अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 132/ मन्त्र 6
ऋषिः -
देवता - प्रजापतिः
छन्दः - प्राजापत्या गायत्री
सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
59
उ॒ग्रं व॑नि॒षदा॑ततम् ॥
स्वर सहित पद पाठउ॒ग्रम् । व॑नि॒षत् । आ॑ततम् ॥१३२.६॥
स्वर रहित मन्त्र
उग्रं वनिषदाततम् ॥
स्वर रहित पद पाठउग्रम् । वनिषत् । आततम् ॥१३२.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(उग्रम्) दृढ़ और (आततम्) सब ओर फैला हुआ पदार्थ (वनिषत्) यह [मनुष्य] माँगे ॥६॥
भावार्थ
परमात्मा ने यह सब बड़े लोक बनाये हैं। मनुष्य अपने हृदय को सदा बढ़ाता जावे, कभी संकुचित न करे ॥-७॥
टिप्पणी
६−(उग्रम्) दृढम् (वनिषत्) वनु याचने लिङर्थे लुङ्। परस्मैपदं च। अवनिष्ट, याचतां मनुष्यः (आततम्) समन्ताद् विस्तृतं पदार्थम् ॥
विषय
'उदारता' व 'उत्तम घर का निर्माण'
पदार्थ
१. (कुलायम्) = घर को कृणवात् इति बनानेवाला हो। इस कारण से (उग्रम्) = अतिशयेन तेजस्वी (आततम्) = सर्वत्र फैले हुए सर्वव्यापक प्रभु की ही (वनिषद्) = याचना करे-प्रभु को ही पाने की प्रार्थना करे। तेजस्वी, व्यापक प्रभु का आराधन करनेवाला व्यक्ति घर को सदा उत्तम बनाता है। इस आराधक के घर में सबका जीवन उत्तम होता है। २. (अनाततम्) = जो व्यापक नहीं, उसकी पूजा न करे, अर्थात् व्यक्ति को गुरु धारण करके उसकी पूजा में ही न लग जाए। * पति घर में रोटी पकाये चूँकि पत्नी गुरुजी के दर्शन को गई हुई है' यह भी कोई घर है? और इन गुरुओं के कारण परस्पर फटाव व अकर्मण्यता उत्पन्न हो जाती है, चूंकि उनका विचार होता है कि गुरुजी का आशीर्वाद ही सब-कुछ कर देगा। अविस्तृत-संकुचित व अनुदार की (न वनिषत्) = याचना न करे। 'उदारं धर्ममित्याहुः'उदार ही धर्म है। संकुचित तो कभी धर्म होता ही नहीं। महत्ता ही उपादेय हो। यह महान् पुरुष ही उत्तम घर का निर्माण करनेवाला होता है।
भावार्थ
जो यह चाहता है कि वह उत्तम घर का निर्माण करे-उसे तेजस्वी, सर्वव्यापक प्रभु की ही याचना करनी चाहिए। यह कभी अनुदारता व अल्पता की ओर नहीं जाता।
भाषार्थ
(उग्रम्) कर्मव्यवस्था के नियन्त्रण में उग्ररूप, (आततम्) सर्वव्यापक ब्रह्म की (वनिषत्) सम्यक् भक्ति उपासक किया करे।
टिप्पणी
[वनिषत्=वन् संभक्तौ। सम्यक्-भक्ति=श्रद्धापूर्वक भक्ति।]
विषय
missing
भावार्थ
वह (उग्रम्) बड़े बलवान् भयंकर और (आततम्) अति विस्तृत सैन्य को (वनिषत्) प्राप्त करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
missing
इंग्लिश (4)
Subject
Prajapati
Meaning
Let man love and worship the awesome Brahma, omnipresent which comprehends both space and time.
Translation
This man should attain All-pervading and strong one.
Translation
This man should attain All-pervading and strong one.
Translation
He is not content with limited fortune.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६−(उग्रम्) दृढम् (वनिषत्) वनु याचने लिङर्थे लुङ्। परस्मैपदं च। अवनिष्ट, याचतां मनुष्यः (आततम्) समन्ताद् विस्तृतं पदार्थम् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
পরমাত্মগুণোপদেশঃ
भाषार्थ
(উগ্রম্) দৃঢ় এবং (আততম্) সবদিকে বিস্তৃত পদার্থ (বনিষৎ) এই [মনুষ্য] কামনা করে॥৬॥
भावार्थ
পরমাত্মাই এই সকল লোক-সমূহের নির্মাণ করেছেন। মনুষ্য নিজের হৃদয় সর্বদা প্রসারিত করুক, কখনো সঙ্কুচিত না করুক ॥৫-৭॥
भाषार्थ
(উগ্রম্) কর্মব্যবস্থার নিয়ন্ত্রণে উগ্ররূপ, (আততম্) সর্বব্যাপক ব্রহ্মের (বনিষৎ) সম্যক্ ভক্তি উপাসক করে/করুক।
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