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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 29 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 29/ मन्त्र 1
    ऋषिः - उद्दालकः देवता - शितिपाद् अविः छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - अवि सूक्त
    163

    यद्राजा॑नो वि॒भज॑न्त इष्टापू॒र्तस्य॑ षोड॒शं य॒मस्या॒मी स॑भा॒सदः॑। अवि॒स्तस्मा॒त्प्र मु॑ञ्चति द॒त्तः शि॑ति॒पात्स्व॒धा ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । राजा॑न: । वि॒ऽभज॑न्ते । इ॒ष्टा॒पू॒र्तस्य॑ । षो॒ड॒शम् । य॒मस्य॑ । अ॒मी इति॑ । स॒भा॒ऽसद॑: । अवि॑: । तस्मा॑त् । प्र । मु॒ञ्च॒ति॒ । द॒त्त: । शि॒ति॒ऽपात् । स्व॒धा ॥२९.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यद्राजानो विभजन्त इष्टापूर्तस्य षोडशं यमस्यामी सभासदः। अविस्तस्मात्प्र मुञ्चति दत्तः शितिपात्स्वधा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । राजान: । विऽभजन्ते । इष्टापूर्तस्य । षोडशम् । यमस्य । अमी इति । सभाऽसद: । अवि: । तस्मात् । प्र । मुञ्चति । दत्त: । शितिऽपात् । स्वधा ॥२९.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 29; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से सुख पाता है।

    पदार्थ

    (यत्) जिस कारण से (यमस्य) नियमकर्त्ता परमेश्वर के (अमी सभासदः) ये सभासद् (राजानः) ऐश्वर्यवाले राजा लोग (इष्टापूर्तस्य) यज्ञ, वेदाध्ययन, अन्न दानादि पुण्यकर्म के [फल], (षोडशम्) सोलहवें पदार्थ मोक्ष को [चार वर्ण, चार आश्रम, सुनना, विचारना, ध्यान करना, अप्राप्त की इच्छा, प्राप्त की रक्षा, रक्षित का बढ़ाना, बढ़े हुए का अच्छे मार्ग में व्यय करना, इन पन्द्रह प्रकार के अनुष्ठान से पाये हुए सोलहवें मोक्ष को] (विभजन्ते) विशेष करके भोगते हैं, (तस्मात्) उसी कारण से [आत्मा को] (दत्तः) दिया हुआ, (शितिपात्) उजियाले और अन्धेरे में गतिवाला, (अविः) प्रभु (स्वधा) हमारे आत्मा को पुष्ट करनेवाला वा धन का देनेवाला अमृतरूप वा अन्न रूप होकर [पुरुषार्थी को] (प्र) अच्छे प्रकार से (मुञ्चति) मुक्त करता है ॥१॥

    भावार्थ

    धर्मराज परमेश्वर की आज्ञा माननेवाले पुरुषार्थी स्त्री पुरुष मोक्ष सुख भोगते रहते हैं, इसीसे सब लोग उस अन्तर्यामी को हृदय में रखकर पुरुषार्थ से (स्वधा) अमृत अर्थात् आत्मबल और धनधान्य पाकर मोक्ष आनन्द भोगें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(यद्) यस्मात् कारणात् (राजानः) अ० १।१०।१। ईश्वराः। समर्थाः (विभजन्ते) विशेषेण सेवन्ते (इष्टापूर्तस्य) अ० २।१२।४। यज्ञवेदाध्ययनान्नदानादिपुण्यकर्मणः (षोडशम्) तस्य पूरणे डट्। पा० ५।२।४८। इति षोडशन्-डट्। पद उत्वं दतृदशाधासूत्तरपदादेः ष्टुत्वं च। वा० पा० ६।३।१०९। इति उत्वष्टुत्वे। षोडशानां पूरकम्। चत्वारो वर्णाश्चत्वार आश्रमाः श्रवणमनननिदिध्यासनानि त्रीणि कर्माणि, अलब्धस्य लिप्सा, लब्धस्य यत्नेन रक्षणं, रक्षितस्य वृद्धिः, वृद्धस्य सन्मार्गे व्ययकरणमेष चतुर्विधः पुरुषार्थः। एतैः पञ्चदशभिः प्राप्तं षोडशं मोक्षम्, यथा दयानन्दभाष्ये, यजुर्वेदे ९।३४। (यमस्य) यमयतीति यमः। यम परिवेषणे-अच्। नियन्तुः। नियामकस्य। धर्मराजस्य। परमेश्वरस्य (अमी) परिदृश्यमानाः (सभासदः) सभा+षद्लृ गतौ, उपवेशने-क्विप्। सभेयाः (अविः) अ० ३।१७।३। अव रक्षणगतिकान्तिप्रीत्यादिषु-इन्। रक्षकः। गतिमान्। प्रभुः। सूर्यः, सूर्यरूपः परमात्मा (तस्मात्) पूर्वोक्तात् कारणात् (प्र) प्रकर्षेण (मुञ्चति) दुःखात् मुक्तं करोति (दत्तः) आत्मने समर्पितः (शितिपात्) क्रमितमिशतिस्तम्भामत इच्च उ० ४।१२२। इति शति, हिंसायाम्-इन्। स च कित्, अत इकारः। पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः। पा० ५।४।१३८। इति अकारलोपः। शितिः शुक्लः, कृष्णश्च। तयोर्मध्ये पादो गमने यस्य स तथाभूतः। प्रकाशान्धकारयोः समानगमनः। (स्वधा) अ० २।२९।७। स्वम् अस्माकमात्मानं पुष्णाति धनं ददातीति वा,। अमृतरूपः। अन्नरूपो भूत्वा ॥

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    विषय

    राजा को प्रजाकृत पुण्य के सोलहवें भाग की प्राप्ति

    पदार्थ

    १. (यत्) = जो (राजानः) = प्रजा के जीवन को व्यवस्थित बनानेवाले-प्रजा पर शासन करनेवाले, (यमस्य) = उस नियन्ता सभापति [राष्ट्रपति]के (अमी) = वे (सभासदः) = सभासद् लोग (इष्टापूर्तस्य) = प्रजा से aकिये जानेवाले यज्ञों व दान-पुण्य के कर्मों [वापी, कूप, तडागादि के बनवानेरूप कों] के (षोडशम्) = सोलहवें भाग को (विभजन्ते) = विभक्त कर लेते हैं, अर्थात् शासकवर्ग से सरक्षित प्रजा जिन उत्तम कर्मों को करती है, उनका सोलहवाँ भाग इन शासकों को प्राप्त होता है। प्रजारक्षण के कार्य में व्यग्र हुए-हुए ये लोग यज्ञादि के लिए समय नहीं निकाल पाते, परन्तु प्रजा जिन यज्ञादि कर्मों को करती है, उनका सोलहवाँ भाग इन्हें प्राप्त हो जाता है। जैसे प्रजा कमाती है और उसका सोलहवाँ भाग कर के रूप में देती है, इसीप्रकार इन राजाओं को प्रजा के पुण्य का भी सोलहवाँ भाग प्राप्त होता है। (तस्मात्) = उस सोलहवें भाग को प्रास करने के कारण (अवि:) = यह रक्षण करनेवाला राजा (प्रमुञ्चति) = प्रजा को चोरों व डाकुओं आदि के भय से मुक्त करता है। इन भयों से मुक्त प्रजा ही कमा सकेगी तथा यज्ञ आदि कर पाएगी। २. (दत्त:) = [दत्तं यस्मै सः] जिस राजा के लिए इन पुण्यों का सोलहवाँ भाग दिया गया है, वह राजा (शितिपात्) = सदा शुद्ध गतिवाला होता है। वह शिकार खेलना आदि व्यसनों में नहीं फंसता। इसे प्रजा-रक्षण के कार्य से अवकाश ही नहीं मिलता। यह स्वधा-अपनी प्रजा का धारण करनेवाला होता है।

    भावार्थ

    प्रजा का रक्षक राजा प्रजा से किये गये पुण्य कार्यों के भी सोलहवें भाग को प्राप्त करता है। वह स्वयं शुद्ध आचरणवाला होता हुआ प्रजारक्षण में लगा रहता है।

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    भाषार्थ

    (इष्टापूर्तस्य षोडशम्) यज्ञों और सामाजिक उपकारों के (यत्) जिस १६वें भाग को भी (राजानः) राजा लोग (विभजन्ते) राष्ट्र-कर रूप में विभक्त कर लेते हैं, (अमी) तो ये राजा लोग (यमस्य) नियन्ता मृत्यु के (सभासदः) सभासद् होते हैं। (तस्मात्) उस पाप से, (अविः दत्तः) राष्ट्र के प्रति समर्पित किया गया प्रत्येक [राजा] का आत्मा, जोकि शरीर-रक्षक है, वह (प्रमुञ्चति) दण्ड से प्रमुक्त कर देता है, जबकि वह राजा (शितिपात्) शुभ्रगतिक अर्थात् शुभ्राचारी हुआ (स्वधा१) अपने राष्ट्र का धारण-पोषण करनेवाला हो जाता है।

    टिप्पणी

    [यज्ञ और सामाजिक उपकार के काम राष्ट्र की रक्षा करते हैं। उन पर राष्ट्र कर लगाना वैदिक प्रथा के विरुद्ध है। जो राजा इन रक्षा के कामों पर राष्ट्र कर लगाते हैं, वे पापकर्म करते हैं। परन्तु जो-जो राजा निज आत्मा को राष्ट्र रक्षा के निमित्त सुपुर्द कर देता है, वह राष्ट्र का अवि अर्थात् रक्षक होकर शुद्धाचारी हो जाता है, वह राष्ट्रदण्ड से प्रमुक्त कर दिया जाता है। वेद में वेदवक्ता—ब्रह्मज्ञ पर शुल्क लगाना निषिद्ध है (अथर्व० ५।१९।३), क्योंकि इसका धन सोम आदि यज्ञों के निमित्त होता है, सोम आदि यज्ञ ही इसके दायाद अर्थात् सम्पत्ति के खानेवाले, उत्तराधिकारी होते हैं (अथर्व० ५।१८।६)। प्रजोपकारी कर्मों पर तथा यज्ञ कार्य पर व्यय किये गये धन पर "राज्य-कर" लगाना पापकर्म है। स्वधा [छान्दस प्रयोग]=स्व+धाः; धा=धारणपोषणयोः (जुहोत्यादिः)। शितिपात् या शितिपाद् की विशेष व्याख्या के लिए देखो (मन्त्र २) की व्याख्या। अथवा स्वधा अन्ननाम है, (निघं० २।७) अर्थात् इष्टापूर्त के १६वें विभाग को राज्यकर में विभक्त करनेवाला राजा यम अर्थात् मृत्यु का अन्नरूप हो जाता है, प्रजा द्वारा मार दिया जाता है।] [१. इष्टापूर्त पर राज्यकर लगाना, तथा राजा के स्वोपभोग के लिए 'राजकर' लगाना वेद-निपिद्ध है। केवल राष्ट्रोन्नति के लिए "राष्ट्रकर" या साम्राज्य-कर लगाना वेदानुमोदित है।]

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    विषय

    राजसभा के सदस्यों के कर्तव्य ।

    भावार्थ

    राजसभा के सभासदों के कर्त्तव्यों का उपदेश करते हैं—(यमस्य) सब राष्ट्र के नियामक राजा के (अभी) ये (सभासदः) सभा में विराजमान शिष्टों के परिपालन और दुष्टों के दमन में नियुक्त (राजानः) राजा लोग (इष्टापूर्त्तस्य) परस्पर की संगति से होने वाले नाना शिल्पकार्यों, देवोपासनाओं और यज्ञों के, आपूर्त्त=कूप, उद्यान, तडाग, सेतु आदि लोकोपकारक कार्यों के फल के (षोडशं) सोलहवें हिस्से को (यद्) क्योंकि (विभजन्ते) विभाग करके स्वयं ले लेते हैं । (तस्मात्) इस कारण से (अविः) राजा, सूर्य के समान (शितिपात्) श्वेतचरण, श्वेताश्व या शुक्लस्वरूप, उज्ज्वल रूप तीक्ष्णप्रकृति सेना का पालक होकर (स्वधा) स्वयं राष्ट्र का पालन करता हुआ (दत्तः) उचित रूप से करादि प्राप्त करके (प्रमुञ्चति) राष्ट्र को अन्य बन्धनों से मुक्त कर देता है । अध्यात्म पक्ष में—यम के सभासद् इस तपस्वी शरीर के भीतर व्यापक प्राण इस शरीर के इष्टापूर्त्त को सोलहों कला का विभाग किये बैठे हैं। जो इस शरीर का आत्मा वह (दत्तः) स्वयं इनका बल प्राप्त कर के उज्ज्वल ज्ञानी होकर स्वयं सब का धारण करने वाला (प्र मुञ्चति) मुक्त हो जाता है। १६ कलाएं देखो प्रश्रोपनिषद् में— “इहैवान्तः शरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोड़श कलाः प्रभवन्ति॥ स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं। मनोऽन्नाद् वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु नाम च॥ एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति। मिद्येते तासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते। स एषोऽकलोऽमृतो भवति। तदेष श्लोकः। अरा इव रथनाभौ कलाः यस्मिन् प्रतिष्ठिताः। तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथाः।” इति (प्रश्न उप० प्र० ६) इसी शरीर में सोलह कलाएं हैं—प्राण, श्रद्धा, खं, वायु, ज्योति, आपः, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक और नाम, ये सब उस परिद्रष्टा आत्मा की सोलह कलाएं उसके आश्रय पर हैं। उसी में लीन हो जाती हैं, वह मुक्त हो जाता है और बाद को मृत्यु नहीं सताती ।

    टिप्पणी

    (तृ०) ‘मुञ्चतु’ इति सायणः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    उद्दालक ऋषिः। शितिपादोऽविर्देवता। ७ कामो देवता। ८ भूमिर्देवता। १, ३ पथ्यापंक्तिः, ७ त्र्यवसाना षट्षदा उपरिष्टादेवीगृहती ककुम्मतीगर्भा विराड जगती । ८ उपरिष्टाद् बृहती २, ४, ६ अनुष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Taxation, Development, Administration

    Meaning

    When the councillors of the ruling president of the nation, who carry on the administration, receive and allocate one sixteenth of the national income from Purtta, the usual, and Ishta, special, resources such as agriculture and industry, under different heads, then the ruler who rules and protects the nation, having been given that financial power, essential, white and self- supportive, releases those funds for the purposes decided and provides freedom to the people from want and worry.

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    Subject

    Sitipāda and Avih

    Translation

    What the princes, the members of the controller’s court, divide as sixteenth part of income as tax for civic amenities, from that Avi ( avi protection tax) makes, one exempt if paid white footed ( honestly ) , in one’s own interest (svadha).

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    Translation

    As these brilliant members-parts of the order of the creation differentiates the sixteenth from the other 15th created object of the desired and planned structure of the matter (11 organs including mind and 5 gross elements) therefore, Avih, the matter tending to the states of cause and effect, containing all the objects in its fold and impelled by God leaves out substance into created objects.

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    Translation

    Whereby, prosperous great men, the subjects of. God, attain to salvation, as thefruit of noble deeds like sacrifice, study of the Vedas, and acts of charity;thereby God, the same in light and darkness, retained by the soul, strengthens our soul, grants us riches and nicely releases our energetic soul.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(यद्) यस्मात् कारणात् (राजानः) अ० १।१०।१। ईश्वराः। समर्थाः (विभजन्ते) विशेषेण सेवन्ते (इष्टापूर्तस्य) अ० २।१२।४। यज्ञवेदाध्ययनान्नदानादिपुण्यकर्मणः (षोडशम्) तस्य पूरणे डट्। पा० ५।२।४८। इति षोडशन्-डट्। पद उत्वं दतृदशाधासूत्तरपदादेः ष्टुत्वं च। वा० पा० ६।३।१०९। इति उत्वष्टुत्वे। षोडशानां पूरकम्। चत्वारो वर्णाश्चत्वार आश्रमाः श्रवणमनननिदिध्यासनानि त्रीणि कर्माणि, अलब्धस्य लिप्सा, लब्धस्य यत्नेन रक्षणं, रक्षितस्य वृद्धिः, वृद्धस्य सन्मार्गे व्ययकरणमेष चतुर्विधः पुरुषार्थः। एतैः पञ्चदशभिः प्राप्तं षोडशं मोक्षम्, यथा दयानन्दभाष्ये, यजुर्वेदे ९।३४। (यमस्य) यमयतीति यमः। यम परिवेषणे-अच्। नियन्तुः। नियामकस्य। धर्मराजस्य। परमेश्वरस्य (अमी) परिदृश्यमानाः (सभासदः) सभा+षद्लृ गतौ, उपवेशने-क्विप्। सभेयाः (अविः) अ० ३।१७।३। अव रक्षणगतिकान्तिप्रीत्यादिषु-इन्। रक्षकः। गतिमान्। प्रभुः। सूर्यः, सूर्यरूपः परमात्मा (तस्मात्) पूर्वोक्तात् कारणात् (प्र) प्रकर्षेण (मुञ्चति) दुःखात् मुक्तं करोति (दत्तः) आत्मने समर्पितः (शितिपात्) क्रमितमिशतिस्तम्भामत इच्च उ० ४।१२२। इति शति, हिंसायाम्-इन्। स च कित्, अत इकारः। पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः। पा० ५।४।१३८। इति अकारलोपः। शितिः शुक्लः, कृष्णश्च। तयोर्मध्ये पादो गमने यस्य स तथाभूतः। प्रकाशान्धकारयोः समानगमनः। (स्वधा) अ० २।२९।७। स्वम् अस्माकमात्मानं पुष्णाति धनं ददातीति वा,। अमृतरूपः। अन्नरूपो भूत्वा ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (ইষ্টাপূর্তস্য ষোডশম্) যজ্ঞ এবং সামাজিক উপকার-সমূহের (যৎ) যে ১৬তম অংশকেও (রাজানঃ) রাজাগণ (বিভজন্তে) রাষ্ট্র-কর রূপে বিভক্ত করে নেয়, (অমী) তখন এই রাজাগণ (যমস্য) নিয়ন্তা মৃত্যুর (সভাসদঃ) সভাসদ হয়। (তস্মাৎ) সেই পাপ থেকে, (অবিঃ দত্তঃ) রাষ্ট্রের প্রতি সমর্পিত প্রত্যেক [রাজা]-এর আত্মা, যা শরীর-রক্ষক, তা (প্রমুঞ্চতি) দণ্ড/শাস্তি থেকে মুক্ত করে দেয়, যদ্যপি সেই রাজা (শিতিপাৎ) শুভ্রগতিক অর্থাৎ শুভ্রাচারী হয়ে (স্বধা১) নিজের রাষ্ট্রের ধারণ-পোষণকারী হয়ে যায়।

    टिप्पणी

    [যজ্ঞ ও সামাজিক উপকারের কাজ রাষ্ট্রের রক্ষা করে। সেগুলোর ওপর রাষ্ট্র-কর প্রয়োগ করা বৈদিক প্রথা বিরুদ্ধ। যে রাজা এই রক্ষার কাজে রাষ্ট্র-কর প্রয়োগ করে, সে পাপকর্ম করে। কিন্তু যে-যে রাজা নিজ আত্মাকে রাষ্ট্র রক্ষার নিমিত্ত/জন্য সুপুর্দ/উৎসর্গ করে দেয়, সে/তাঁরা রাষ্ট্রের অবি অর্থাৎ রক্ষক হয়ে শুদ্ধাচারী হয়ে যায়, তাঁকে রাষ্ট্রদণ্ড থেকে মুক্ত করে দেওয়া হয়। বেদে বেদবক্তা-ব্রহ্মজ্ঞের ওপর শুল্ক/কর প্রয়োগ নিষিদ্ধ (অথর্ব০ ৫।১৯।৩), কারণ বেদবক্তা-ব্রহ্মজ্ঞের ধন সোম আদি যজ্ঞের জন্য হয়, সোম আদি যজ্ঞই এর দায়াদ অর্থাৎ সম্পত্তির ভক্ষণকারী, উত্তরাধিকারী হয় (অথর্ব০ ৫।১৮।৬)। প্রজোপকারী কর্মে এবং যজ্ঞকর্মে ব্যয় কৃত ধনের ওপর "রাজ্য-কর" প্রয়োগ করা পাপকর্ম। স্বধা [ছান্দস প্রয়োগ] =স্ব+ধাঃ; ডুধাঞ্= ধারণপোষণয়োঃ (জুহোত্যাদিঃ)। শিতিপাৎ বা শিতিপাদ্‌-এর বিশেষ ব্যাখ্যার জন্য দেখো (মন্ত্র ২) এর ব্যাখ্যা। অথবা স্বধা অন্ননাম, (নিঘং০ ২।৭) অর্থাৎ ইষ্টাপূর্ত-এর ১৬তম বিভাগকে রাজ্যকর-এ বিভক্তকারী রাজা যম অর্থাৎ মৃত্যুর অন্নরূপ হয়ে যায়, প্রজা দ্বারা বিনাশ করে দেওয়া হয়।] [১. ইষ্টাপূর্ত-এর ওপর রাজ্যকর প্রয়োগ, এবং রাজার স্বোপভোগ-এর জন্য 'রাজকর' প্রয়োগ বেদ-নিষিদ্ধ। কেবল রাষ্ট্রোন্নতির জন্য "রাষ্ট্রকর" বা সাম্রাজ্য-কর প্রয়োগ বেদানুমোদিত।]

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    मन्त्र विषय

    মনুষ্যঃ পরমেশ্বরভক্ত্যা সুখং লভতে

    भाषार्थ

    (যৎ) যে কারণে (যমস্য) নিয়মকর্ত্তা পরমেশ্বরের (অমী সভাসদঃ) এই সভাসদ্ (রাজানঃ) ঐশ্বর্যবান রাজাগণ (ইষ্টাপূর্তস্য) যজ্ঞ, বেদাধ্যয়ন, অন্ন দানাদি পুণ্যকর্মের [ফল], (ষোড়শম্) ষোড়শতম পদার্থ মোক্ষকে [চার বর্ণ, চার আশ্রম, শ্রবণ, মনন, চিন্তন, অপ্রাপ্তের ইচ্ছা, প্রাপ্তের রক্ষা, রক্ষিত এর বৃদ্ধি, বৃদ্ধিপ্রাপ্তকে উত্তম মার্গে ব্যয় করা, এই পনেরো প্রকারের অনুষ্ঠান থেকে প্রাপ্ত ষোড়শতম মোক্ষকে] (বিভজন্তে) বিশেষভাবে ভোগ করে, (তস্মাৎ) সেই কারণেই [আত্মাকে] (দত্তঃ) প্রদত্ত, (শিতিপাৎ) আলো ও অন্ধকারে গতিসম্পন্ন, (অবিঃ) প্রভু (স্বধা) আমাদের আত্মাকে পুষ্টকারী বা ধন প্রদানকারী অমৃত রূপ বা অন্ন রূপ হয়ে [পুরুষার্থীকে] (প্র) উত্তমরূপে (মুঞ্চতি) মুক্ত করেন॥১॥

    भावार्थ

    ধর্মরাজ পরমেশ্বরের আজ্ঞা মান্যকারী পুরুষার্থী স্ত্রী-পুরুষ মোক্ষ সুখ ভোগ করতে থাকে, এর থেকেই সমস্ত মনুষ্য সেই অন্তর্যামীকে হৃদয়ে রেখে পুরুষার্থ দ্বারা (স্বধা) অমৃত অর্থাৎ আত্মবল ও ধনধান্য প্রাপ্ত করে মোক্ষ আনন্দ ভোগ করুক ॥১॥

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