अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 70/ मन्त्र 18
नि येन॑ मुष्टिह॒त्यया॒ नि वृ॒त्रा रु॒णधा॑महै। त्वोता॑सो॒ न्यर्व॑ता ॥
स्वर सहित पद पाठनि । येन॑ । मु॒ष्टि॒ऽह॒त्यया॑ । नि । वृ॒त्रा । रु॒णधा॑महै ॥ त्वाऽऊ॑तास: । नि । अर्व॑ता ॥७०.१८॥
स्वर रहित मन्त्र
नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै। त्वोतासो न्यर्वता ॥
स्वर रहित पद पाठनि । येन । मुष्टिऽहत्यया । नि । वृत्रा । रुणधामहै ॥ त्वाऽऊतास: । नि । अर्वता ॥७०.१८॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
१०-२० परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थ
(येन) जिस [धन] के द्वारा (मुष्टिहत्यया) मुट्ठियों की मार [बाहुयुद्ध] से और (अर्वता) घुडचढ़े दल से (वृत्रा) शत्रुओं को (त्वोतासः) तुझसे रक्षा किये गये हम (नि) निश्चय करके (नि) नित्य (नि रुणधामहै) रोकते रहें ॥१८॥
भावार्थ
सब मनुष्य परमेश्वर का आश्रय लेकर पुरुषार्थ के साथ विद्याओं द्वारा धन बढ़ावें और शरीर और बुद्धिबल तथा अश्व आदि सेना को दृढ़ करके शत्रुओं को जीतें ॥१७, १८॥
टिप्पणी
मन्त्र १७-२० ऋग्वेद में है-१।८।१-४; मन्त्र १७ साम०-पू० २।४। ॥ १८−(नि) निश्चयेन (येन) धनेन (मुष्टिहत्यया) हनस्त च। पा० ३।१।१०८। मुष्टि+हन हिंसागत्योः-क्यप्। मुष्टिप्रहारेण। बाहुयुद्धेन (नि) नितराम् (वृत्रा) शत्रून् (रुणधामहै) निरुणधाम। निरुद्धान् करवाम (त्वोतासः) त्वया ऊता रक्षिताः (नि) निश्चयेन (अर्वता) अश्वदलेन ॥
विषय
धन का राष्ट्ररक्षा में विनियोग
पदार्थ
१. हमें वह धन प्राप्त कराइए (येन)=-जिसके द्वारा अपने सैनिकों के (मुष्टिहत्यया) = [मुष्टिप्रहारेण] मुक्कों के प्रहारों से (नि) = निश्चितरूप से (वृत्रा) = शत्रुओं को-राष्ट्र को घेर लेनेवाले दुश्मनों को (निरुणधामहै) = निरुद्ध कर दें। उनको राष्ट्र पर आक्रमण करने से रोक सकें। २. हे प्रभो! (त्वा ऊतास:) = आपसे रक्षित हुए-हुए हम (अर्वता) = अपने घोड़ों से शत्रुओं को (नि) = [रुणधमहे] रोकनेवाले बनें। धन का विनियोग इस पदातिसैन्य व अश्वसैन्य के संग्रह में करके हम राष्ट्र का रक्षण करनेवाले हों।
भावार्थ
हमें प्रभु 'वर्षिष्ठ' धन दें, जिससे उचित संख्या में सैन्यसंग्रह द्वारा राष्ट्र का रक्षण सम्भव हो।
भाषार्थ
हे परमेश्वर! (त्वोतासः) आप द्वारा सुरक्षित हम उपासक—(नि अर्वता) पाप-वृत्रों का नितरां हनन करनेवाले (येन) जिस आपकी सहायता द्वारा—(वृत्रा) पाप-वृत्रों का (निरुणधामहै) हम निरोध करते हैं, तथा उसका (नि) नितरां हनन करते हैं, जैसे कि (मुष्टिहत्यया) मुट्ठी के प्रहार द्वारा अल्प-कीट नष्ट किये जा सकते हैं—[अगले मन्त्र १९ के साथ अन्वय।]
विषय
राजा परमेश्वर।
भावार्थ
हे परमेश्वर ! (येन) जिस (त्वोतासः) तेरे द्वारा सुरक्षित होकर (मुष्टिहत्यया) चित्त वृति को विषयों में हर ले जाने वाली या आत्मा के स्वरूप को संप्रमोप या विस्मरण करा देने वाली तामस तृष्णा को मार कर (वृत्रा) अन्तःकरण को आ घेरने वाले, योग-सुख के बाधक विघ्नों का (नि रुणधामहै) सर्वथा निरोध करें और (अर्वता) ज्ञानबल से सभी उसको (नि रुणधामहै) निरुद्ध करें। राजा के पक्ष में—हम प्रजागण (त्वा उतासः) तेरे से सुरक्षित रह कर (मुष्टिहत्यया) मुक्कों से या शस्त्रों से प्रहार कर कर के (अता) अश्व बल से शत्रुओं को (निरुणधामहै) रोकें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—मधुच्छन्दाः। देवता—१,२,६-२० इन्द्रमरुतः, ३-५ मरुतः॥ छन्दः—गायत्री॥
इंग्लिश (4)
Subject
India Devata
Meaning
Indra, lord of power and glory, give us that strength of life and character whereby, under your blessed protection, we may hold back the enemy, evil and darkness with less than a blow of the fist and less than a dart of the lance.
Translation
Helped and kept secured by you we attain that wealth blessed with hourse by which we could repel our foe men in hand to hand battle.
Translation
Helped and kept secured by you we attain that wealth blessed with hourse by which we could repel our foemen in hand to hand battle.
Translation
By which (i.e., the above-mentioned wealth) being protected by Thee (God or king) we may completely ward off all forces of wickedness or ignorance, by killing evil propensities to lead astray the soul from the right path and by strong force of light and knowledge.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
मन्त्र १७-२० ऋग्वेद में है-१।८।१-४; मन्त्र १७ साम०-पू० २।४। ॥ १८−(नि) निश्चयेन (येन) धनेन (मुष्टिहत्यया) हनस्त च। पा० ३।१।१०८। मुष्टि+हन हिंसागत्योः-क्यप्। मुष्टिप्रहारेण। बाहुयुद्धेन (नि) नितराम् (वृत्रा) शत्रून् (रुणधामहै) निरुणधाम। निरुद्धान् करवाम (त्वोतासः) त्वया ऊता रक्षिताः (नि) निश्चयेन (अर्वता) अश्वदलेन ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
১০-২০ পরমেশ্বরোপাসনোপদেশঃ
भाषार्थ
(যেন) যে [ধনের] দ্বারা (মুষ্টিহত্যযা) মুষ্টি প্রহার দ্বারা [বাহুযুদ্ধ] এবং (অর্বতা) অশ্বারোহী দল দ্বারা (বৃত্রা) শত্রুদের, (ত্বোতাসঃ) আপনার দ্বারা রক্ষিত আমরা (নি) নিশ্চিতরূপে (নি) নিত্য (নি রুণধামহৈ) প্রতিরোধ করতে থাকবো ॥১৮॥
भावार्थ
সকল মনুষ্য পরমেশ্বরের আশ্রয় গ্রহণ করে পুরুষার্থের সহিত বিদ্যা দ্বারা ধন বৃদ্ধি করুক এবং শরীর ও বুদ্ধিবল তথা অশ্বাদি সেনাকে দৃঢ় করে শত্রুদের জয় করুক ॥১৭, ১৮॥মন্ত্র ১৭-২০ ঋগ্বেদে আছে-১।৮।১-৪; মন্ত্র ১৭ সাম০-পূ০ ২।৪।৫॥
भाषार्थ
হে পরমেশ্বর! (ত্বোতাসঃ) আপনার দ্বারা সুরক্ষিত আমরা উপাসক—(নি অর্বতা) পাপ-বৃত্রের নিরন্তর হননকারী (যেন) যে আপনার সহায়তা দ্বারা—(বৃত্রা) পাপ-বৃত্র-সমূহের (নিরুণধামহৈ) আমরা নিরোধ করি, তথা উহার (নি) নিরন্তর হনন করি, যেমন (মুষ্টিহত্যয়া) মুষ্টির প্রহার দ্বারা অল্প-কীট নষ্ট করা যেতে পারে—[আগামী মন্ত্র ১৯ এর সাথে অন্বয়।]
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