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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 91 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 91/ मन्त्र 7
    ऋषिः - अयास्यः देवता - बृहस्पतिः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-९१
    44

    स ईं॑ स॒त्येभिः॒ सखि॑भिः शु॒चद्भि॒र्गोधा॑यसं॒ वि ध॑न॒सैर॑दर्दः। ब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्वृष॑भिर्व॒राहै॑र्घ॒र्मस्वे॑देभि॒र्द्रवि॑णं॒ व्यानट् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स: । ई॒म् । स॒त्येभि॑: । सखि॑ऽभि: । शु॒चत्ऽभि॒: । गोऽधा॑यसम् । वि । ध॒न॒ऽसै: । अ॒द॒र्द॒रित्य॑दर्द: ॥ ब्रह्म॑ण: । पति॑: । वृष॑ऽभि: । व॒राहै॑: । घ॒र्मऽस्वे॑देभि: । द्रवि॑णम् । वि । आ॒न॒ट् ॥९१.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स ईं सत्येभिः सखिभिः शुचद्भिर्गोधायसं वि धनसैरदर्दः। ब्रह्मणस्पतिर्वृषभिर्वराहैर्घर्मस्वेदेभिर्द्रविणं व्यानट् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    स: । ईम् । सत्येभि: । सखिऽभि: । शुचत्ऽभि: । गोऽधायसम् । वि । धनऽसै: । अदर्दरित्यदर्द: ॥ ब्रह्मण: । पति: । वृषऽभि: । वराहै: । घर्मऽस्वेदेभि: । द्रविणम् । वि । आनट् ॥९१.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 91; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परमात्मा के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (सः) उस (ब्रह्मणः) ब्रह्माण्ड के (पतिः) स्वामी [परमेश्वर] ने (सत्येभिः) सत्य (सखिभिः) मित्ररूप, (शुचद्भिः) प्रकाशमान, (धनसैः) धन देनेवाले, (वृषभिः) बलवान्, (वराहैः) उत्तम आहार [भोजनादि] देनेवाले, (घर्मस्वेदेभिः) ताप और भाप रखनेवाले गुणों से (ईम्) प्राप्त हुए (गोधायसम्) वज्र रखनेवाले [शत्रु] को (अदर्दः) फाड़ डाला और (द्रविणम्) धन को (वि आनट्) प्राप्त किया है ॥७॥

    भावार्थ

    परमात्मा अपने सत्य आदि गुणों से सब क्लेशों को हटाकर हमें धन आदि देकर आनन्द देता है ॥७॥

    टिप्पणी

    ७−(सः) (ईम्) प्राप्तम् (सत्येभिः) सत्यशीलैः (सखिभिः) मित्रभूतैः (शुचद्भिः) दीप्यमानैः (गोधायसम्) गतिकारकोपपदयोः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वञ्च। उ० ४।२२७। गो+दधातेः-असि, णित्। गोर्वज्रस्य धारकं शत्रुम् (धनसैः) षणु दाने-उ। धनदातृभिः (अदर्दः) दॄ विदारणे-यङ्लुगन्ताल्लङि रूपम्। भृशं विदारितवान् (ब्रह्मणः) प्रवृद्धस्य ब्रह्माण्डस्य (पतिः) स्वामी (वृषभिः) बलवद्भिः (वराहैः) अ० ८।७।२३। अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। वर+आङ्+हृञ् हरणे-डप्रत्ययः। वरः श्रेष्ठ आहारो भोजनादिकं योग्यस्तैः। वराहारदातृभिः (घर्मस्वेदेभिः) घर्मस्तापः स्वेदो वाष्पश्च येभ्यस्तादृशगुणैः (द्रविणम्) धनम् (वि) विविधम् (आनट्) अ० १८।३।९। आनशे। प्राप्तवान् ॥

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    विषय

    उत्तम मित्र

    पदार्थ

    १. (सः) = वह (ईम्) = सचमुच (सत्येभिः) = सत्य का पालन करनेवाले (शुद्धिः) = अपने मनों को पवित्र बनानेवाले (धनस:) = धनों का संविभाग करनेवाले, अर्थात् सारे-का-सारा स्वयं न खा जानेवाले (सखिभिः) = मित्रों के साथ (गोधायसम्) = इन्द्रियरूप गौओं को चुराकर कहीं अज्ञानान्धकार में छुपाकर रखनेवाले बल [वृत्र-वासना] को (वि अदर्दः) = विदीर्ण करता है। संसार में मित्रों का संग ही हमें बनाता व बिगाड़ता है। अच्छे मित्रों के साथ हम अच्छे बन जाते हैं, बुरों के साथ बिगड़ जाते हैं। यहाँ हमारे मित्र 'सत्य, शचि व धनों' का संविभाग करनेवाले हैं। इनसे और उत्तम मित्र हो ही क्या सकते हैं? २. यह उत्तम मित्रों के साथ वल का विदारण करनेवाला व्यक्ति (ब्रह्मणस्पतिः) = ज्ञान का स्वामी बनता है और (वृषभिः) = पुण्यों से-पुण्यात्मक कर्मों से (वराहै:) = [वरं आहन्ति-गच्छति] शुभ उपायों के अवलम्बन से तथा (घर्मस्वेदेभिः) = स्वेद के क्षरण से [घ-क्षरणे]-पसीना बहाने के द्वारा (द्रविणम्) = धन को (व्यानट्) = प्राप्त करता है। ज्ञानी बनकर यह धन को पुण्यात्मक कर्मों से-शुभ उपायों से तथा खूब मेहनत से पसीना बहाकर ही कमाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ हमारे मित्र सत्यवादी, पवित्र व नि:स्वार्थी हों। हम पुण्य व शुभ श्रमयुक्त उपायों से ही धनार्जन करें।

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    भाषार्थ

    (सत्येभिः) सत्य का अनुष्ठान करनेवाले, (शुचद्भिः) पवित्र, (धनसैः) आध्यात्मिक-धनों के प्रदाता, (वृषभिः) उपदेशामृतवर्षी, (वराहैः) श्रेष्ठ-सात्विक आहारोंवाले, (घर्मस्वेदेभिः) यज्ञियकर्मों में अतिपरिश्रमी (सखिभिः) उपासक-सखाओं द्वारा, (ब्रह्मणस्पतिः) वेदपति या ब्रह्माण्डपति ने, (गोधायसम्) पृथिवीवासियों के धारण-पोषण करनेवाले वैदिक-रहस्यों को (वि अदर्दः) विशेषरूप में खोल दिया, और (द्रविणम्) वैदिक-ज्ञानरूपी धन को (व्यानट्) फैलाया है।

    टिप्पणी

    [सखिभिः—सखा का अर्थ है “समान ख्यातिवाले, समान धर्मवाले। उपासक जब उपकार, न्याय, पवित्रता, सत्यानुष्ठान, ज्ञानप्रदान, तथा यज्ञीय-कर्मों की दृष्टि से, परमेश्वर के लिए समानधर्मा हो जाते हैं, तब परमेश्वर उन्हें सखारूप जानता है। धनसैः=धन+षणु दाने। वराहैः=श्रेष्ठाहारवद्भिः। अथवा “वराहैः वृषभिः”—मेघों के समान, विना भेदभाव के सर्वत्र उपदेशामृतों की वर्षा करनेवाले। घर्म=यज्ञ (निघं০ ३.१७)।]

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    विषय

    विद्वन्, राजा ईश्वर।

    भावार्थ

    (सः) वह ज्ञानवान्, निष्ठ योगी (सत्येभिः) बलवान्, सत्योपदेष्टा (सखिभिः) अपने मित्र, (शुचद्भिः) दीप्तिमान् तेजस्वी (धनसैः) ज्ञान धन के प्रदान करने वाले गुरुओं से जिस प्रकार शिष्य (र्गोधायसं) ज्ञान-वाणियों को रोक रखने वाले अज्ञान को नाश करता है उसी प्रकार वह योगी भी (सत्येभिः) बलवान् सत्यवान् (सखिभिः) मित्र के समान सदा साथ विद्यमान, अनुकूलगति वाले (शुचद्भिः) देह को शोधन करने वाले, मलदाहक (धनसैः) बल और ज्ञानप्रद प्राणों के बल से (ईम्) उस (गोधायसम्) प्रकाश के रोकने वाले अज्ञान-आवरण को (वि अदर्दः) विशेषरूप से नष्ट करता है। और (धर्म-स्वेदेभिः) पसीना बहाने वाले (वृषभिः) वलवान् या आनन्द वर्षक (वराहैः) सु आहृत, उत्तमरूप से वशीकृत, प्रत्याहार द्वारा दमन किये गये प्रबल प्राणों द्वारा (द्रविणम्) अति द्रुतगति वाले मन को भी (वि आनट्) विशेष रूप से वश करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अयास्य आङ्गिरस ऋषिः। बृहस्पति देवता। त्रिष्टुभः। द्वादशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brhaspati Devata

    Meaning

    Brahmanaspati, master, protector, promoter and ruler of the world of existence, blest with divine light, vision and speech breaks down the thief of cows, i.e., hoarders, exploiters and destroyers of the wealth of life. He breaks them down with the help and cooperation of friends and associates who are generous, self-fulfilled, fervently dedicated to truth, purity of conduct, laws of Dharma and rectitude, and blest with ample means and materials for the achievement of their goal. Thus does he recover and establish wealth and common wealth for the individual and the society. Brahmanaspati, master, protector, promoter and ruler of the world of existence, blest with divine light, vision and speech breaks down the thief of cows, i.e., hoarders, exploiters and destroyers of the wealth of life. He breaks them down with the help and cooperation of friends and associates who are generous, self-fulfilled, fervently dedicated to truth, purity of conduct, laws of Dharma and rectitude, and blest with ample means and materials for the achievement of their goal. Thus does he recover and establish wealth and common wealth for the individual and the society.

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    Translation

    This air together with the true, luminous and wealth-giving Maruts cleaves this darkness of cloud which conceals the rays of sun. The air which is the protector of corn with the clouds tending towards rainfall and sending out the drops, brings wealth to people.

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    Translation

    This air together with the true, luminous and wealth-giving Maruts cleaves this darkness of cloud which conceals the rays of sun. The air which is the protector of corn with the clouds tending towards rainfall and sending out the drops, brings wealth to people.

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    Translation

    They (the vital breaths) being controlled by truthful mind, energies and reveal the rays of spiritual light and the master thereof, through intelligence and action. The great yogi of high spiritual power generates streams of highest bliss through learned persons, immersed in deep concentration of self and mutually protecting one another from blemishing behavior.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(सः) (ईम्) प्राप्तम् (सत्येभिः) सत्यशीलैः (सखिभिः) मित्रभूतैः (शुचद्भिः) दीप्यमानैः (गोधायसम्) गतिकारकोपपदयोः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वञ्च। उ० ४।२२७। गो+दधातेः-असि, णित्। गोर्वज्रस्य धारकं शत्रुम् (धनसैः) षणु दाने-उ। धनदातृभिः (अदर्दः) दॄ विदारणे-यङ्लुगन्ताल्लङि रूपम्। भृशं विदारितवान् (ब्रह्मणः) प्रवृद्धस्य ब्रह्माण्डस्य (पतिः) स्वामी (वृषभिः) बलवद्भिः (वराहैः) अ० ८।७।२३। अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। वर+आङ्+हृञ् हरणे-डप्रत्ययः। वरः श्रेष्ठ आहारो भोजनादिकं योग्यस्तैः। वराहारदातृभिः (घर्मस्वेदेभिः) घर्मस्तापः स्वेदो वाष्पश्च येभ्यस्तादृशगुणैः (द्रविणम्) धनम् (वि) विविधम् (आनट्) अ० १८।३।९। आनशे। प्राप्तवान् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    পরমাত্মগুণোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (সঃ) সেই/তিনি (ব্রহ্মণঃ) ব্রহ্মাণ্ডের (পতিঃ) স্বামী [পরমেশ্বর] (সত্যেভিঃ) সত্যশীল (সখিভিঃ) মিত্ররূপ, (শুচদ্ভিঃ) প্রকাশমান, (ধনসৈঃ) ধন দাতা, (বৃষভিঃ) বলবান্, (বরাহৈঃ) উত্তম আহার [ভোজনাদি] প্রদানকারী, (ঘর্মস্বেদেভিঃ) তাপ ও বাষ্পশক্তি বিশিষ্ট গুণসমূহ দ্বারা (ঈম্) প্রাপ্ত (গোধায়সম্) বজ্রধারক [শত্রুকে] (অদর্দঃ) বিদারিত করেছেন এবং (দ্রবিণম্) ধনকে (বি আনট্) প্রাপ্ত হয়েছেন ॥৭॥

    भावार्थ

    পরমাত্মা নিজ সত্য আদি গুণ দ্বারা সকল ক্লেশ দূরীভূত করে আমাদের ধন আদি প্রদান করে আনন্দ প্রদান করেন ॥৭॥

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    भाषार्थ

    (সত্যেভিঃ) সত্যের অনুষ্ঠাতা, (শুচদ্ভিঃ) পবিত্র, (ধনসৈঃ) আধ্যাত্মিক-ধন প্রদাতা, (বৃষভিঃ) উপদেশামৃতবর্ষী, (বরাহৈঃ) শ্রেষ্ঠ-সাত্ত্বিক আহারযুক্ত, (ঘর্মস্বেদেভিঃ) যজ্ঞিয়কর্মে অতিপরিশ্রমী (সখিভিঃ) উপাসক-সখাদের দ্বারা, (ব্রহ্মণস্পতিঃ) বেদপতি বা ব্রহ্মাণ্ডপতি, (গোধায়সম্) পৃথিবীবাসীদের ধারক-পোষক বৈদিক-রহস্যকে (বি অদর্দঃ) বিশেষরূপে উন্মোচন করে দিয়েছেন, এবং (দ্রবিণম্) বৈদিক-জ্ঞানরূপী ধন (ব্যানট্) বিস্তার করেছেন।

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