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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 12 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 12/ मन्त्र 1
    ऋषिः - वसिष्ठ देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-१२
    130

    उदु॒ ब्रह्मा॑ण्यैरत श्रव॒स्येन्द्रं॑ सम॒र्ये म॑हया वसिष्ठ। आ यो विश्वा॑नि॒ शव॑सा त॒तानो॑पश्रो॒ता म॒ ईव॑तो॒ वचां॑सि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उत् । ऊं॒ इति॑ ब्रह्मा॑णि । ऐ॒र॒त॒ । श्र॒व॒स्या । इन्द्र॑म् । स॒म॒र्ये । म॒ह॒य॒ । व॒सि॒ष्ठ॒ ॥ आ । य: । विश्वा॑नि । शव॑सा । त॒तान॑ । उ॒प॒ऽश्रो॒ता । मे॒ । ईव॑त: । वचां॑सि ॥१२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्येन्द्रं समर्ये महया वसिष्ठ। आ यो विश्वानि शवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचांसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत् । ऊं इति ब्रह्माणि । ऐरत । श्रवस्या । इन्द्रम् । समर्ये । महय । वसिष्ठ ॥ आ । य: । विश्वानि । शवसा । ततान । उपऽश्रोता । मे । ईवत: । वचांसि ॥१२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 12; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (श्रवस्या) यश के लिये हितकारी (ब्रह्माणि) वेदज्ञानों को (उ) ही (उत् ऐरत) उन [विद्वानों] ने उच्चारण किया है, (वसिष्ठ) हे अतिश्रेष्ठ ! (इन्द्रम्) इन्द्र [महाप्रतापी सेनापति] को (समर्ये) युद्ध में (महय) पूज। (यः) जिस (उपश्रोता) आदर से सुननेवाले [शूर] ने (ईवतः) उद्योगी (मे) मेरे (विश्वानि) सब (वचांसि) वचनों को (शवसा) बल के साथ (आ) अच्छे प्रकार (ततान) फैलाया है ॥१॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग उपदेश करें कि सब श्रेष्ठ पुरुष शूरवीर धर्मात्मा जन का सत्कार करें, जिससे वह उद्योगी पुरुषों की शिक्षा को संसार में फैलावे ॥१॥

    टिप्पणी

    मन्त्र १-६ ऋग्वेद में हैं-७।२३।१-६ ॥ १−(उत् ऐरत) ईर गतौ-लङ्। ते विद्वांस उदीरितवन्तः। उच्चारितवन्तः (उ) एव (ब्रह्माणि) वेदज्ञानानि (श्रवस्या) श्रवस्-यत्। श्रवो धनम्-निघ० २।१०। श्रवसे यशसे हितानि (इन्द्रम्) महाप्रतापिनं सेनापतिम् (समर्ये) मर्यो मनुष्यनाम-निघ० २।३। सह वर्तमाने युद्धे (महय) पूजय (वसिष्ठ) वसु-इष्ठन्। हे अतिशयेन वसो श्रेष्ठ (आ) समन्तात् (यः) इन्द्रः सेनापतिः (विश्वानि) सर्वाणि (शवसा) बलेन (ततान) विस्तारयामास (उपश्रोता) आदरेण श्रवणकर्ता (मे) मम (ईवतः) ईङ् गतौ-क्विप्, ईर्गतिः-मतुप्। गतियुक्तस्य उद्योगिनः पुरुषस्य (वचांसि) वचनानि ॥

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    विषय

    प्रभु-स्तवन व ज्ञान-वृद्धि

    पदार्थ

    १. हे उपासको! तुम (श्रवस्या) = ज्ञान-प्राप्ति की इच्छा से (ब्रह्माणि) = स्तुतिमन्त्रों का-स्तोत्रों का (उ) = निश्चय से (उत् ऐरत) = उच्चारण करो। हे (वसिष्ठ) = अपने जीवन को उत्तम बनानेवाले यजमान! तू (समर्ये) = [मर्या-मर्यादा]-मर्यादायुक्त यज्ञों में, सभाओं में [सह मर्या यत्र] (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को (महय) = पूज, समाजों में व्यक्तिपूजन न होकर केवल प्रभु पूजन होगा तो मनुष्यों का परस्पर विरोध न होकर प्रेम बढ़ेगा। व्यक्तिपूजा से भेदभाव बढ़ता है। २. (यः) = जो इन्द्र (शवसा) = बल के द्वारा विश्वानि सब भूतों को (आततान) = विस्तृत करते हैं, वह इन्द्र (ईवतः) = [गच्छतः] क्रियाशील-यज्ञ आदि उत्तम कर्मों में लगे हुए (मे) = मेरे (वचांसि) = स्तुतिरूप वाक्यों को (उपश्रोता) = समीपता से सुननेवाले होते हैं। प्रभु अकर्मण्य की बात को तो सुनते ही नहीं। 'पूर्ण पुरुषार्थ' के उपरान्त ही तो प्रार्थना ठीक है। ये स्तुतिवचन ही वस्तुतः मुझे पवित्र और ज्ञान-प्राप्ति के योग्य बनाते हैं।

    भावार्थ

    मैं प्रभु का स्तवन करूँ, जीवन-यज्ञ में प्रभु का पूजन करूँ। प्रभु मुझे बल देंगे और मेरे ज्ञान की वृद्धि करनेवाले होंगे।

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    भाषार्थ

    हे उपासको! तुम (श्रवस्या) श्रवण करने योग्य (ब्रह्माणि) ब्रह्म-प्रतिपादक वेदमन्त्रों का (उद् उ) उच्च स्वरों में (ऐरत) गान किया करो। (वसिष्ठ) तथा हे प्राणसंयमी श्रेष्ठ उपासक! तू (समर्ये) धन-स्वामियों तथा वैश्यों की सभाओं में (इन्द्रम्) परमेश्वर की (महय) महिमा गाया कर, परमेश्वर-सम्बन्धी उपदेश दिया कर। (यः) जिस परमेश्वर ने कि अपने (शवसा) महाबल द्वारा (विश्वानि) सब भुवनों को (आ ततान) सर्वत्र फैलाया है। वह (मे) मेरे (वंचासि) वचनों को (उप) समीप होने के कारण (श्रोता) सुनता है। मेरे हृदय में व्याप्त हुआ-हुआ सुनता है, (ईवतः) जो कि मैं उस परमेश्वर तक पहुँच चुका हूँ।

    टिप्पणी

    [वसिष्ठ=प्राण (छा০ उप০ ५.१.१३)। समर्ये=सम्+अर्य=स्वामी और वैश्य (अष्टा০ ३.१.१०३)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indr a Devata

    Meaning

    O brilliant sage of divine vision settled in peace, raise your voice and sing songs of celebration in honour of Indra, mighty ruler of the world. In the battle business of life, glorify him who pervades the wide worlds by his might, and as I approach him he listens close by so that my words of prayer reverberate across the spaces.

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    Translation

    O men of enlightement, you pronounce the vedic verses enriched with knowledge- O observer of high discipline and controller of organs, you in the assembly of the learned men gathered for performing Yajna pay homage to Almighty God. He is that Lord who with His might extends through all existences. He bears all the words which I as His faithful devotee utter.

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    Translation

    O men of enlightenment, you pronounce the vedic verses enriched with knowledge. O observer of high discipline and controller of organs, you in the assembly of the learned men gathered for performing Yajna pay homage to Almighty God. He is that Lord who with His might extends through all existences. He bears all the words which I as His faithful devotee utter.

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    Translation

    O learned people, chant aloud the Ved-mantras, full of true knowledge, revealed to the Rishis in the beginning of the universe. Well-disciplined scholar, sing, amongst the assembled people, the glory of the Almighty God, Who has spread all the worlds by His might and pervades them all and Who listens to. the prayers of; the worshipper like me.

    Footnote

    (1-6) cf. Rig, 7.23. (1-6), and (7) cf. Rig, 5.40.4

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    मन्त्र १-६ ऋग्वेद में हैं-७।२३।१-६ ॥ १−(उत् ऐरत) ईर गतौ-लङ्। ते विद्वांस उदीरितवन्तः। उच्चारितवन्तः (उ) एव (ब्रह्माणि) वेदज्ञानानि (श्रवस्या) श्रवस्-यत्। श्रवो धनम्-निघ० २।१०। श्रवसे यशसे हितानि (इन्द्रम्) महाप्रतापिनं सेनापतिम् (समर्ये) मर्यो मनुष्यनाम-निघ० २।३। सह वर्तमाने युद्धे (महय) पूजय (वसिष्ठ) वसु-इष्ठन्। हे अतिशयेन वसो श्रेष्ठ (आ) समन्तात् (यः) इन्द्रः सेनापतिः (विश्वानि) सर्वाणि (शवसा) बलेन (ततान) विस्तारयामास (उपश्रोता) आदरेण श्रवणकर्ता (मे) मम (ईवतः) ईङ् गतौ-क्विप्, ईर्गतिः-मतुप्। गतियुक्तस्य उद्योगिनः पुरुषस्य (वचांसि) वचनानि ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    সেনাপতিকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (শ্রবস্যা) যশের জন্য হিতকারী (ব্রহ্মাণি) বেদজ্ঞানকে (উ)(উৎ ঐরত) সেই [বিদ্বানগন] উচ্চারণ করেছে, (বসিষ্ঠ) হে অতিশ্রেষ্ঠ ! (ইন্দ্রম্) ইন্দ্রকে [মহাপ্রতাপী সেনাপতিকে] (সমর্যে) যুদ্ধে (মহয়) পূজা করো। (যঃ) যে (উপশ্রোতা) আদরপূর্বক শ্রবণকারী [বীর] (ঈবতঃ) উদ্যোগী (মে) আমার (বিশ্বানি) সকল (বচাংসি) বচন (শবসা) বলপূর্বক (আ) উত্তমরূপে (ততান) বিস্তার করেছে ॥১॥

    भावार्थ

    বিদ্বান ব্যক্তি উপদেশ করুক, সকল শ্রেষ্ঠ পুরুষ শূরবীর ধর্মাত্মা জনের সৎকার করবে, যা থেকে সেই উদ্যোগী পুরুষের শিক্ষাকে সংসারে বিস্তৃত করবে ॥১॥

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    भाषार्थ

    হে উপাসকগণ! তোমরা (শ্রবস্যা) শ্রবণ যোগ্য (ব্রহ্মাণি) ব্রহ্ম-প্রতিপাদক বেদমন্ত্রের(উদ্ উ) উচ্চ স্বরে (ঐরত) গান করো। (বসিষ্ঠ) তথা হে প্রাণসংযমী শ্রেষ্ঠ উপাসক! তুমি (সমর্যে) ধন-স্বামী তথা বৈশ্যদের সভায় (ইন্দ্রম্) পরমেশ্বরের (মহয়) মহিমা গান করো, পরমেশ্বর-সম্বন্ধী উপদেশ প্রদান করো। (যঃ) যে পরমেশ্বর নিজের (শবসা) মহাবল দ্বারা (বিশ্বানি) সব ভুবন-সমূহকে (আ ততান) সর্বত্র বিস্তারিত করেছেন। তিনি (মে) আমার (বঞ্চাসি) বচন-সমূহ (উপ) সমীপ হওয়ার কারণে (শ্রোতা) শ্রবণ করেন। আমার হৃদয়ে ব্যাপ্ত হয়ে শ্রবণ করেন, (ঈবতঃ) যে আমি সেই পরমেশ্বর পর্যন্ত পৌঁছে গিয়েছি ।

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