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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 32/ मन्त्र 1
    ऋषिः - काण्वः देवता - आदित्यगणः छन्दः - त्रिपाद्भुरिग्गायत्री सूक्तम् - कृमिनाशक सूक्त
    127

    उ॒द्यन्ना॑दि॒त्यः क्रिमी॑न्हन्तु नि॒म्रोच॑न्हन्तु र॒श्मिभिः॑। ये अ॒न्तः क्रिम॑यो॒ गवि॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒त्ऽयन् । आ॒दि॒त्य: । क्रिमी॑न् । ह॒न्तु॒ । नि॒ऽम्रोच॑न् । ह॒न्तु॒ । र॒श्मिऽभि॑: । ये । अ॒न्त: । क्रिम॑य: । गवि॑ ॥३२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उद्यन्नादित्यः क्रिमीन्हन्तु निम्रोचन्हन्तु रश्मिभिः। ये अन्तः क्रिमयो गवि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत्ऽयन् । आदित्य: । क्रिमीन् । हन्तु । निऽम्रोचन् । हन्तु । रश्मिऽभि: । ये । अन्त: । क्रिमय: । गवि ॥३२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 32; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    कीड़ों के समान दोषों का नाश करे, इसका उपदेश।

    पदार्थ

    (उद्यन्) उदय होता हुआ (आदित्यः) प्रकाशमान सूर्य (क्रिमीन्) उन कीड़ों को (हन्तु) मारे और (निम्रोचन्) अस्त हुआ [भी सूर्य] (रश्मिभिः) अपनी किरणों से (हन्तु) मारे, (ये) जो (क्रिमयः) कीड़े (गवि) पृथिवी में (अन्तः) भीतर हैं ॥१॥

    भावार्थ

    १–प्रातःकाल और सायंकाल में सूर्य की कोमल किरणों और शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु के सेवन से शारीरिक रोग के कीड़ों का नाश होकर मन हृष्ट और शरीर पुष्ट होता है ॥१॥ २–उदय और अस्त होते हुए सूर्य के समान मनुष्य बालपन से बुढ़ापे तक अपने दोषों का नाश करके सदा प्रसन्न रहे ॥

    टिप्पणी

    टिप्पणी–इस सूक्त और ३३ वें सूक्त का मिलान अथर्ववेद का० ५ सू० २३। से करें ॥ १–उद्यन्। उत्+इण् गतौ–शतृ। उदयं प्राप्नुवन्। आदित्यः। अ० १।९।१। आङ्+दीपी दीप्तौ–यक् प्रत्ययान्तो निपातितः। आदीप्यमानः सूर्यः। क्रिमीन्। अ० २।३१।१। क्षद्रजन्तून्। हन्तु। नाशयतु। निम्रोचन्। नि+म्रुचु गतौ–शतृ। अस्तं गच्छन्। रश्मिभिः। अश्नोते रश च। उ० ४।४६। इति अशू व्याप्तौ–मि, धातो रशादेशश्च। किरणैः। अन्तः। मध्ये। क्रिमयः। क्रमणशीलाः क्षुद्रजन्तवः। गवि। गमेर्डोः। उ० २।६७। इति गम्लृ गतौ–डो। गौरिति पृथिव्या नामधेयं यद् दूरङ्गता भवति यच्चास्यां भूतानि गच्छन्ति गातेर्वौकारो नामकरणः–निरु० २।५। पृथिव्याम् इन्द्रिये वा ॥

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    विषय

    उदय व अस्त होता हुआ सूर्य

    पदार्थ

    १. (उद्यन्) = उदय होता हुआ (आदित्यः) = सूर्य (क्रिमीन् हन्तु) = रोगकृमियों को नष्ट करे। उदय होते हुए सूर्य की किरणों में इसप्रकार की शक्ति होती है कि हमारे शरीरों में स्थित रोगकृमि नष्ट हो जाते हैं। २. इसीप्रकार (निम्रोचन्) = अस्त होता हुआ सूर्य भी (रश्मिभिः) = अपनी किरणों से उन रोगकृमियों को (हन्तु) = नष्ट करे (ये) = जो (क्रिमय:) = कृमि (गवि अन्त:) = गौ के शरीर में स्थित हैं। सूर्य-किरणों में विचरण करनेवाली गौएँ निर्दोष दुग्धवाली होती हैं।

    भावार्थ

    उदय व अस्त होता हुआ सूर्य अपनी किरणों से रोगकृमियों को नष्ट करता है।

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    भाषार्थ

    (उद्यन् आदित्यः) उदित होता हुआ आदित्य (क्रिमीन् हन्तु) क्रिमियों का हनन करे, (निम्लोचन् हन्तु) ओर अस्त होता हुआ हनन करे (रश्मिभिः) रश्मियों द्वारा, (ये क्रिमयः) जो क्रिमि कि (गवि अन्तः) पृथिवी में हैं ।

    टिप्पणी

    [सूर्य उदित होता हुआ और अस्त होता हुआ लाल होता है। सूर्य की लालिमा क्रिमियों के हनन में विशेष उपयोगी है। ये क्रिमि रोगकीटाणु (germs) हैं; स्थूल क्रिमि नहीं। क्रिमि= कृञ् हिंसायाम् (क्र्यादिः), जोकि रोगोत्पादन द्वारा हिंसित करते हैं। गौः पृथिवीनाम (निघं० १।१) न कि चतुष्पाद् गौ।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Elimination of Insects

    Meaning

    Let the sun when it is rising and when it is setting kill with its rays the germs which are in the earth and in the cows.

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    Subject

    Adityah-the Sun _

    Translation

    May the Sun as He rises up, kill the worms with his rays and also while setting let him kill the worms, let these rays destroy the worms that live within the cow. .

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    Translation

    Let the Sun rising up and setting kill with its rays the germs which are in earth or in cow.

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    Translation

    Let the Sun at sunrise and sunset, destroy with his beams, the worms that live on the Earth.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    टिप्पणी–इस सूक्त और ३३ वें सूक्त का मिलान अथर्ववेद का० ५ सू० २३। से करें ॥ १–उद्यन्। उत्+इण् गतौ–शतृ। उदयं प्राप्नुवन्। आदित्यः। अ० १।९।१। आङ्+दीपी दीप्तौ–यक् प्रत्ययान्तो निपातितः। आदीप्यमानः सूर्यः। क्रिमीन्। अ० २।३१।१। क्षद्रजन्तून्। हन्तु। नाशयतु। निम्रोचन्। नि+म्रुचु गतौ–शतृ। अस्तं गच्छन्। रश्मिभिः। अश्नोते रश च। उ० ४।४६। इति अशू व्याप्तौ–मि, धातो रशादेशश्च। किरणैः। अन्तः। मध्ये। क्रिमयः। क्रमणशीलाः क्षुद्रजन्तवः। गवि। गमेर्डोः। उ० २।६७। इति गम्लृ गतौ–डो। गौरिति पृथिव्या नामधेयं यद् दूरङ्गता भवति यच्चास्यां भूतानि गच्छन्ति गातेर्वौकारो नामकरणः–निरु० २।५। पृथिव्याम् इन्द्रिये वा ॥

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