अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 70/ मन्त्र 2
दे॑व॒यन्तो॒ यथा॑ म॒तिमच्छा॑ वि॒दद्व॑सुं॒ गिरः॑। म॒हाम॑नूषत श्रु॒तम् ॥
स्वर सहित पद पाठदे॒व॒ऽयन्त॑: । यथा॑ । म॒तिम् । अच्छ॑ । वि॒दत्ऽव॑सुम् । गिर॑: । म॒हाम् । अ॒नू॒ष॒त॒ । श्रु॒तम् ॥७०.२॥
स्वर रहित मन्त्र
देवयन्तो यथा मतिमच्छा विदद्वसुं गिरः। महामनूषत श्रुतम् ॥
स्वर रहित पद पाठदेवऽयन्त: । यथा । मतिम् । अच्छ । विदत्ऽवसुम् । गिर: । महाम् । अनूषत । श्रुतम् ॥७०.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
१-९ राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थ
(देवयन्तः) विजय चाहनेवाले (गिरः) विद्वान् लोगों ने (यथा) जैसे (विदद्वसुम्) धनों के प्रसिद्ध करनेवाले (मतिम्) बुद्धिमान् की, [वैसे ही] (महाम्) महान् और (श्रुतम्) विख्यात पुरुष की (अच्छ) अच्छे प्रकार (अनूषत) स्तुति की है ॥२॥
भावार्थ
विजयी विद्वान् लोग अनुभवी प्रसिद्ध पुरुषों से उत्तम गुण ग्रहण करते रहें ॥२॥
टिप्पणी
२−(देवयन्तः) दिवु विजिगीषायाम्, चुरादिः-शतृ। यद्वा देव-क्यच्, शतृ। विजिगीषमाणाः। विजयमिच्छन्तः (यथा) येन प्रकारेण (मतिम्) क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम्। पा० ३।३।१७४। मन ज्ञाने क्तिच्। मतयो मेधाविनाम निघ० ३।१। मेधाविनम् (अच्छ) उत्तमरीत्या (विदद्वसुम्) विद ज्ञाने-शतृ। विदन्ति जानन्ति वसूनि धनानि यस्मात् तम् (गिरः) गॄ विज्ञापे स्तुतौ च-क्विप्। विद्वांसः (महाम्) नकारतकारलोपः। महान्तम् (अनूषत) अथ० २०।१७।१। स्तुतवन्तः (श्रुतम्) विख्यातम् ॥
विषय
'देवयन्त:-गिरः'
पदार्थ
१. (देवयन्त:) = [देवमात्मनमिच्छन्तः] उस प्रभु को प्राप्त करने की कामनावाले (गिरः) = स्तोता लोग (महाम) = पूजनीय (श्रुतम्) = सर्वज्ञत्व आदि गुणों से प्रसिद्ध प्रभुको (अनूषत) = स्तुत करते हैं। २. उस प्रभु को (अच्छ) = लक्ष्य करके स्तवन करते हैं जो (यथामतिम्) = यथार्थ ज्ञानवाले हैं और (विदद्सुम्) = सब वसुओं को प्राप्त करानेवाले हैं।
भावार्थ
प्रभु की उपासना से जहाँ यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है, वहाँ निवास के लिए आवश्यक सब धन भी प्राप्त हो जाते हैं।
भाषार्थ
(देवयन्तः) हे परमेश्वर! आप देव को चाहते हुए उपासकों ने, (यथा) जैसे (मतिम् अच्छ) सन्मति को (विदत्) प्राप्त किया है, वैसे (गिरः वसुम्) वेदवाणियों की सम्पत्तिरूप आपको भी प्राप्त किया है। तदनन्तर (महाम्) महान् और (श्रुतम्) लोक और वेदों में विश्रुत आपका (अनूषत) सबके प्रति स्तवन किया है।
विषय
राजा परमेश्वर।
भावार्थ
(देवयन्तः) उपास्य देव परमेश्वर की उपासना करनेहारे (गिरः) विद्वान् पुरुष (यथा) जिस प्रकार से (मतिम्) मनन करने योग्य, (वसुम्) सबके बसाने वाले और सबमें बसने वाले (श्रुतम्) सबसे श्रवण करने योग्य, जगत्-प्रसिद्ध, (महाम्) महान् परमेश्वर को (अच्छ) साक्षात् (विदद्) जानते हैं उसी प्रकार (ते) वे उसकी (अनूषत) स्तुति किया करते हैं। राजा के पक्ष में—(दवयन्तेः) अपने प्रमुख राजा को चाहने वाले (गिरः) विद्वान् पुरुष या शत्रुओं को निगलने वाले वीर पुरुष (यथा) जिस प्रकार (मतिम्) मननशील विद्वान् या शत्रु के स्तम्भन करने वाले (वसु) प्रजा के बसाने वाले, (श्रुतम्) जगत्-प्रसिद्ध (महाम्) महान् पुरुष को (अच्छा विदत्) साक्षात् प्राप्त करते या पाते हैं वैसे ही वे उसकी (अनूषत) स्तुति भी करते हैं, उसका आदर करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—मधुच्छन्दाः। देवता—१,२,६-२० इन्द्रमरुतः, ३-५ मरुतः॥ छन्दः—गायत्री॥
इंग्लिश (4)
Subject
India Devata
Meaning
Just as noble scholars develop and brighten up their generous mind and intelligence after the principles of Vedic revelation, so do the Maruts, currents of energy, intensify, magnify and adorn the sound that is produced and heard.
Translation
As the men of learning desiring to become men of wisdom and merit attain Divinity who is the object of premeditation, known to all, great and abode of all and praise Him so the wise men know and describe the sun.
Translation
As the men of learning desiring to become men of wisdom and merit attain Divinity who is the object of premeditation, known to all, great and abode of all and praise Him so the wise men know and describe the sun.
Translation
Just as the learned persons or the enemy-slayer brave persons desirous of seeking the shelter of the Glorious God or king know Him or him to be Thoughtful, capable of giving shelter to all, the Great and the Most-Renowned in the world, so do they sing His or. his praises.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(देवयन्तः) दिवु विजिगीषायाम्, चुरादिः-शतृ। यद्वा देव-क्यच्, शतृ। विजिगीषमाणाः। विजयमिच्छन्तः (यथा) येन प्रकारेण (मतिम्) क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम्। पा० ३।३।१७४। मन ज्ञाने क्तिच्। मतयो मेधाविनाम निघ० ३।१। मेधाविनम् (अच्छ) उत्तमरीत्या (विदद्वसुम्) विद ज्ञाने-शतृ। विदन्ति जानन्ति वसूनि धनानि यस्मात् तम् (गिरः) गॄ विज्ञापे स्तुतौ च-क्विप्। विद्वांसः (महाम्) नकारतकारलोपः। महान्तम् (अनूषत) अथ० २०।१७।१। स्तुतवन्तः (श्रुतम्) विख्यातम् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
১-৯ রাজপ্রজাধর্মোপদেশঃ
भाषार्थ
(দেবয়ন্তঃ) বিজয় ইচ্ছুক (গিরঃ) বিদ্বানগণ (যথা) যেমন (বিদদ্বসুম্) ধন প্রসিদ্ধকারী (মতিম্) বুদ্ধিমান্-এর, [তেমনই] (মহাম্) মহান্ এবং (শ্রুতম্) বিখ্যাত পুরুষের (অচ্ছ) উত্তমরূপে (অনূষত) প্রশংসা/স্তুতি করেছে ॥২॥
भावार्थ
বিজয়ী বিদ্বানগণ অভিজ্ঞ প্রসিদ্ধ পুরুষ থেকে উত্তম গুণ গ্রহণ করুক ॥২॥
भाषार्थ
(দেবয়ন্তঃ) হে পরমেশ্বর! আপনাকে [দেবতাকে] কামনা করে/কামনাকারী উপাসকগণ, (যথা) যেমন (মতিম্ অচ্ছ) সন্মতি/সৎ+মতি (বিদৎ) প্রাপ্ত করেছে, তেমনই (গিরঃ বসুম্) বেদবাণীর সম্পত্তিরূপ আপনাকেও প্রাপ্ত করেছে। তদনন্তর (মহাম্) মহান্ এবং (শ্রুতম্) লোক ও বেদে বিশ্রুত আপনার (অনূষত) সকলের প্রতি স্তবন করেছে।
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