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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 11 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 11/ मन्त्र 5
    ऋषिः - ब्रह्मा, भृग्वङ्गिराः देवता - इन्द्राग्नी, आयुः, यक्ष्मनाशनम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - दीर्घायुप्राप्ति सूक्त
    68

    प्र वि॑शतं प्राणापानावन॒ड्वाहा॑विव व्र॒जम्। व्य॒१॒॑न्ये य॑न्तु मृ॒त्यवो॒ याना॒हुरित॑रान्छ॒तम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । वि॒श॒त॒म् । प्रा॒णा॒पा॒नौ॒ । अ॒न॒ड्वाहौ॑ऽइव । व्र॒जम् । वि । अ॒न्ये । य॒न्तु॒ । मृ॒त्यव॑: । यान् । आ॒हु: । इत॑रान् । श॒तम् ॥११.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र विशतं प्राणापानावनड्वाहाविव व्रजम्। व्यन्ये यन्तु मृत्यवो यानाहुरितरान्छतम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । विशतम् । प्राणापानौ । अनड्वाहौऽइव । व्रजम् । वि । अन्ये । यन्तु । मृत्यव: । यान् । आहु: । इतरान् । शतम् ॥११.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 11; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    रोग नाश करने के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (प्राणापानौ) हे श्वास और प्रश्वास तुम दोनों, [इस शरीर में] (प्र विशतम्) प्रवेश करते रहो, (अनड्वाहौ-इव) रथ ले चलनेवाले दो बैल जैसे (व्रजम्) गोशाला में (अन्ये) दूसरे (मृत्यवः) मृत्यु के कारण (वि यन्तु) उलटे चले जावें (यान्) जिन (इतरान्) कामनानाशक [मृत्युओं] को (शतम्) सौ प्रकार का (आहुः) बतलाते हैं ॥५॥

    भावार्थ

    मनुष्य प्राणायाम, व्यायामादि से अपने प्राण और अपान को अनुकूल रखकर शारीरिक अवस्था सुधारे रहें और दुराचारों से बचकर अपना जीवन शुभ कामों में लगावें ॥५॥

    टिप्पणी

    ५−(प्र विशतम्)। अन्तः प्राप्नुतम्। (प्राणापानौ)। शरीरधारकौ श्वासप्रश्वासौ। (अनड्वाहौ)। अनः शकटं वहतीति अनड्वान्। अनसि वहेः क्विप्, अनसो डकारः। अनसः शकटस्य रथस्य वोढारौ बलीवर्दौ। (इव)। यथा। (व्रजम्)। गोचरसंचर०। पा० ३।३।११९। इति व्रज गतौ-घञोऽपवादत्वेन घप्रत्यायन्तो निपातितः। गोष्ठम्। (वि यन्तु)। विमुखा गच्छन्तु। (अन्ये)। धार्मिकमरणाद् भिन्नाः। (मृत्यवः)। मरणकारणानि। (यान्)। मृत्यून्। (आहुः)। ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि-लट्। ब्रुवन्ति। कथयन्ति विद्वांसः। (इतरान्) अ० ३।१०।४। इ+तृ अभिभवे-अप्। सुकामनाशकान्। (शतम्)। बहून् ॥

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    विषय

    प्राणापानौ

    पदार्थ

    १. (प्राणापानौ) = प्राण व अपानशक्ति-शरीर में शक्ति के आधायक प्राण तथा दोषों को दूर करनेवाली अपानशक्ति (प्रविशतम्) = शरीर में इसप्रकार प्रविष्ट होकर स्थित हों (इव) = जैसेकि (अनड्वाहौ) = शकट का वहन करनेवाले दो बैल (व्रजम्) = अपने निवास स्थान गोष्ठ में प्रवेश करते हैं। २. (अन्ये मृत्यव:) = मृत्यु के कारणभूत ये विलक्षण रोग (वियन्त) = विशेषरूप से दूर चले जाएँ। (यान् इतरान्) = स्वाभाविक मृत्यु से भिन्न जिन रोगों को (शतं आहुः) = सौ संख्यावाला कहते हैं, ये सौ-के-सौ रोग प्राणापान की शक्ति से दूर भगा दिये जाएँ।

    भावार्थ

    प्राण व अपानशक्ति शरीर में स्थिर होकर सर्वरोगों को दूर करनेवाली हों।

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    भाषार्थ

    (प्राणापानौ) हे प्राण और अपान! (प्र विशतम्) तुम दोनों रोगी में प्रवेश करो, (इव) जैसेकि (अनड्वाहौ) शकटवाहन में समर्थ दो बैल (व्रजम्) गोशाला में प्रविष्ट होते हैं। (अन्ये) अन्य (मृत्यवः) मृत्यु (वि यन्तु) विगत हो जाएँ (यान् आहुः) जिन्हें कहते हैं, (इतरान् शतम्) उससे भिन्न सौ।

    टिप्पणी

    [भिन्न= यक्ष्म रोग से भिन्न रोग। शतम्= सौ वर्षों की आयु में व्यापी अन्य रोग।]

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    विषय

    आरोग्य और दीर्घायु होने के उपाय ।

    भावार्थ

    (अनड्वाहौ) जिस प्रकार रथ के दोनों बैल अपने (व्रजम्) निवासस्थान, वृषशाला में प्रविष्ट होते हैं उसी प्रकार हे (प्राणापानौ) प्राण और अपान, भीतर जाने और भीतर से बाहर आने वाले श्वास प्रश्वास तुम दोनों (प्र विशतं) इस बालक में सुखपूर्वक उत्तम रीति से प्रवेश करो। (अन्ये) और जो (मृत्यवः) आत्मा से देह के छूट जाने के नाना कारण हैं (यान्) जिन (इतरान्) औरों को भी (शतम्) सौ की संख्या में (आहुः) गिनाया जाता है वे भी (वि यन्तु) दूर हो जाय ।

    टिप्पणी

    ‘मृत्यून् एकशतं ब्रूमः’ इति अथर्व० ११ । ६ । १६ । ‘शतमन्यान् परिवृणक्त मृत्यून्’ अथर्व० १। ३०। ३॥ ‘ये मृत्यवः एकशतम्’ अथर्व० १। २। २७॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा भृग्वङ्गिराश्च ऋषि । ऐन्द्राग्न्युषसो यक्ष्मनाशनो वा देवता । ४ शक्वरीगर्भा जगती । ५, ६ अनुष्टुभौ । ७ उष्णिग् बृहतीगर्भा । पण्यापक्तिः । ८ त्र्यवसाना षट्पदा बृहतीगर्भा जगती । १ - ३ त्रिष्टुभः । अष्टर्चं सूक्तम् ।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Long Life and Yakshma Cure

    Meaning

    Let prana and apana vital energies enter forward like two virile bulls entering their stall. Let others, causes of ill health, disease and death, get away, which aliens, they say, are hundreds.

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    Translation

    May you, in-breath and out-breath, go on entering in him as two bullocks in a cow-pen. May other deaths, of which there are hundreds yet to come they say, "keep away".

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    Translation

    Let inhaling and exhaling restore their function in him as two bulls enter to their stable. Let pass away all those other mortality which men count a hundred,

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    Translation

    Breath, Respiration, come to the patient, as two car-oxen to their stall! Let all the other causes of death, whereof men count a hundred, pass away.

    Footnote

    Other causes of death: Besides natural death through old age. ‘A hundred' meansmany. There are innumerable causes of death.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(प्र विशतम्)। अन्तः प्राप्नुतम्। (प्राणापानौ)। शरीरधारकौ श्वासप्रश्वासौ। (अनड्वाहौ)। अनः शकटं वहतीति अनड्वान्। अनसि वहेः क्विप्, अनसो डकारः। अनसः शकटस्य रथस्य वोढारौ बलीवर्दौ। (इव)। यथा। (व्रजम्)। गोचरसंचर०। पा० ३।३।११९। इति व्रज गतौ-घञोऽपवादत्वेन घप्रत्यायन्तो निपातितः। गोष्ठम्। (वि यन्तु)। विमुखा गच्छन्तु। (अन्ये)। धार्मिकमरणाद् भिन्नाः। (मृत्यवः)। मरणकारणानि। (यान्)। मृत्यून्। (आहुः)। ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि-लट्। ब्रुवन्ति। कथयन्ति विद्वांसः। (इतरान्) अ० ३।१०।४। इ+तृ अभिभवे-अप्। सुकामनाशकान्। (शतम्)। बहून् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (প্রাণাপানৌ) হে প্রাণ ও অপান ! (প্র বিশতম্) তোমরা রোগীর মধ্যে প্রবেশ করো, (ইব) যেমন (অনড্বাহৌ) শকটবাহনে সমর্থ দুটি বলদ (ব্রজম) গো-শালায় প্রবিষ্ট হয়। (অন্যে) অন্য (মৃত্যুঃ) মৃত্যু-সমূহ (বি যন্তু) বিগত হয়ে যাক (যান্ আহুঃ) যাদের বলা হয়, (ইতরাম্ শতম্) সেগুলো থেকে ভিন্ন শত।

    टिप्पणी

    [ভিন্ন= যক্ষ্মা রোগ থেকে ভিন্ন রোগ। শতম্ = শত বর্ষের আয়ুতে ব্যাপী অন্য রোগ।]

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    मन्त्र विषय

    রোগনাশনায়োপদেশঃ

    भाषार्थ

    (প্রাণাপানৌ) হে শ্বাস ও প্রশ্বাস উভয়ই, [এই শরীরে] (প্র বিশতম্) প্রবেশ করতে থাকো, (অনড্বাহৌ-ইব) রথ বহনকারী দুটি বলদ যেমন (ব্রজম্) গোয়ালে/গোশালায়, (অন্যে) অপর/অন্য (মৃত্যবঃ) মৃত্যুর কারণ (বি যন্তু) বিপরীতে চলে যাক (যান্) যা (ইতরান্) কামনানাশক [মৃত্যু]কে (শতম্) শত প্রকারের (আহুঃ) বলা হয় ॥৫॥

    भावार्थ

    মনুষ্য প্রাণায়াম, ব্যায়ামাদি দ্বারা নিজের প্রাণ ও অপানকে অনুকূল রেখে শারীরিক অবস্থা সংশোধন করুক এবং দুরাচার থেকে দূরে থেকে নিজের জীবন শুভ কার্যে নিয়োজিত করুক ॥৫॥

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