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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 35 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 35/ मन्त्र 3
    ऋषिः - प्रजापतिः देवता - अतिमृत्युः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् सूक्तम् - मृत्युसंतरण सूक्त
    86

    यो दा॒धार॑ पृथि॒वीं वि॒श्वभो॑जसं॒ यो अ॒न्तरि॑क्ष॒मापृ॑णा॒द्रसे॑न। यो अस्त॑भ्ना॒द्दिव॑मू॒र्ध्वो म॑हि॒म्ना ते॑नौद॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । दा॒धार॑ । पृ॒थि॒वीम् । वि॒श्वऽभो॑जसम् । य: । अ॒न्तरि॑क्षम् । आ॒ऽअपृ॑णात् । रसे॑न । य: । अस्त॑भ्नात् । दिव॑म् । ऊ॒र्ध्व: । म॒हि॒म्ना । तेन॑ । ओ॒द॒नेन॑ । अति॑ । त॒रा॒णि॒ । मृ॒त्युम् ॥३५.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यो दाधार पृथिवीं विश्वभोजसं यो अन्तरिक्षमापृणाद्रसेन। यो अस्तभ्नाद्दिवमूर्ध्वो महिम्ना तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । दाधार । पृथिवीम् । विश्वऽभोजसम् । य: । अन्तरिक्षम् । आऽअपृणात् । रसेन । य: । अस्तभ्नात् । दिवम् । ऊर्ध्व: । महिम्ना । तेन । ओदनेन । अति । तराणि । मृत्युम् ॥३५.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 35; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मविद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जिस परमेश्वर ने (विश्वभोजसम्) सबका पालन करनेवाली (पृथिवीम्) पृथिवी को (दाधार) धारण किया था, (यः) जिसने (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को (रसेन) रस अर्थात् अन्न वा जल से (आ अपृणात्) भर दिया है। (यः) जिसने (महिम्ना) अपनी महिमा से (ऊर्ध्वः) ऊँचा होकर (दिवम्) प्रकाशमान सूर्य को (अस्तभ्नात्) ठहराया है। (तेन) उस (ओदनेन) बढ़ानेवाले वा अन्नरूप परमात्मा के साथ.... म० १ ॥३॥

    भावार्थ

    परमात्मा ने पृथिवी आदि लोकों और सब चराचर जगत् को रचकर धारण किया है और जो सबसे ऊपर विराजमान है, उसकी महिमा को विचार कर हम अपनी उन्नति करें ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(यः) ओदनः (दाधार) धृतवान् (पृथिवीम्) भूमिम् (विश्वभोजसम्) भुज पालनाभ्यवहारयोः-असुन्। सर्वस्य पालयित्रीम् (अन्तरिक्षम्) मध्यलोकम् (आ-अपृणात्) पॄ पालनपूरणयोः-लङ्। सम्यक् पूरितवान् (रसेन) अन्नेन-निघ० २।७। उदकेन-निघ० १।१२। (अस्तभ्नात्) स्तन्भु रोधने-लङ्। अवरुद्धवान्। दृढीकृतवान् (दिवम्) प्रकाशमानं सूर्यम् (ऊर्ध्वः) उपरि वर्तमानः सन् (महिम्ना) महत्त्वेन। प्रभावेण। अन्यत् पूर्ववत् म० १ ॥

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    विषय

    नीरोगता, स्नेह, उच्च विचार

    पदार्थ

    १. (य:) = जो ज्ञान-भोजन [ओदन] (विश्वभोजसम्) = सब अङ्ग-प्रत्यङ्गों का पालन करनेवाली (पृथिवीम्) = शरीररूपी पृथिवी को (दाधार) = धारण करता है, (य:) = जो ज्ञान (अन्तरिक्षम्) = हृदयान्तरिक्ष को (रसेन आपूणात्) = प्रेमरस से प्रपूरित करता है। ज्ञान के द्वारा खान-पान के ठीक होने से शरीर सुदृढ़ बना रहता है। इसीप्रकार राग-द्वेष से ऊपर उठकर हृदय से सबके प्रति स्नेहवाला होता

    अथर्ववेदभाष्यम् है। २. (यः) = जो ज्ञान (महिम्ना) = अपनी महिमा से (दिवम् ऊर्ध्वा अस्तभ्नात) = मस्तिष्क को ऊपर थामता है, अर्थात् ज्ञान से मस्तिष्क बड़ी उन्नत स्थिति में बना रहता है। यह मस्तिष्क बड़े ऊँचे विचारों का स्रोत बनता है। (तेन ओदनेन) = उस ज्ञान-भोजन से (मृत्युम् अतितराणि) = मृत्यु को तैर जाऊँ। यह ज्ञान मुझे रोगों व जन्म-मरण के चक्र से बचानेवाला हो।

    भावार्थ

    ज्ञान द्वारा शरीर नीरोग बनता है, हृदय स्नेहरस से परिपूर्ण होता है, मस्तिष्क उच्च विचारोंवाला बना रहता है।

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    भाषार्थ

    (विश्वभोजसम्, पृथिवीम्) सबको भोजन देनेवाली, या सबका पालन करनेवाली पृथिवी को (य:) जिस ओदन ने (दाधार) धारण किया हुआ है, (यः) जिस ओदन ने (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को (रसेन) रसीले उदक द्वारा (आपृणात्) सर्वत्र भरपूर किया है; (यः) जिस ओदन ने (ऊर्ध्वः) ऊर्ध्वदिशा में स्थित होकर, (महिम्ना) निज महिमा द्वारा (दिवम्) द्युलोक को (अस्तभ्नात्) थामा हुआ है, (तेन ओदनेन) उस ओदन द्वारा (मृत्युम्, अतितराणि) में मृत्यु को तैर जाऊँ।

    टिप्पणी

    [भोजसम्= भुज पालनाभ्यवहारयोः (रुधादिः)। रसेन= रसः उदकनाम (निघं० १।१२)]।

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    विषय

    प्रजापति की उपासना से मृत्यु को तरना।

    भावार्थ

    (यः) जो वह ओदन नामक परमेश्वर (विश्व-भोजसं) समस्त संसार के परिपालक, (पृथिवीं) इस पृथिव्री को (दाधार) धारण किये हुए है और (यः रसेन) जो अपने रस, सार, बल और मेघादि जल से (अन्तरिक्षं) अन्तरिक्ष और उसमें विद्यमान वायु आदि पदार्थों को (आ पृणाद्) पूर्ण करता और पालता है। और जो (महिम्ना) बड़े सामर्थ्य से स्वयं (ऊर्ध्वः) सब से उच्च पद पर विराजमान होकर (दिवम्) इस सूर्य लोक या द्यौलोक को (अस्तभ्नात्) थामे हुए है। (तेन ओदनेन मृत्युम् अति तराणि) उस ओदन रूप परम ब्रह्म द्वारा मैं मृत्यु को पार कर जाऊं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    प्रजापतिर्ऋषिः। मृत्योरेतिक्रमण देवताः। ३ भुरिक्। ४ जगती, १, २, ५-७ त्रिष्टुभः। सप्तर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Conquest of Death

    Meaning

    Brahma, who holds and sustains mother earth which provides food for all forms of life, who fills the skies with abundant waters of life, who with his grand might and majesty sustains the suns and heavens above, by the same Brahma, I too would conquer and outlive death and attain to life eternal.

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    Translation

    Which sustains the all-feeding earth; which fills the midspace with sap; which keeps the heaven steady above with its. might, with that odana (cooked rice-mess) may I cross over death.

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    Translation

    I, the observer of celibacy conquer mortality or death with this Odana, which upholds the all-sustaining earth, which fills up the firmament with moisture and which through its grandeur supports the heaven above us.

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    Translation

    Who upholds the Earth, the all-sustainer, Who hath filled air's middle realm with moisture, Who through His Exalted grandeur, established heaven, may I with the help of that God overcome death.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(यः) ओदनः (दाधार) धृतवान् (पृथिवीम्) भूमिम् (विश्वभोजसम्) भुज पालनाभ्यवहारयोः-असुन्। सर्वस्य पालयित्रीम् (अन्तरिक्षम्) मध्यलोकम् (आ-अपृणात्) पॄ पालनपूरणयोः-लङ्। सम्यक् पूरितवान् (रसेन) अन्नेन-निघ० २।७। उदकेन-निघ० १।१२। (अस्तभ्नात्) स्तन्भु रोधने-लङ्। अवरुद्धवान्। दृढीकृतवान् (दिवम्) प्रकाशमानं सूर्यम् (ऊर्ध्वः) उपरि वर्तमानः सन् (महिम्ना) महत्त्वेन। प्रभावेण। अन्यत् पूर्ववत् म० १ ॥

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