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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 29 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 29/ मन्त्र 4
    ऋषिः - उद्दालकः देवता - शितिपाद् अविः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अवि सूक्त
    59

    पञ्चा॑पूपं शिति॒पाद॒मविं॑ लो॒केन॒ संमि॑तम्। प्र॑दा॒तोप॑ जीवति पितॄ॒णां लो॒केऽक्षि॑तम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पञ्च॑ऽअपूपम् । शि॒ति॒ऽपाद॑म् । अवि॑म् । लो॒केन॑ । सम्ऽमि॑तम् । प्र॒ऽदा॒ता । उप॑ । जी॒व॒ति॒ । पि॒तृ॒णाम् । लो॒के । अक्षि॑तम् ॥२९.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पञ्चापूपं शितिपादमविं लोकेन संमितम्। प्रदातोप जीवति पितॄणां लोकेऽक्षितम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पञ्चऽअपूपम् । शितिऽपादम् । अविम् । लोकेन । सम्ऽमितम् । प्रऽदाता । उप । जीवति । पितृणाम् । लोके । अक्षितम् ॥२९.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 29; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से सुख पाता है।

    पदार्थ

    (पञ्चापूपम्) विस्तीर्ण वा [पूर्वादि चार और ऊपर नीचे की पाँचवीं] पाँचों दिशाओं में अटूट शक्तिवाले, अथवा बिना सड़ी रोटी देनेवाले (शितिपादम्) प्रकाश और अन्धकार में गतिवाले, (लोकेन) संसार करके (संमितम्) सम्मान किये गए (अविम्) रक्षक प्रभु का [अपने आत्मा में] (दाता) अच्छे प्रकार दान करनेवाला (पितॄणाम्) रक्षक पुरुषों [बलवान् और विद्वानों] के (लोके) लोक में (अक्षितम्) अक्षयता [नित्य वृद्धि] को (उपजीवति) भोगता है ॥४॥

    भावार्थ

    अक्षय शक्तिवाले, सृष्टि भर को नित्य नवीन भोजन देनेवाले सर्वद्रष्टा परमेश्वर का उपासक माता पिता आदि विद्वान् वीर पितरों के साथ अक्षय (नित्य नवीन) सुख पाता है ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(पञ्चापूपम्) सप्यशूभ्यां तुट् च। उ० १।१५७। इति पचि व्यक्तीकारे विस्तारे च-कनिन्। इति पञ्च विस्तीर्णः संख्यावाचको वा। पानीविषिभ्यः पः। उ० ३।२३। इति पूयी विशरणे दुर्गन्धे च। प प्रत्ययः, यलोपः। अपूपः, अविशरणम् अहानिः गोधूमादिपिष्टकं वा। विस्तीर्णाविशरणम्। संपूर्णवृद्धियुक्तम्। यद्वा मध्यपदलोपः। पञ्चसु दिक्षु अपूपः, अविशरणम् अहानिः पूर्णता यस्य, यद्वा, दुर्गन्धरहतं पिष्टकं यस्मात् तं तथाभूतम् (प्रदाता) न लोकाव्ययनिष्ठा०। पा० २।३।६९। इति तृन्नन्तत्वात् कर्मणि षष्ठ्या निषेधे द्वितीयैव। प्रदायकः (उपजीवति) उपभुङ्क्ते (पितॄणाम्) रक्षकाणाम्। जननीजनकादिमान्यानां विदुषां शूराणाम् (लोके) जनसमूहे (अक्षितम्) नपुंसके भावे क्तः। पा० ३।३।११४। इति क्षि क्षये-भावे क्त। अक्षयत्वम्। सम्यग् वृद्धिम्। अन्यद् गतम् ॥

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    विषय

    पितृणां लोके

    पदार्थ

    १. (पञ्चापूपम्) = [पञ्च, अ, पूप-पूपी विशरणे] राष्ट्र के 'ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद'-इन पाँचों का विशीर्ण न होने देनेवाले, अथवा 'पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण व मध्य' देश के इन पाँचों भागों में रहनेवाली प्रजा को विशीर्ण न होने देनेवाले (शितिपादम्) = शुद्ध गतिवाले, विषयों में (अनासक्त अविम्) = रक्षक राजा को लोकेन संमितम-लोगों के प्रतिनिधियों से राष्ट्रसभा में निर्धारित-मानपूर्वक निश्चित किये गये कर का प्रदाता-देनेवाला प्रजावर्ग पितृणाम्-रक्षक राजपुरुषों के लोके-लोक में, अर्थात् राजपुरुषों से सुरक्षित राष्ट्र में (अक्षितम्) = अक्षीणता के साथ (उपजीवति) = जीवन धारण करता है। २. राजा का मौलिक कर्तव्य एक ही है कि वह चारों दिशाओं और मध्यभाग में स्थित सब प्रजाओं का ठीक से रक्षण करे उन्हें विशीर्ण न होने दे। राजपुरुष पितरों के समान हों। ये प्रजावर्ग को सन्तान-तुल्य समझें। प्रजा का कर्तव्य है कि वह ठीक प्रकार से कर देनेवाली हो।

    भावार्थ

    राजा प्रजा का रक्षण करे। राजपुरुष पितरों के समान हों। वे अपने सन्तानरूप प्रजाओं को क्षीण न होने दें।

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    भाषार्थ

    (पञ्चापूपम्) पाँच इन्द्रियों की अपवित्रता से निज को सुरक्षित करनेवाले, (शितिपादम्) निर्मल शारीरिक पाद आदि अवयवोंवाले, (लोकेन संमितम्) प्रजावर्ग द्वारा सम्यक् प्रकार से माप लिये गये, जाँच लिये गये (अविम्) रक्षा करनेवाले व्यक्ति को (प्रदाता) प्रदान करनेवाला (उप जीवति) जीवित करता है, (पितॄणां लोके) पितरों की लोकसभा में (अक्षितम्) न क्षीणकाल तक।

    टिप्पणी

    [पञ्च=पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। अपूपम्=अ+पूञ् पवने (क्र्यादिः)+ पा (रक्षणे) पितृणाम् लोके= यथा "सभा च मा समितिश्चावतां प्रजापते र्दुहितरौ संविदाने। येना संगच्छा उपमा स शिक्षाच्यार वदामि पितरः सङ्गतेषु।" (अथर्व० ७।१२।१)। उपजीवति=इन पितरों के लोक में प्रदाता का नाम सदा विश्रुत रहता है।]

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    विषय

    राजसभा के सदस्यों के कर्तव्य ।

    भावार्थ

    (पञ्च अपूपम्) पांच अपूप, मालपूओं अर्थात् पांच विषय भोगों से युक्त भोक्ता, (शितिपादम्) ज्ञानस्वरूप चेतन, (अविं) अपने अंगों के रक्षक, लोक से लोकान्तर में गति करने वाले, (लोकसंभितम्) तथा लोक के समान जाने गये उस आत्मा को (प्रदाता) परब्रह्म में समर्पित करने हारा (पितॄणाम् लोके) पितरों अर्थात् वयस्, ज्ञानादि से वृद्ध पालक लोगों से लोक अर्थात् समाज में (अक्षितम्) अक्षय (जीवति) कीर्तिमय जीवन का भोग करता है । राजपक्ष में—जो प्रजाजन ऐसे राष्ट्रपति को राष्ट्र की रक्षा के लिये नियुक्त कर देता है वह अन्य शासकों के रहते हुए भी नष्ट नहीं होता ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    उद्दालक ऋषिः। शितिपादोऽविर्देवता। ७ कामो देवता। ८ भूमिर्देवता। १, ३ पथ्यापंक्तिः, ७ त्र्यवसाना षट्षदा उपरिष्टादेवीगृहती ककुम्मतीगर्भा विराड जगती । ८ उपरिष्टाद् बृहती २, ४, ६ अनुष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Taxation, Development, Administration

    Meaning

    The voluntary giver of his national-saving, protective-promotive contribution, agreed and approved by the people, meant for the sustenance and advancement of a five-community vibrant nation lives happy, free from worry and violence in the land of his forefathers.

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    Translation

    Whoso pays the protection tax white-footed as approved by the people, along with five: cakes he, the payer, stays in the world of the elders ever undiminished.

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    Translation

    The men of philanthropic tendency and practice, who lives upto the material cause of the world which is spreading over all of its five elements and is accepted as the cause, of worldly scene by all the souls of the world, attain the permanent state of men of science and experiments.

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    Translation

    He who dedicates to God, the conscious soul, a prey to five passions, and honored by all, leads in the society of the learned and the aged, a life of deathless joy.

    Footnote

    Five passions: (1) Lust (2) Anger (3) Avarice (4) Infatuation (5) Pride.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(पञ्चापूपम्) सप्यशूभ्यां तुट् च। उ० १।१५७। इति पचि व्यक्तीकारे विस्तारे च-कनिन्। इति पञ्च विस्तीर्णः संख्यावाचको वा। पानीविषिभ्यः पः। उ० ३।२३। इति पूयी विशरणे दुर्गन्धे च। प प्रत्ययः, यलोपः। अपूपः, अविशरणम् अहानिः गोधूमादिपिष्टकं वा। विस्तीर्णाविशरणम्। संपूर्णवृद्धियुक्तम्। यद्वा मध्यपदलोपः। पञ्चसु दिक्षु अपूपः, अविशरणम् अहानिः पूर्णता यस्य, यद्वा, दुर्गन्धरहतं पिष्टकं यस्मात् तं तथाभूतम् (प्रदाता) न लोकाव्ययनिष्ठा०। पा० २।३।६९। इति तृन्नन्तत्वात् कर्मणि षष्ठ्या निषेधे द्वितीयैव। प्रदायकः (उपजीवति) उपभुङ्क्ते (पितॄणाम्) रक्षकाणाम्। जननीजनकादिमान्यानां विदुषां शूराणाम् (लोके) जनसमूहे (अक्षितम्) नपुंसके भावे क्तः। पा० ३।३।११४। इति क्षि क्षये-भावे क्त। अक्षयत्वम्। सम्यग् वृद्धिम्। अन्यद् गतम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (পঞ্চাপূপম্) পাঁচটি ইন্দ্রিয়ের অপবিত্রতা থেকে নিজেকে সুরক্ষিতকারী, (শিতিপাদম্) নির্মল শারীরিক পাদ আদি অবয়বসমন্বিত, (লোকেন সংমিতম্) প্রজাবর্গ দ্বারা সম্যকরূপে পরিমিত, পরীক্ষিত (অবিম্) রক্ষক ব্যক্তিকে (প্রদাতা) প্রদাতা/প্রদানকারী (উপ জীবতি) জীবিত করে, (পিতৄণাং লোকে) পিতরদের লোকসভায় (অক্ষিতম্) না ক্ষীণ হওয়া পর্যন্ত।

    टिप्पणी

    [পঞ্চ= পাঁচটি জ্ঞানেন্দ্রিয়। অপূপম্= অ+পূঞ্ পবনে (ক্র্যাদিঃ)+ পা (রক্ষণে) পিতৃণাম্ লোকে= যথা "সভা চ মা সমিতিশ্চাবতাং প্রজাপতের্দুহিতরৌ সংবিদানে। যেনা সংগচ্ছা উপ মা স শিক্ষাচ্চারু বদামি পিতরঃ সঙ্গতেষু।" (অথর্ব০ ৭।১২।১)। উপজীবতি= এই পিতরদের লোকে প্রদাতার নাম সদা বিশ্রুত থাকে।]

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    मन्त्र विषय

    মনুষ্যঃ পরমেশ্বরভক্ত্যা সুখং লভতে

    भाषार्थ

    (পঞ্চাপূপম্) বিস্তীর্ণ বা [পূর্বাদি চারটি ও উপর নীচের পঞ্চম] পাঁচটি দিশায় দৃঢ় শক্তিসম্পন্ন, অথবা যোগ্য অন্ন প্রদানকারী (শিতিপাদম্) আলো ও অন্ধকারে গতিসম্পন্ন, (লোকেন) সংসার দ্বারা (সংমিতম্) সম্মানিত (অবিম্) রক্ষক প্রভুর [নিজের আত্মায়] (দাতা) উত্তমরূপে দাতা (পিতৄণাম্) রক্ষক পুরুষদের [বলবান্ ও বিদ্বানদের] (লোকে) লোকে (অক্ষিতম্) অক্ষয়তা [নিত্য বৃদ্ধি] কে (উপজীবতি) ভোগ করে ॥৪॥

    भावार्थ

    অক্ষয় শক্তিসম্পন্ন, সমস্ত সংসারকে নিত্য নবীন ভোজন প্রদানকারী সর্বদ্রষ্টা পরমেশ্বরের উপাসক মাতা পিতা আদি বিদ্বান্ বীর পিতরদের সাথে অক্ষয় (নিত্য নবীন) সুখ প্রাপ্ত করে ॥৪॥

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