अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 23/ मन्त्र 8
मारे अ॒स्मद्वि मु॑मुचो॒ हरि॑प्रिया॒र्वाङ्या॑हि। इन्द्र॑ स्वधावो॒ मत्स्वे॒ह ॥
स्वर सहित पद पाठमा । आ॒रे । अ॒स्मत् । वि । मु॒मु॒च॒: । हरि॑ऽप्रिय । अ॒र्वाङ् । या॒हि॒ ॥ इन्द्र॑ । स्व॒धा॒ऽव॒: । मत्स्व॑ । इ॒ह ॥२३.८॥
स्वर रहित मन्त्र
मारे अस्मद्वि मुमुचो हरिप्रियार्वाङ्याहि। इन्द्र स्वधावो मत्स्वेह ॥
स्वर रहित पद पाठमा । आरे । अस्मत् । वि । मुमुच: । हरिऽप्रिय । अर्वाङ् । याहि ॥ इन्द्र । स्वधाऽव: । मत्स्व । इह ॥२३.८॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(हरिप्रिय) हे मनुष्यों के प्रिय ! [अपने को] (अस्मत्) हमसे (आरे) दूर (मा वि मुमुचः) कभी न छोड़, (अर्वाङ्) इधर चलता हुआ (याहि) चल। (स्वधावः) हे बहुत अन्नवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (इह) यहाँ (मत्स्व) आनन्द कर ॥८॥
भावार्थ
जहाँ पर राजा और प्रजा प्रीति के साथ रहते हैं और कोई किसी को नहीं छोड़ते, उस राज्य में अन्न आदि बढ़ते रहते हैं ॥८॥
टिप्पणी
८−(मा) निषेधे (आरे) दूरे (अस्मत्) अस्मत्तः (वि) वियुज्य (मुमुचः) मुच्लृ मोक्षणे ण्यन्तस्य छान्दसे लुङि चङि रूपम्, अभ्यासस्य दीर्घाभावः, माङ्योगेऽडभावः। मोचय-आत्मानम् (हरिप्रिय) हरयो मनुष्य-नाम-निघ० २।३। हरीणां मनुष्याणां प्रिय हितकर (अर्वाङ्) अभिमुखं गच्छन् (याहि) गच्छ (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (स्वधावः) बह्वन्नवन् (मत्स्व) आनन्द (इह) अत्र ॥
विषय
मा आरे विमुमुचः
पदार्थ
१. हे (हरिप्रिय) = प्रीतिकर इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करानेवाले [हरिः प्रियो यस्य] (इन्द्र) = परमैश्वर्य शालिन् प्रभो! (अस्मत् आरे) = हमसे दूर (मा विमुमुचः) = रथयुक्त अश्वों को मुक्त मत कर दीजिए। (अर्वाङ् याहि) = आप हमें आभिमुख्येन प्राप्त हों। २. हे (स्वधाव:) = आत्मधारणशक्तिवाले प्रभो! (इह) = इस-हमारे जीवन में आप (मत्स्व) = आनन्दित होइए। सोम-रक्षण के द्वारा आप हम उपासकों को आनन्दमय जीवनवाला बनाइए।
भावार्थ
प्रभु हमें समीपता से प्राप्त हों। वे आत्मधारणशक्तिवाले प्रभु सोम-रक्षण द्वारा हमें आनन्दित करें।
भाषार्थ
(इन्द्र) हे परमेश्वर! (अस्मद् आरे) हम से दूर (मा) न हूजिए, न हमें (वि मुमुचः) छोड़ दीजिए। (हरिप्रिय) हे मनोहारी भक्तिरस के प्यारे! (अर्वाङ् याहि) हमारे अभिमुख रहिये। (स्वधावः) हे भक्तिरसरूपी अन्न के स्वामी! (इह) इन हमारे भक्तिरसों में (मत्स्व) प्रसन्न रहिए। [स्वधा=अन्न (निघं০ २.८)।]
विषय
राजा के कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे (हरिप्रिय) हरणशील, ज्ञानशील पुरुषों के प्रिय ! तू (अर्वाङ् याहि) साक्षात् दर्शन दे, हमारे सम्मुख हमें प्राप्त हो। (अरे) हे परमेश्वर प्रभो ! (अस्मद्) हमसे तू (मा विमुमुच:) कभी न छूट, कभी अपने को दूर न कर। हे (स्वधावः) स्वधा = शरीरों को धारण करने वाले समष्टिचैतन्य के स्वामिन् ! प्रभो एवं अन्न और बलके स्वामिन् ! अथवा स्वयं निरपेक्ष होकर समस्त संसार के धारण पोषण करने की शक्ति वाले अद्वितीय ! तू (इह) हमारे इस हृदय-मन्दिर में एवं राष्ट्र में राजा के समान (मन्दस्व) आनन्द युक्त हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विश्वामित्र ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। नवर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Self-integration
Meaning
Indra, lord lover of speed and progress, forsake us not, leave us not, go not far away, come hither close to us. Lord self-sufficient and self-refulgent, be here with us. Rejoice.
Translation
O mighty ruler, you are the lord of grain-wealth and such a one whom the people are dear. You never make you apart from us and come direct to us. You take delight here (in our midst).
Translation
O mighty ruler, you are the lord of grain-wealth and such a one whom the people are dear. You never make you apart from us and come direct to us. You take delight here (in our midst).
Translation
O Lover of the Learned persons, letest thee not be separated far from us, but be pleased to reveal Thyself to us. O mighty Lord, the Sustainer of all, be pleased to shower happiness and peace in this world or country.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
८−(मा) निषेधे (आरे) दूरे (अस्मत्) अस्मत्तः (वि) वियुज्य (मुमुचः) मुच्लृ मोक्षणे ण्यन्तस्य छान्दसे लुङि चङि रूपम्, अभ्यासस्य दीर्घाभावः, माङ्योगेऽडभावः। मोचय-आत्मानम् (हरिप्रिय) हरयो मनुष्य-नाम-निघ० २।३। हरीणां मनुष्याणां प्रिय हितकर (अर्वाङ्) अभिमुखं गच्छन् (याहि) गच्छ (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (स्वधावः) बह्वन्नवन् (मत्स्व) आनन्द (इह) अत्र ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
রাজপ্রজাকর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(হরিপ্রিয়) হে মনুষ্যগনের প্রিয়! [নিজেকে] (অস্মৎ) আমাদের থেকে (আরে) দূর (মা বি মুমুচঃ) কখনো করো না, (অর্বাঙ্) এই অভিমুখে (যাহি) গমন করো। (স্বধাবঃ) হে বহু অন্নযুক্ত (ইন্দ্র) ইন্দ্র ![ঐশ্বর্যবান্ রাজন্] (ইহ) এখানে (মৎস্ব) আনন্দ করো॥৮॥
भावार्थ
যেখানে রাজা এবং প্রজা প্রীতিপূর্বক থাকে এবং কেউ কাউকে ত্যাগ করে না, সেই রাজ্যে অন্নাদি বৃদ্ধি পেতে থাকে ॥৮॥
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (অস্মদ্ আরে) আমাদের থেকে দূরে (মা) না হবেন/হবেন না, না আমাদের (বি মুমুচঃ) ছেড়ে দেবেন। (হরিপ্রিয়) হে মনোহারী ভক্তিরস প্রিয়! (অর্বাঙ্ যাহি) আমাদের অভিমুখে থাকুন। (স্বধাবঃ) হে ভক্তিরসরূপী অন্নের স্বামী! (ইহ) এই আমাদের ভক্তিরসে (মৎস্ব) প্রসন্ন থাকুন। [স্বধা=অন্ন (নিঘং০ ২.৮)।]
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