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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 19 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 19/ मन्त्र 7
    ऋषिः - विश्वामित्रः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-१९
    78

    द्यु॒म्नेषु॑ पृत॒नाज्ये॑ पृत्सु॒तूर्षु॒ श्रवः॑सु च। इन्द्र॒ साक्ष्वा॒भिमा॑तिषु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    द्यु॒म्नेषु॑ । पृ॒त॒नाज्ये॑ । पृ॒त्सु॒तूर्षु॑ । अव॑:ऽसु । च॒ ॥ इन्द्र॑ । साक्ष्व॑ । अ॒भिऽमा॑तिषु ॥१९.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    द्युम्नेषु पृतनाज्ये पृत्सुतूर्षु श्रवःसु च। इन्द्र साक्ष्वाभिमातिषु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    द्युम्नेषु । पृतनाज्ये । पृत्सुतूर्षु । अव:ऽसु । च ॥ इन्द्र । साक्ष्व । अभिऽमातिषु ॥१९.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 19; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा और प्रजा के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (पृतनाज्ये) सेनाओं के चलने के स्थान रणक्षेत्र में (पृत्सुतूर्षु) सेनाओं में मारनेवाले शूरों के बीच, (द्युम्नेषु) चमकनेवाले धनों के बीच (च) और (श्रवःसु) कीर्तियों के बीच (अभिमातिषु) अभिमानी वैरियों पर (साक्ष्व) जय पा ॥७॥

    भावार्थ

    प्रतापी सेनापति सङ्ग्राम जीतकर शूर योधाओं समेत बहुत साधन और यश प्राप्त करके विजय की घोषणा करे ॥७॥

    टिप्पणी

    ७−(द्युम्नेषु) द्योतमानेषु धनेषु (पृतनाज्ये) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। पृतना+अज गतिक्षेपणयोः-यक्प्रत्ययः। पृतनानां सेनानाम्, अजन गमनं यत्र। रणक्षेत्रे (पृत्सुतूर्षु) तुर हिंसायाम्-क्विप्। मांसपृतनासानूनां मांस्पृत्स्नवो वाच्याः। वा० पा० ६।१।६३। इति पृतना शब्दस्य पृत्, अलुक् समासः। पृत्सु पृतनासु सेनासु तूर्षु हिंसकेषु शूरेषु (श्रवःसु) कीर्तिषु (च) (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (साक्ष्व) षह मर्षणे-लोट्, शपो लुक्, ढत्त्वकुत्वे, छान्दसो दीर्घः। सहस्व। अभिभव। विजय (अभिमातिषु) अभिमातिषु। शत्रुषु ॥

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    विषय

    अभिमातिषु साश्व

    पदार्थ

    १. (घुम्नेषु) = द्योतमान धनों की प्राप्ति के समय, (पृतनाग्ये) = [पृतनासु प्रजनं तर्तव्यासु च] सेनाओं की चहल-पहलवाले रणांगणों में, (पृत्सु तूर्षु) = [पृतनासु तर्तव्यासु च] सेनाओं के पराभव के समय (च) = और (श्रवःसु) = कीर्तियों की प्राप्ति के समय, हे (इन्द्र) = शत्रुविद्रावक प्रभो! साक्ष्व आप हमारे साथ होइए [षच समवाये]। आपने ही तो धन-विजय व कीर्ति को प्राप्त कराना है। २. (अभिमातिषु) = [पापेषु हन्तव्येषु] अभिमान आदि पापों के विनाश के समय आप (साक्ष्व) = हमारे साथ होइए-आपके द्वारा ही हम पाप का विनाश कर सकेंगे।

    भावार्थ

    प्रभु ही हमें धन-विजय व कीर्ति प्राप्त कराते हैं। प्रभु ही हमारे शत्रुओं का संहार करते हैं। अगले सूक्त के प्रथम चार मन्त्रों के ऋषि भी 'विश्वामित्र' ही हैं। पिछले तीन में ऋषि 'गृत्समदः' हैं-प्रभु-स्तवन करते है [गृणाति] और आनन्द का अनुभव करते हैं -

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    भाषार्थ

    (इन्द्र) हे परमेश्वर! (द्युम्नेषु) योगज विभूतिरूपी धनों की प्राप्ति के निमित्त, (पृतनाज्ये) मनुष्य जिनमें घृताहुति के रूप में आहुत हुए जा रहे हैं, ऐसे देवासुर संग्राम के निमित्त, (पृत्सुतूर्षु) देवासुर-संग्रामों में असुरों की हिंसा के निमित्त, (च श्रवःसु) और देवासुर-संग्रामों में विजययशों की प्राप्ति के निमित्त, तथा (अभिमातिषु) अभिमान की भावनाओं के जागरित हो जाने पर (साक्ष्व) आप हमें सहायकरूप में प्राप्त हूजिए।

    टिप्पणी

    [पृतनाज्ये=पृतना=मनुष्यनाम (निघं০ २.३)+आज्य (=घी) अर्थात् युद्धाग्नि, जिसमें कि मनुष्यों की आहुतियाँ पड़ती हैं। पृत्सु=संग्रामनाम (निघं০ २.१७)+तूर्षु (तुर्वि हिंसायाम्)। साक्ष्व=सक्षतिः गतिकर्मा (निघं০ २.१४)।]

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    विषय

    परमेश्वर और राजा की शरणप्राप्ति।

    भावार्थ

    (द्युम्नेषु) धनों के प्राप्त करने में (पृतनाज्ये) संग्रामों में और शत्रु सेनाओं के विजय करने के कार्य में (पृत्सु तूर्षु) संग्राम में खड़ी शत्रु-सेनाओं के वध करने के उपायों में (श्रवःसु) यश के कार्यों या अन्न प्राप्त करने के कार्यों में और हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् राजन् ! तू (अभिमातिषु) शत्रुओं पर (साक्ष्व) विजय करने में समर्थ हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्र ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। सप्तर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Self-integration

    Meaning

    In the battles of forces in plans and programmes of development for prosperity and excellence, in the contests of forces positive and negative for good and evil, in the onslaughts of stormy troops of hostility in the efforts for growth in food, energy and enlightenment, in the struggles for self-realisation against pride and arrogance, Indra, O spirit of the soul, voice of conscience, genius of the nation, and invincible strength of character, tolerate, endure, challenge, fight and throw out the enemies of life’s light and joy.

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    Translation

    O Almighty God, you are able to be viotorious in the effort of attaining wealth, in the matter of encountering evils in connection with combating the army in the battle, in acquiring gain and fame on the rivalaries of rivals.

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    Translation

    O Almighty God, you are able to be victorious in the effort of attaining wealth, in the matter of encountering evils in connection with combating the army in the battle, in acquiring gain and fame on the rivalaries of rivals.

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    Translation

    O mighty Lord, letest Thee be capable of acquiring wealth and riches, conquering the fighting forces of the foes in wars, destroying the enemy’s armies in the war, acquisition of food-grains or performance of acts of valour and glory, and overpowering the proud adversary.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(द्युम्नेषु) द्योतमानेषु धनेषु (पृतनाज्ये) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। पृतना+अज गतिक्षेपणयोः-यक्प्रत्ययः। पृतनानां सेनानाम्, अजन गमनं यत्र। रणक्षेत्रे (पृत्सुतूर्षु) तुर हिंसायाम्-क्विप्। मांसपृतनासानूनां मांस्पृत्स्नवो वाच्याः। वा० पा० ६।१।६३। इति पृतना शब्दस्य पृत्, अलुक् समासः। पृत्सु पृतनासु सेनासु तूर्षु हिंसकेषु शूरेषु (श्रवःसु) कीर्तिषु (च) (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (साक्ष्व) षह मर्षणे-लोट्, शपो लुक्, ढत्त्वकुत्वे, छान्दसो दीर्घः। सहस्व। अभिभव। विजय (अभिमातिषु) अभिमातिषु। शत्रुषु ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজপ্রজাগুণোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (ইন্দ্র) হে ইন্দ্র! [ঐশ্বর্যবান রাজন্] (পৃতনাজ্যে) সেনাদের চলন স্থান রণক্ষেত্রে (পৃৎসুতূর্ষু) সেনাদের মধ্যে হননকারী বীরদের মাঝে, (দ্যুম্নেষু) উজ্জ্বল ধনসম্পদের মাঝে (চ)(শ্রবঃসু) কীর্তিসমূহের মাঝে (অভিমাতিষু) অভিমানী শত্রুদের উপর (সাক্ষ্ব) বিজয় লাভ করো।।৭।।

    भावार्थ

    প্রতাপী সেনাপতি যুদ্ধে বিজয়ী হয়ে সাহসী যোদ্ধাসমেত বহুল সাধন ও যশ প্রাপ্ত করে বিজয়ের ঘোষণা করুক।।৭।।

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    भाषार्थ

    (ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (দ্যুম্নেষু) যোগজ বিভূতিরূপী ধন প্রাপ্তির নিমিত্ত/জন্য, (পৃতনাজ্যে) মনুষ্য যার মধ্যে ঘৃতাহুতির রূপে আহুত হচ্ছে, এরূপ দেবাসুর সংগ্রামের জন্য, (পৃৎসুতূর্ষু) দেবাসুর-সংগ্রামে অসুরদের হিংসার/দমনের জন্য, (চ শ্রবঃসু) এবং দেবাসুর-সংগ্রামে বিজয় যশ প্রাপ্তির জন্য, তথা (অভিমাতিষু) অভিমানের ভাবনা-সমূহ জাগরিত হলে (সাক্ষ্ব) আপনি আমাদের সহায়করূপে প্রাপ্ত হন।

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