अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 91/ मन्त्र 5
वि॒भिद्या॒ पुरं॑ श॒यथे॒मपा॑चीं॒ निस्त्रीणि॑ सा॒कमु॑द॒धेर॑कृन्तत्। बृह॒स्पति॑रु॒षसं॒ सूर्यं॒ गाम॒र्कं वि॑वेद स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः ॥
स्वर सहित पद पाठवि॒ऽभिद्य॑: । पुर॑म् । श॒यथा॑ । ई॒म् । अपा॑चीम् । नि: । त्रीणि॑ । सा॒कम् । उ॒द॒ऽधे: । अ॒कृ॒न्त॒त् ॥ बृह॒स्पति॑: । उ॒षस॑म् । सूर्य॑म् । गाम् । अ॒र्कम् । वि॒वे॒द॒ । स्त॒नय॑न्ऽइव । द्यौ: ॥९१.५॥
स्वर रहित मन्त्र
विभिद्या पुरं शयथेमपाचीं निस्त्रीणि साकमुदधेरकृन्तत्। बृहस्पतिरुषसं सूर्यं गामर्कं विवेद स्तनयन्निव द्यौः ॥
स्वर रहित पद पाठविऽभिद्य: । पुरम् । शयथा । ईम् । अपाचीम् । नि: । त्रीणि । साकम् । उदऽधे: । अकृन्तत् ॥ बृहस्पति: । उषसम् । सूर्यम् । गाम् । अर्कम् । विवेद । स्तनयन्ऽइव । द्यौ: ॥९१.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़े ब्रह्माण्डों के स्वामी परमेश्वर] ने (शयथा) सोती हुई (अपाचीम्) ओंधे मुखवाली (ईम्) प्राप्त हुई (पुरम्) पूर्ति [वा नगरी] को (विभिद्य) तोड़ डालकर (त्रीणि) तीनों [धामों अर्थात् स्थान, नाम और जाति जैसे मनुष्य पशु आदि-निरु० ६।२८] को (साकम्) एक साथ (उदधेः) जलवाले समुद्र से (निः अकृन्तत्) छाँट लिया, (द्यौः) उस प्रकाशमान [परमात्मा] ने (स्तनयन् इव) गरजते हुए बादल के समान होकर (उषसम्) तपानेवाले (सूर्यम्) सूर्य को, (गाम्) भूमि को और (अर्कम्) उष्णता देनेवाले अन्न को (विवेद) जताया है ॥॥
भावार्थ
जो पदार्थ परमाणु रूप से प्रलय के बीच बीजरूप में गड़बड़ पड़े थे, उनको परमात्मा ने जल द्वारा आकारयुक्त करके सूर्य, पृथिवी, अन्न आदि उत्पन्न किये हैं ॥॥
टिप्पणी
−(विभिद्य) विदार्य (पुरम्) पूर्तिं नगरीं वा (शयथा) शीङ्शपिरुगमि०। उ० ३।११३। शीङ् शयने-अथप्रत्ययः। विभक्तेराकारः। शयथाम्। शयनयुक्ताम् (ईम्) प्राप्ताम् (अपाचीम्) पराङ्मुखीम् (निः) पृथग्भावे (त्रीणि) धामानि त्रयाणि भवन्ति स्थानानि नामानि जन्मानीनि-निरु० ९।२८। (साकम्) युगपत् (उदधेः) जलाधारात्। समुद्रात् (अकृन्तत्) छिन्नवान्। निर्गमितवान् (बृहस्पतिः) बृहतां ब्रह्माण्डानां रक्षकः परमेश्वरः (उंषसम्) उषः किच्च। उ० ४।२३४। उष दाहे-असि कित्। दाहकम् (सूर्यम्) आदित्यमण्डलम् (द्याम्) पृथिवीम् (अर्कम्) अर्क तापे स्तुतौ च-घञ्। अन्नम्-निरु० ।४। (विवेद) विज्ञापितवान् (स्तनयन्) गर्जयन् मेघः (इव) यथा (द्यौः) प्रकाशमानः परमेश्वरः ॥
विषय
'उषसं-सूर्य गाम् अर्कम्' [विवेद]
पदार्थ
१. शरीर में 'काम, क्रोध, लोभ' रूप असुरों की क्रमश: "इन्द्रियों, मन व बुद्धि' में पुरियाँ बन जाती हैं। ये पुरियाँ'अपाची' [अप अञ्च]-हमें प्रभु से दूर ले-जानेवाली हैं। आसुरवृत्तियों के कारण हम संसार के विषयों में फंस जाते हैं और प्रभु को भूल जाते हैं। यदि हम इन्द्रियों को शान्त कर पाते हैं तो इन आसुर पुरियों को विदीर्ण करने में समर्थ हो जाते हैं। (शयथा) = [शी tranquility] शान्ति के द्वारा अथवा हृदय में शयन [निवास] के द्वारा अन्तर्मुखी वृत्ति के द्वारा (अपाचीम्) = प्रभु से हमें दूर ले-जानेवाली (पुरम्) = इस वासनात्मक आसुर पुरी का (ईम् विभिद्या) = निश्चय से विदारण करके, यह विदारण करनेवाला पुरुष (उदधेः साकम्) = [कामो हि समुद्रः] अनन्त विषयरूप जलवाले 'काम' के साथ (त्रीणि) = 'काम, क्रोध, लोभ' इन तीनों को (नि: अकृन्तत्) = निश्चय से काट डालता है। इनको नष्ट करके ही तो यह प्रभु की और चलता है। २. यह (बृहस्पति:) = ज्ञानी व शान्तवृत्तिबाला पुरुष (उषसम्) = उषा को, (सूर्यम्) = सूर्य को, (गाम्) = गौ को (अर्कम) = अर्क को (विवेद) = विशेषरूप से प्राप्त करता है। 'उषस्' शब्द 'उष दाहे' धातु से बनकर दोष-दहन का प्रतीक है 'सृ गतौ' से बना 'सूर्य' शब्द निरन्तर गति व क्रियाशीलता का संकेत करता है। 'गौ' शब्द 'गमयति' इस व्युत्पत्ति से अर्थों का ज्ञान देनेवाली वाणी का वाचक है और 'अर्च पूजायाम्' से बना अर्क शब्द पुजा व उपासना का वाचक है। बृहस्पति के जीवन में ये चारों वस्तुएँ बड़ी सुन्दरता से उपस्थित होती हैं। यह दोर्षों का दहन करता है-निरन्तर क्रियाशील होता है-वेदवाणी के अध्ययन से ज्ञान को बढ़ाता है और प्रभु के पूजन की वृत्तिवाला होता है। ३. ऐसा बनकर यह स्तनयन् इव द्यौः-गर्जना करते हुए युलोक के समान होता है। धुलोकस्थ सूर्य की भाँति सर्वत्र प्रकाश फैलाता है, परन्तु जैसे गर्जते हुए मेघों के कारण सूर्य सन्तापकारी नहीं होता, उसी प्रकार यह बृहस्पति भी गर्जते हुए मेघ के समान ज्ञान-जल का वर्षण करता है। वर्षण से यह लोकों के सन्ताप को हरता है। सन्तापहरण के उद्देश्य से ही यह ज्ञान-प्रसार के कार्य को बड़ी मधुरता से करता है।
भावार्थ
आसुर पुरियों का विदारण करके हम प्रभु-प्रवण वृत्तिवाले बनें। ज्ञान-प्रसार के कार्य को अहिंसा व माधुर्य के साथ करनेवाले हों।
भाषार्थ
हे तीन वैदिक रचनाओ! (पुरम्) ब्रह्माण्ड-पुरी को (विभिद्य) छिन्न-भिन्न करके, (अपाचीम्) प्रलयावस्था में (शयथ) जब तुम मानो सोई पड़ी थी, तदनन्तर (बृहस्पतिः) महाब्रह्माण्डपति ने, (साकम्) एक साथ, (त्रीणि) तीन रचनाओं को, (उदधेः) निज ज्ञान-सागर से (निः अकृन्तत्) मानो काट निकाला। तदनन्तर ब्रह्माण्डपति ने (उषसं, सूर्य, गाम्, अर्कम्) उषा, सूर्य, पृथिवी और मन्त्रसमूह (विवेद) हमें प्राप्त कराए, (इव) जैसे कि (द्यौः) चमकती विद्युत् (स्तनयन्) बादलों में गर्जती हुई जल प्राप्त कराती है।
टिप्पणी
[मन्त्र में कविशैली के अनुसार तीन रचनाओं का सम्बोधन किया है। अपाचीम्=इस पद द्वारा प्रलयावस्था को सूचित किया है। अपाची, अपाक्, अपाचीन=going backwards, turned backwards, not visible, imperceptible (आप्टे)। उदधेः=जैसे समुद्र से, सूर्यताप द्वारा, भापरूप में जल काट कर अलग कर दिया जाता है, वैसे बृहस्पति के ज्ञानोदधि से तीन रचनाएँ मानो कट कर उससे पृथक् हुईं। सृष्टिक्रम में प्रथम उषारूप उज्ज्वल प्रकाश प्रकट हुआ, तदनन्तर सूर्य, सूर्य के अनन्तर पृथिवी, और पृथिवी के अनन्तर मानुष-सृष्टि के प्रारम्भ में मन्त्रसमूह प्रकट हुआ है। गाम्=गौः पृथिवी (निघं০ १.१)। अर्कम्=अर्कः मन्त्रो भवति, यदनेनार्चन्ति (निरु০ ५.१.४)। विवेद=विद्लृ लाभे। मन्त्र में ब्रह्माण्ड-पुरी के भेदन, तदनन्तर प्रलयावस्था, तत्पश्चात्, उषा आदि के क्रम से सृष्टि की पुनः रचना के वर्णन द्वारा सृष्टि और प्रलय की अनादि और अनन्त परम्परा को सूचित किया है।]
विषय
विद्वन्, राजा ईश्वर।
भावार्थ
(बृहस्पतिः) बृहती आत्मशक्ति का पालक योगी (शयथा) शयन या सुषुति रूप में विद्यमान समस्त बाह्य प्राणों के भीतरी आत्मा में अप्यय या विलयन के अभ्यास द्वारा (अपाचीम्) अधोमुखी (पुरं) शत्रु के गढ़ के समान देहगत चित्-पुरी को (विभिद्य) भेदकर (उदधेः) जीवनरूप अमृत के धारण करने वाले मेघ के समान सुखवर्षक या रससागर के समान धर्ममेध समाधि के बल से (त्रीणि) शेष तीन द्वारों को भी (नि अकृन्तत्) सर्वथा काट देता है। और तब (उषसम्) अज्ञान, पाप और कर्मजाल के दहन करने वाली विशोका प्रज्ञा और (गाम्) ज्ञानमयी वाणी और (अर्कम्) अर्चनीय (सूर्यम्) सूर्य के समान तेजस्वी विशुद्ध आत्मस्वरूप को (स्तनयन् द्यौः इव) मेघ की गर्जना से गर्जते हुए आकाश के समान भीतरी नाद से गर्जता, स्वयं प्रकाशमय होकर (विवेद) साज्ञात् करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अयास्य आङ्गिरस ऋषिः। बृहस्पति देवता। त्रिष्टुभः। द्वादशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Brhaspati Devata
Meaning
Brhaspati, the seeker of light, in the state of turiya beyond deep sleep, breaks through the three bonds of the city of darkness of the mutable world like thunder and lightning breaking the dark cloud and directly realises the dawn, the sun rays, the sun and the light beyond the sun. Brhaspati, the seeker of light, in the state of turiya beyond deep sleep, breaks through the three bonds of the city of darkness of the mutable world like thunder and lightning breaking the dark cloud and directly realises the dawn, the sun rays, the sun and the light beyond the sun.
Translation
Brihaspatih, the fire cleaving the plentiful waters tending below, together with cloud makes apparent the trio of dawn, sun and sun-beams. This thundering finds the lightning luminous like day.
Translation
Brihaspatih, the fire cleaving the plentiful waters tending below, together with cloud makes apparent the trio of dawn, sun and sun-beams. This thundering finds the lightning luminous like day.
Translation
The Yogi, equipped with special glories of yoga, thoroughly cuts asunder, through the internal unbeaten sound, the darkening cover, of evil and ignorance checking the free flow of streams of spiritual light and splendor, like the enemy being torn by hand-weapon, i.e., sabre. Again he subdues the vital breath of various activities in the body through sweat-bearing exercises of the vital breaths, desirous of attaining Divine Bliss, and finally steals away the rays of spiritual radiance.
Footnote
‘Vala’ is not a special demon, but general term for a dark cloud of water or ignorance, ‘Pani’ also refers to a tight-fisted businessman.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
−(विभिद्य) विदार्य (पुरम्) पूर्तिं नगरीं वा (शयथा) शीङ्शपिरुगमि०। उ० ३।११३। शीङ् शयने-अथप्रत्ययः। विभक्तेराकारः। शयथाम्। शयनयुक्ताम् (ईम्) प्राप्ताम् (अपाचीम्) पराङ्मुखीम् (निः) पृथग्भावे (त्रीणि) धामानि त्रयाणि भवन्ति स्थानानि नामानि जन्मानीनि-निरु० ९।२८। (साकम्) युगपत् (उदधेः) जलाधारात्। समुद्रात् (अकृन्तत्) छिन्नवान्। निर्गमितवान् (बृहस्पतिः) बृहतां ब्रह्माण्डानां रक्षकः परमेश्वरः (उंषसम्) उषः किच्च। उ० ४।२३४। उष दाहे-असि कित्। दाहकम् (सूर्यम्) आदित्यमण्डलम् (द्याम्) पृथिवीम् (अर्कम्) अर्क तापे स्तुतौ च-घञ्। अन्नम्-निरु० ।४। (विवेद) विज्ञापितवान् (स्तनयन्) गर्जयन् मेघः (इव) यथा (द्यौः) प्रकाशमानः परमेश्वरः ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
পরমাত্মগুণোপদেশঃ
भाषार्थ
(বৃহস্পতিঃ) বৃহস্পতি [বৃহৎ ব্রহ্মাণ্ডের স্বামী পরমেশ্বর] (শয়থা) সুপ্ত/নিষ্ক্রিয় (অপাচীম্) পরাঙ্মুখ (ঈম্) প্রাপ্ত/আশ্রিত (পুরম্) পূর্তিকে [বা নগরীকে] (বিভিদ্য) খণ্ড-বিখণ্ড করে (ত্রীণি) ত্রিবিধ ধামকে [ধাম অর্থাৎ স্থান, নাম এবং জাতি যেমন মনুষ্য, পশু আদি-নিরু০ ৬।২৮] (সাকম্) একসাথে (উদধেঃ) জলবিশিষ্ট সমুদ্র থেকে (নিঃ অকৃন্তৎ) ছিন্ন/নির্গত করেছেন, (দ্যৌঃ) সেই প্রকাশমান [পরমাত্মা] (স্তনয়ন্ ইব) গর্জনশীল মেঘের সমান হয়ে (উষসম্) দাহক (সূর্যম্) সূর্য, (গাম্) ভূমি এবং (অর্কম্) উষ্ণতা প্রদায়ী অন্নকে (বিবেদ) উৎপন্ন/প্রকাশিত করেছেন ॥৫॥
भावार्थ
যে পদার্থ পরমাণু রূপে প্রলয়ে/অন্ধকারে বীজরূপে সুপ্ত/নিষ্ক্রিয় অবস্থায় ছিল, তা পরমাত্মা জল দ্বারা আকারয়ুক্ত করে সূর্য, পৃথিবী, অন্ন আদি উৎপন্ন করেছেন ॥৫॥
भाषार्थ
হে তিন বৈদিক রচনা! (পুরম্) ব্রহ্মাণ্ড-পুরী (বিভিদ্য) ছিন্ন-ভিন্ন করে, (অপাচীম্) প্রলয়াবস্থায় (শয়থ) যখন তোমরা মানো শায়িত অবস্থায় বর্তমান, তদনন্তর (বৃহস্পতিঃ) মহাব্রহ্মাণ্ডপতি, (সাকম্) একসাথে, (ত্রীণি) তিন রচনাকে, (উদধেঃ) নিজ জ্ঞান-সাগর দ্বারা (নিঃ অকৃন্তৎ) মানো উন্মুক্ত করেছে। তদনন্তর ব্রহ্মাণ্ডপতি (উষসং, সূর্য, গাম্, অর্কম্) ঊষা, সূর্য, পৃথিবী এবং মন্ত্রসমূহ (বিবেদ) আমাদের প্রাপ্ত করান, (ইব) যেমন (দ্যৌঃ) চমকিত বিদ্যুৎ (স্তনয়ন্) বাদলে গর্জন করে জল প্রাপ্ত করায়।
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