाऽप॑तिम्। स्व॒य॒म्ऽभूः। क॒श्यपः॑। का॒लात्। तपः॑। का॒लात्। अ॒जा॒य॒त॒ ॥५३.१०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम्। स्वयंभूः कश्यपः कालात्तपः कालादजायत ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कालः। प्रऽजाः। असृजत। कालः। अग्रे। प्रजाऽपतिम्। स्वयम्ऽभूः। कश्यपः। कालात्। तपः। कालात्। अजायत ॥५३.१०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 53; मन्त्र » 10
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    काल की महिमा का उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्रे) पहिले (कालः) काल ने (प्रजाः) प्रजाओं को, और (कालः) काल ने (प्रजापतिम्) प्रजापति [प्रजापालक मनुष्य] को (असृजत) उत्पन्न किया है। (कालात्) काल से (स्वयम्भूः) स्वयम्भू अपने आप उत्पन्न होनेवाला (कश्यपः) कश्यप [द्रष्टा परमेश्वर] और (कालात्) काल से (तपः) तप [ब्रह्मचर्य आदि नियम] (अजायत) प्रकट हुआ है ॥१०॥

    भावार्थ

    प्रलय के पीछे सृष्टि की आदि में काल के प्रभाव से सब प्रजाएँ और प्रजापालक राजा आदि उत्पन्न होते हैं, और तभी अजन्मा परमात्मा अपने गुणों और अद्भुत रचनाओं और नियमों के कारण प्रसिद्ध होता है ॥१०॥

    टिप्पणी

    १०−(कालः) (प्रजाः) जायमानान् जीवान् (असृजत) उदपादयत् (कालः) (अग्रे) सृष्ट्यादौ (प्रजापतिम्) प्रजापालकं मनुष्यम् (स्वयम्भूः) स्वयमुत्पन्नः परमेश्वरः (कश्यपः) पश्यकः। द्रष्टा (कालात्) (तपः) ब्रह्मचर्यादिव्रतम् (कालात्) (अजायत) प्रकटोऽभवत् ॥

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    भाषार्थ

    (कालः) काल ने (प्रजाः) प्रजाओं का (असृजत) सर्जन किया। (कालः) काल ने (अग्रे) आरम्भ में (प्रजापतिम्) परमेश्वर में प्रजापतिपन का सर्जन किया। (स्वयंभूः) स्वाश्रित-सत्ता वाला परमेश्वर (कालात्) काल से (कश्यपः) पश्यक अर्थात् ईक्षण करने वाला हुआ, तथा (कालात्) काल से ही (तपः) जगदुत्पादन का तप (अजायत) पैदा हुआ।

    टिप्पणी

    [कश्यपः= पश्यकः=पश्यः अर्थात् द्रष्टा। तपः=तप्त विराट्; वि+राजृ (दीप्तौ), चमकता हुआ अण्ड। यथा— “तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम्” (मनु०) इसे ही “विराडग्रे समभवत् विराजो अधिपूरुषः” (अथर्व० १९.६.९) द्वारा विराट् कहा है। वर्तमान वैज्ञानिक इसे Nebula कहते हैं, देखो (अथर्व० १९.६.९)। महर्षि दयानन्द के अनुसार परमेश्वर का निज नाम ओ३म् है। शेषनाम गुणकृत और कर्मकृत हैं। अतः गौणिक और कार्मिक नाम काल से सम्बद्ध हैं।]

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    विषय

    'प्रजा-प्रजापति-कश्यप व तप' का निर्माता प्रभु

    पदार्थ

    १. (काल:) = वह 'काल' प्रभु ही (प्रजा: असृजत) = सब प्रजाओं को उत्पन्न करता है। (काल:) = काल ही (अग्रे) = सृष्टि के आदि में (प्रजापतिम्) = ब्रह्मा को जन्म देता है। २. सात लोकों के सात सूर्य 'आरोगो, भ्राजः, पटर:, पतंगः, स्वर्णरो, ज्योतिषीमान्, विभास:'[तै० आ०१.७.१] हैं। अष्टम ये कश्यप है [कश्यपोऽष्टमो स महामेरुं न जहाते-तै० आ०१.७.१] यह [कश्यपः पश्यको भवति, यत् सर्व परिपश्यति इति सौम्यात्-तै आ० १.८.८] सारे ब्रह्माण्ड को प्रकाशमय करता है। यही स्वयंभूः स्वयं होनेवाला है। इस सूर्य को किसी अन्य सूर्य से दीप्ति नहीं प्राप्त होती, परन्तु यह (स्वयम्भूः कश्यपः) = स्वयं होनेवाला सर्वद्रष्टा सूर्य भी (कालात्) = उस काल नामक प्रभु से ही होता है। (तप:) = इस सूर्य का सन्तापक तेज भी (कालात् अजायत) = उस काल नामक प्रभु से ही हुआ है।

    भावार्थ

    प्रभु ही प्रजाओं को व प्रजापति को उत्पन्न करते हैं। प्रभु ने ही अष्टम सूर्य [कश्यप] को व उसके सन्तापक तेज को उत्पन्न किया है। इस कश्यप का तेज अन्य सातों सूर्यों को दीस करता है।

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    विषय

    ‘काल’ परमेश्वर।

    भावार्थ

    (कालः) कालरूप परमेश्वर ही (प्रजाः सृजत) समस्त प्रजाओं का सर्जन करता है। (कालः) वही काल परमेश्वर (प्रजापतिम्) प्रजा के पालक हिरण्यगर्भ को (असृजत्) उत्पन्न करता है (स्वयंभूः) स्वयं अपनी शक्ति से विद्यमान (कश्यपः) स्वयंप्रकाश, स्वयं सबका द्रष्टश सूर्य (कालात्) काल से उत्पन्न हुआ और (तपः) तप, तपनशक्ति भी (कालात् अजायत) काल से ही उत्पन्न होती है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृगुर्ऋषिः सर्वात्मकः कालो देवता। १-४ त्रिष्टुभः। ५ निचृतपुरस्ताद् बृहती। ६-१० अनुष्टुप्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Kala

    Meaning

    Kala created the living beings. Kala, is the Beginning, self-manifested, the creator and sustainer functionality of his transcendent Being as Prajapati. From Kala emerged Kashyapa, self-existing witness version of Divine Brahma, and from Kala arose Tapa, self-emergent creative thought and resolution of the Creator.

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    Translation

    Time has created the creatures in the beginning. Time created the Lord of creatures. The self existent seer (Kasyapa) is born from Time. from Time fervour is born.

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    Translation

    Kala created subjects of the world and Kala created in the beginning Prajapati, -the fire. Self-refulgent sun emerges from Kala and the heat proceeded from the Kala.

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    Translation

    The Kala created all the creatures. In the beginning, He created the Hiranyagarbha, the source of all-creation. The Self-existent, the Self-effulgent and the Heating-energy was simply His own-self, revealed to us.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १०−(कालः) (प्रजाः) जायमानान् जीवान् (असृजत) उदपादयत् (कालः) (अग्रे) सृष्ट्यादौ (प्रजापतिम्) प्रजापालकं मनुष्यम् (स्वयम्भूः) स्वयमुत्पन्नः परमेश्वरः (कश्यपः) पश्यकः। द्रष्टा (कालात्) (तपः) ब्रह्मचर्यादिव्रतम् (कालात्) (अजायत) प्रकटोऽभवत् ॥

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