अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 29/ मन्त्र 3
ऋषिः - मृगारः
देवता - मित्रावरुणौ
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - पापमोचन सूक्त
44
यावङ्गि॑रस॒मव॑थो॒ याव॒गस्तिं॒ मित्रा॑वरुणा ज॒मद॑ग्नि॒मत्त्रि॑म्। यौ क॒श्यप॒मव॑थो॒ यौ वसि॑ष्ठं॒ तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥
स्वर सहित पद पाठयौ । अङ्गि॑रसम् । अव॑थ: । यौ । अ॒गस्ति॑म् । मित्रा॑वरुणा । ज॒मत्ऽअ॑ग्निम् । अत्त्रि॑म् । यौ । क॒श्यप॑म् । अव॑थ: । यौ । वसि॑ष्ठम् । तौ । न॒: । मु॒ञ्च॒त॒म् । अंह॑स: ॥२९.३॥
स्वर रहित मन्त्र
यावङ्गिरसमवथो यावगस्तिं मित्रावरुणा जमदग्निमत्त्रिम्। यौ कश्यपमवथो यौ वसिष्ठं तौ नो मुञ्चतमंहसः ॥
स्वर रहित पद पाठयौ । अङ्गिरसम् । अवथ: । यौ । अगस्तिम् । मित्रावरुणा । जमत्ऽअग्निम् । अत्त्रिम् । यौ । कश्यपम् । अवथ: । यौ । वसिष्ठम् । तौ । न: । मुञ्चतम् । अंहस: ॥२९.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
पुरुषार्थ करने का उपदेश।
पदार्थ
(यौ) जो (मित्रावरुणा) मित्र और वरुण तुम दोनों (अङ्गिरसम्) उद्योगी वा ज्ञानी पुरुष को और (यौ) जो तुम दोनों (अगस्तिम्) वक्रगति पाप के गिरा देनेवाले, (जमदग्निम्) [यज्ञ वा शिल्पसिद्धि में] प्रकाशमान अग्निवाले और (अत्रिम्) दोष के नाश करनेवाले, यद्वा निरन्तर गतिशील, यद्वा कायिक वाचिक और मानसिक तीन दोष रहित महात्मा को (अवथः) बचाते हो। (यौ) जो तुम दोनों (कश्यपम्) सोमरस पीनेवाले वा सूक्ष्मदर्शी पुरुष को और (यौ) जो तुम दोनों (वसिष्ठम्) बड़े धनी और बड़े श्रेष्ठ जन को (अवथः) बचाते हो। (तौ) वे तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ावो ॥३॥
भावार्थ
मनुष्य (मित्रावरुणा) दिन-रात अर्थात् समय, और प्राण और अपान अर्थात् इन्द्रियों के यथावत् प्रयोग से ज्ञानी, शुद्ध चित्त, और सूक्ष्मदर्शी होकर सदा आनन्द भोगते हैं ॥३॥
टिप्पणी
३−(यौ) युवाम् (अङ्गिरसम्) अ० २।१२।४। गन्तारम्। उद्योगिनं ज्ञानिनं वा (अवथः) रक्षथः (अगस्तिम्) अ० २।३२।३। अग वक्रगतौ-अच्। वसेस्तिः। उ० ४।१८०। इति अग+असु क्षेपणे कर्त्तरि−ति प्रत्ययः, पृषोदरादित्वाद् दीर्घाभावः। अगं कुटिलगतिं पापम् अस्यति उत्पाटयतीति अगस्तिः। तथाभूतं पापनाशकं महर्षिम् (मित्रावरुणा) म० १। हे अहोरात्रौ प्राणापानौ वा (जमदग्निम्) अ० २।३२।३। जमन्तः प्रज्वलन्तोऽग्नयो यज्ञे शिल्पसिद्धौ वा यस्य तं महर्षिम् (अत्रिम्) अ० २।३२।३। दोषभक्षकं निरन्तरगतिशीलं वा मुनिं यद्वा। अत्रिर्न त्रयः-निरु० ३।१७। इति कायिकवाचिकमानसिकत्रि-दोषरहितं पुरुषम् (कश्यपम्) अ० २।३३।७। सोमरसपानशीलम्। यद्वा पश्यकं सूक्ष्मदर्शिनम् (वसिष्ठम्) वसुमत्-इष्ठन्। विन्मतोर्लुक्। पा० ५।३।६५। इति मतुपो लुक्। वसुमत्तमम्। अतिशयेन धनवन्तम्। यद्वा वसु-इष्ठन्। सर्वश्रेष्ठम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
अङ्गिरा से वसिष्ठ तक
पदार्थ
१. (मित्रावरुण) = नेह व निषता के भावो! (यौ) = जो आप (अङ्गिरसम् अवथ:) = अङ्ग-प्रत्यङ्ग में रसवाले को रक्षित करते हैं, (यौ) = जो (अग-स्तिम्) = पाप का संघात करनेवाले को रक्षित करते हैं [स्त्यै संघाते], जो आप (जमदग्निम्) = जीमनेवाली है जाठराग्नि जिसकी, अर्थात् अतिभोजन आदि दोषों के कारण जिसकी जाठराग्रि मन्द नहीं हो जाती तथा (अत्रिम्) = 'काम-क्रोध-लोभ' इन तीनों से रहित को आप रक्षित करते हो। २. (यौ) = जो आप (कश्यपम्) = [कश्यप-पश्यक:] तत्त्वद्रष्टा ज्ञानी का (अवथः) = रक्षण करते हो, (यौ) = जो आप (वसिष्ठम्) = अपने निवास को उत्तम बनानेवाले को रक्षित करते हो (तौ) = वे आप (न:) = हमें (अंहसः मुञ्चतम्) = पाप से मुक्त करो।
भावार्थ
स्नेह व निर्देषता के भाव हमें 'अङ्गिराः, अगस्ति, जमदग्नि, अत्रि, कश्यप व वसिष्ठ बनाते हैं। ये हमें पाप से मुक्त करते हैं।
भाषार्थ
(मित्रावरुणा) हे मित्र! [प्रधानमन्त्री, मन्त्र १] तथा हे वरुण! [शत्रुनिवारक सेनाध्यक्ष] (यौ) जो तुम दो (अङ्गिरसम्) राष्ट्र के लिए प्राणरूप व्यक्ति की (अवथः) रक्षा करते हो, (यौ) जो तुम दो (अगस्तिम्) पाप का निरसन करनेवाले की, (जमदग्नि) प्रज्वलित यज्ञाग्निवाले की, (अत्त्रिम्१) खा पीकर निज त्राण अर्थात् पालन करनेवाले की [रक्षा करते हो], (यौ) जो तुम दो (कश्यपम्) सत्यद्रष्टा की (अवथः) रक्षा करते हो, (यौ) जो तुम दो (वसिष्ठम्) वसुसम्पन्न श्रेष्ठ व्यक्ति की [रक्षा करते हो], (तौ) वे तुम दो (न:) हम सबको (अंहस:) पापकर्म से (मुञ्चतम्) मुक्त करो, छुड़ाओ।
टिप्पणी
[अङ्गिरसम्= अङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः, प्राणो वा अङ्गानां रसः (बृहद् उप० १।३।१९), राष्ट्र के लिए प्राणभूत व्यक्ति। अगस्तिम्= अग (आगः, पापम्) अस्यति, प्रक्षिपति अर्थात् पाप को निरस्त करनेवाला, अथवा "अगं वृक्षमस्यत्युत्पाटयतीति" (उणा० ४।१८१; दयानन्द) अर्थात् शूरवीर। जमदग्निम्= जमदग्नयः प्रज्वलिताग्नयः (निरुक्त ७।७।२४)। अत्त्रिम्= अद भक्षणे (अदादिः)+ त्रैङ् पालने, (भ्वादिः)। कश्यपम्= पश्यतीति (सायण), "कश्यप पश्यको भवति" (तै० आ० १।८।८)। वसिष्ठम्= वसुमत्तमम् (सायण)।] [१. अर्थात् सामान्य प्रजाजन, जो कि अन्न खाकर आत्मरक्षा करता है और शासनविरोधी आचरण नहीं करता।]
विषय
पापमोचन की प्रार्थना।
भावार्थ
(यौ) जो तुम दोनों (अङ्गिरसम् अवथः) अङ्गिराः अर्थात् ज्ञानवान्, राष्ट्र के अंग २ में रस अर्थात् बल रूप से विराजमान विद्वान् की रक्षा करते हो, (यौ अगस्तिं) और जो अगस्ति = पाप नाशक, धर्मोपदेशक, आचार्य पुरुष की रक्षा करते हो, हे (मित्रावरुणौ) मित्र और वरुण तुम दोनों (जमदग्निम्) जो प्रज्वलिताग्नि, तपस्वी, आहिताग्नि गृहस्थ की रक्षा करते है। और (अत्रिम्) जो अत्रि अर्थात् सर्वत्र निवास करने वाले, अन्नभोजी, अज्ञान-नाशक पुरुष की रक्षा करते हो, (यौ कश्यपं अवथः) जो कश्यप अर्थात् ज्ञान का पान करने वाले शिष्य, विद्यार्थिगण की रक्षा करते है। और (यौ वसिष्ठं) जो वसिष्ठ अर्थात् आश्रमवासी जितेन्द्रिय पुरुष की रक्षा करते हो (तौ नः अंहसः मुञ्चतम्) वे तुम दोनों हम राष्ट्रवासियों को पाप-कर्म से मुक्त करे।
टिप्पणी
अध्यात्मपक्ष को सातवें मन्त्र में स्पष्ट करेंगे।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मृगार ऋषिः। सप्तम मृगारसूक्तम्। नाना देवताः। १-६ त्रिष्टुभः। ७ शक्वरीगर्भा जगती। सप्तर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Freedom from Sin
Meaning
O Mitra and Varuna, who protect and promote Angiras, specialist of human vitality and breath energy, Agasti, fighter against sin and disease, Jamadagni, promoter of the hearth fire and yajna, Atri, controller of three kinds of suffering, Kashyapa, man of subtle vision, and Vasishtha who provides settlement for the uprooted, pray save us from sin and suffering.
Translation
You two, O Mitra (friend) and O Varuna (venerable), who protect angiras (bright as a piece of burning coal), agasti (repeler of sin), jamadagni (who keeps-his fires burning), and atri (free from three types of sin) who protect kasyapa (who sees the reality), and vasistha (richest in wisdom), as such, may both of you free us from sin.
Translation
These are Mitra and Varuna which give protection to bodily vitality, which protect the heat of the body, which protect the fire working in digestion system, which preserve the power of appetite, which protect eye and which extend their protection to organ of speech. May these two become the sources of our safety from the grief and troubles.
Translation
Mitra and Varuna, who help an energic learned person, a religious preacher, an austere householder, a sage free from the weakness of body, speech and mind, a pupil yearning for knowledge, and a great man, deliver us, Ye twain from grief and trouble!
Footnote
Mitra and Varuna: Prana andApana, or Day and Night. Griffith translates Angiras, Agastya, Jamdagni, Atri, Kashyap and Vasishta as names of mythical personages. Agastya is spoken of as the friend and counsellor of Rama. Atri is interpreted as one of the great seven Rishis, said to have been delivered from distress by Indra and the Aswins. This interpretation is unacceptable, as there is no history in the Vedas.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(यौ) युवाम् (अङ्गिरसम्) अ० २।१२।४। गन्तारम्। उद्योगिनं ज्ञानिनं वा (अवथः) रक्षथः (अगस्तिम्) अ० २।३२।३। अग वक्रगतौ-अच्। वसेस्तिः। उ० ४।१८०। इति अग+असु क्षेपणे कर्त्तरि−ति प्रत्ययः, पृषोदरादित्वाद् दीर्घाभावः। अगं कुटिलगतिं पापम् अस्यति उत्पाटयतीति अगस्तिः। तथाभूतं पापनाशकं महर्षिम् (मित्रावरुणा) म० १। हे अहोरात्रौ प्राणापानौ वा (जमदग्निम्) अ० २।३२।३। जमन्तः प्रज्वलन्तोऽग्नयो यज्ञे शिल्पसिद्धौ वा यस्य तं महर्षिम् (अत्रिम्) अ० २।३२।३। दोषभक्षकं निरन्तरगतिशीलं वा मुनिं यद्वा। अत्रिर्न त्रयः-निरु० ३।१७। इति कायिकवाचिकमानसिकत्रि-दोषरहितं पुरुषम् (कश्यपम्) अ० २।३३।७। सोमरसपानशीलम्। यद्वा पश्यकं सूक्ष्मदर्शिनम् (वसिष्ठम्) वसुमत्-इष्ठन्। विन्मतोर्लुक्। पा० ५।३।६५। इति मतुपो लुक्। वसुमत्तमम्। अतिशयेन धनवन्तम्। यद्वा वसु-इष्ठन्। सर्वश्रेष्ठम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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